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शरशय्या पर 58 दिन तक कैसे जीवित रहे भीष्म?

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महाभारत के युद्ध में पितामह भीष्म का शरशय्या पर लेटे रहना केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि तप, योगबल और धर्मनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण माना जाता है. अर्जुन के बाणों से आहत होकर भीष्म पितामह ने युद्धभूमि में ही शरशय्या को स्वीकार किया, लेकिन इच्छामृत्यु का वरदान होते हुए भी तुरंत प्राण नहीं त्यागे. शास्त्रों के अनुसार, भीष्म पितामह लगभग 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर जीवित रहे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते रहे. यह काल केवल शारीरिक पीड़ा सहने का नहीं, बल्कि आत्मसंयम, तपस्या और धर्म की स्थापना का समय भी था.भीष्म पितामह की शरशय्या और 58 दिन की तपस्या अविस्मरणीय है. अर्जुन के बाणों से घायल होकर भी इच्छामृत्यु के वरदान से उन्होंने उत्तरायण तक प्राण नहीं त्यागे. यह योगबल, आत्मसंयम और धर्मनिष्ठा का प्रतीक था.

महाभारत युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म पितामह शरशय्या पर लेट गए थे. उनके शरीर में असंख्य बाण धंसे हुए थे, फिर भी उन्होंने प्राण नहीं त्यागे. इसका प्रमुख कारण उनका इच्छामृत्यु का वरदान और अटल संकल्प था. भीष्म जानते थे कि जीवन और मृत्यु दोनों ही धर्म के अधीन हैं. उन्होंने न तो पीड़ा से विचलित होकर मृत्यु को चुना और न ही अपने वरदान का दुरुपयोग किया. शास्त्रों के अनुसार, शरशय्या पर लेटे रहना उनके लिए तपस्या के समान था, जिसमें उन्होंने शरीर की पीड़ा को सहन कर आत्मबल को सर्वोच्च रखा. यह अवस्था बताती है कि इच्छामृत्यु केवल अधिकार नहीं, बल्कि संयम और साधना की परीक्षा भी है.

योगबल और तप से संभव हुआ 58 दिन का जीवन
शास्त्रों में बताया गया है कि पितामह भीष्म योग, प्राण नियंत्रण और तप के महान साधक थे. शरशय्या पर रहते हुए उन्होंने अपनी इंद्रियों और प्राणों को पूर्ण नियंत्रण में रखा. यही कारण था कि गंभीर घावों के बावजूद वे 58 दिनों तक जीवित रह सके. धार्मिक मान्यता के अनुसार, उनका मन पूर्ण रूप से धर्म और मोक्ष पर केंद्रित था, जिससे शरीर पर पीड़ा का प्रभाव कम होता गया. भीष्म ने जल और भोजन भी न्यूनतम रूप में ग्रहण किया और अपनी चेतना को स्थिर बनाए रखा. यह अवस्था सामान्य मानव के लिए असंभव मानी जाती है, लेकिन योगबल और आत्मसंयम से भीष्म ने इसे संभव कर दिखाया.

शरशय्या पर लेटे रहकर धर्म की शिक्षा
भीष्म पितामह का शरशय्या पर रहना केवल शारीरिक सहनशीलता का उदाहरण नहीं था, बल्कि धर्म शिक्षा का काल भी था. इसी अवधि में उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म का उपदेश दिया. महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व इन्हीं उपदेशों का परिणाम माने जाते हैं. भीष्म ने स्पष्ट किया कि अंतिम समय में भी व्यक्ति समाज को दिशा दे सकता है. शास्त्रों के अनुसार, यह 58 दिन धर्म की स्थापना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहे. शरशय्या उनके लिए तपोभूमि बन गई, जहां उन्होंने ज्ञान, धैर्य और कर्तव्य का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया.

भीष्म के तप से मिलने वाली आज की सीख
पितामह भीष्म का शरशय्या पर 58 दिनों तक जीवित रहना आज के समय में भी गहरी प्रेरणा देता है. यह सिखाता है कि शरीर से अधिक शक्तिशाली मन और आत्मा होती है. भीष्म अष्टमी के अवसर पर श्रद्धालु उनके तप, संयम और धैर्य को स्मरण करते हैं. आधुनिक जीवन में जहां धैर्य और सहनशीलता कम होती जा रही है, वहां भीष्म का यह तप मानव को आत्मनियंत्रण और धर्म के मार्ग पर चलने की सीख देता है. शास्त्रों के अनुसार, उनका यह तप मोक्ष की ओर ले जाने वाला साधन बना. इसलिए शरशय्या पर लेटे भीष्म केवल योद्धा नहीं, बल्कि तपस्वी और धर्म के जीवंत प्रतीक माने जाते हैं.

Ramswaroop Mantri

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