आज लेनिन की 102वीं बरसी है। कल मुझे साथी स्वतंत्र मिश्र ने इस मौके पर भारतीय वामपंथ के बारे में मेरे संक्षिप्त विचार जानने चाहे तो मैंने उन्हें जो लिखकर भेजा, उसका अधिकांश भाग किंचित सम्पादन के बाद आज के “पत्रिका” अखबार में प्रकाशित हुआ ही होगा, वेबसाईट पर जो लगा, उसका विडिओ facebook पर आज सुबह साझा कर चुका हूँ। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण टिप्पणी खुद लेनिन की मिली जिसका पोस्टर मैंने इस पोस्ट के साथ लगाया है।
इस पोस्ट में पढिए मेरी पूरी टिप्पणी भी।
भारत में वामपंथ अभी भी ग़रीबों, वंचितों और शोषितों का सबसे विश्वसनीय परचम है – विनीत तिवारी
लेनिन के अवसान दिवस पर हमें उनके साम्राज्यवादी युद्ध और क्रांति के बारे में विचार याद करने चाहिए। उन्होंने साम्राज्यवादी शक्तियों के आपसी युद्ध में बनने वाली समाजवादी क्रांति की संभावनाओं को देखने की तमीज सिखायी है। भारत के वामपंथी आंदोलन को समूचे दक्षिण एशिया की विश्व शांति आंदोलन में अगुआई करने की ज़रूरत है क्योंकि योरोपीय साम्राज्यवाद ढह चुका है और अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन तेज़ी से हो रहा है। ऐसे में एक बेहतर और अधिक मानवीय विश्व के निर्माण में लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के देशों, तथा चीन के साथ मिलकर भारत को नयी दुनिया के निर्माण की चुनौती को स्वीकार करना चाहिए। और यह दृष्टि किसी भी पूँजीवादी या जातिवादी दल के पास नहीं हो सकती।
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जिस तरह का वैश्विक माहौल है, उसमें दक्षिणपन्थ और फ़ासीवाद या सर्वाधिकारवाद क्रूरता के साथ आगे बढ़ रहा है। यही भारत में हो रहा है। हिटलर के वक़्त भी यह लोकतंत्र की आड़ में हुआ था और भारत में भी यही हो रहा है।
लेकिन हर तरह के दमन के बावजूद भारत में साम्यवाद की लड़ाई मौजूद है। पूँजीवाद ने अपने संकट से उबरने के लिए साम्प्रदायिकता का दामन 1980 के दशक में ही थाम लिया था। अब 2014 से देश की बड़ी और मध्यम पूँजी साम्प्रदायिक फ़ासीवाद को मजबूत बनाने और उसे वैधता दिलाने में लगी है। फिर भी बहुत कम संसाधनों और अपने जीवट के साथ वामपंथ मैदान में है, इसलिए उसकी निर्णायक हार की घोषणा नहीं की जा सकती। नाजिम हिकमत की पंक्तियाँ हैं –
गिरफ़्तार हो जाना अलग बात है,
ख़ास बात है,
आत्मसमर्पण न करना।
तो अभी तो भारत में वामपंथ ने न तो आत्मसमर्पण किया है और न ही कहीं लड़ाई में पीछे हटे हैं। संसदीय लोकतंत्र और पूँजीवाद की तमाम बुराइयों की घुसपैठ हो जाने के बाद भी जहाँ वामपंथ रहा, लोगों को समान अवसर मिले, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार की बेहतर व्यवस्थाएँ हासिल हुईं।
अपने तमाम विकारों और पराजयों के बावजूद भारत में वामपंथ अभी भी ग़रीबों, वंचितों और शोषितों का सबसे विश्वसनीय परचम है।
भारत में वामपंथी आंदोलन पर एक इल्ज़ाम जाति के प्रश्न की उपेक्षा का है। यह मुझे सही नहीं लगता, लेकिन मैं लगातार देख रहा हूँ कि अनेक कमज़ोर वैचारिकी वाले वामपंथी इस इल्ज़ाम को सच मान लेते हैं। बल्कि अगर उपेक्षा हुई है तो स्त्री प्रश्न की अधिक हुई है।
मेरे विचार से भारत में वामपंथी आंदोलन को अपने वर्ग संघर्ष के एजेंडे पर डटे रहने की, समाजवादी क्रांति के ख़्वाब को याद रखने की, महिलाओं की छिपी हुई ताक़त को साम्प्रदायिकता विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन का प्रमुख हिस्सा बनाने की, ज़मीन के पुनर्वितरण और सहकारी आंदोलन को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है।
- विनीत तिवारी
मेरे साथ उक्त लेख में मीना तिवारी जी, निवेदिता झा और शमसूल इस्लाम के भी विचार प्रकाशित हुए और यह देखकर अच्छा लगा कि सभी ने अलग-अलग आयामों से वामपंथ के महत्त्व को रेखांकित किया था ।
अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (AIPWA) की महासचिव मीना तिवारी ने पत्रिका से बातचीत में कहा, लेनिन ने ही दुनिया में सबसे पहले महिलाओं को बराबरी का अधिकार दिलाया। वोट देने का अधिकार, संपत्ति में महिलाओं को अधिकार, बराबर काम के लिए समान वेतन का अधिकार, बुजुर्गों और बच्चों की जिम्मेदारी की सामाजिक जवाबदेही यानी सरकार की जिम्मेदारी बनाने का काम भी सबसे पहले सोवियत संघ में ही हुआ था।
‘देश में गरीब और मजदूर के हक की सबसे मुखर आवाज वामपंथ ही है’
दुनिया में वामपंथी सरकारें कम होती जा रही हैं? इस पर मीना (Meena Tiwari, General Secretary, AIPWA) कहती हैं
, ’70 वर्षों में सोवियत संघ ढह गया तो उससे सबक लेने की जरूरत है। 100 वर्ष पहले जब कम्युनिस्ट पार्टी का भारत में गठन हुआ था तब भारत की परिस्थितियां भिन्न थीं। अंग्रेजों की सरकार थी। आजादी हासिल करने की लड़ाई में वामपंथी संगठनों ने सक्रिय तरीके से भाग लिया था। भारत के संविधान में लोकतांत्रिक अधिकारों के पीछे वामपंथी आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही। आजादी के बाद भी वामपंथी पार्टियां ही गरीब, किसान, मजदूरों के लिए अगर कोई पार्टी सबसे ज्यादा मुखर रही हैं।’
वरिष्ठ पत्रकार, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा (Nivedita Jha, Social Activist) का मानना है कि भारत में वामपंथ के प्रभाव को आजादी के बाद से देखा जाना चाहिए। उन्होंने पत्रिका से बातचीत में कहा कि आजादी के बाद देश के कुछ हिस्सों में वामपंथ तेजी से फैला और कुछ राज्यों में सरकारें बनी या फिर विपक्ष में कई लोग जीतकर गए। देश में कई बड़े आंदोलन वामपंथी दलों ने किए। आंदोलनों के चलते कई मोर्चों पर हालात भी बदले। मजदूरों को लेकर श्रम कानून भी वामपंथी आंदोलनों के चलते बने। समता और समानता की लड़ाई में साम्यवादी विचारधारा का प्रभाव रहा। सूचना के अधिकार, मनरेगा, भूमि सुधार को लेकर जो कानून बने, उनमें वामपंथी विचारों का हाथ रहा।
क्या वामपंथ आंदोलनों को कुचलने की हाल, फिलहाल में कोशिश की गई है? इस प्रश्न के जवाब में राजनीतिक इतिहासकार प्रो. शम्सुल इस्लाम (Proff. Shamsul Islam) का कहना है कि 2018 में जब त्रिपुरा में वामपंथी सरकार सत्ता से बाहर हुए तब हिंदुत्ववादियों की सरकार बनी। उन्होंने सबसे पहले लेनिन की मूर्ति गिराई। दक्षिणपंथ के लोग यह प्रचारित और प्रसारित करते हैं कि समाजवाद बहुत बुरी चीज है और बराबरी तो आ ही नहीं सकती है। इस विचार से इस समय दुनिया की बड़ी आबादी ग्रसित हो चुकी है।
लेनिन का भारत की आजादी को लेकर क्या विचार रहा?
उन्होंने बताया कि पूरी दुनिया में अकेले लेनिन ही एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने भारत की आजादी का समर्थन किया था। लेनिन ही थे जिन्होंने बाल गंगाधर तिलक पर अंग्रेजी सरकार द्वारा फांसी की सजा दिलाने के लिए चलाए गए मुकदमे का विरोध किया था। लेनिन थे जिन्होंने भगत सिंह के बारे में वक्तव्य दिया था। लेनिन ही थे जिन्होंने कहा था कि रूस की क्रांति से भारत का काम नहीं चलेगा, उन्हें अपने यहां क्रांति लानी होगी।





