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सस्ती होगी EMI? आरबीआई घटा सकता है रेपो रेट

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भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील में हो रही देरी को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं. गोल्डमैन सैश का मानना है कि अगर यह देरी लंबी खिंचती है तो आर्थिक बढ़ोतरी पर दबाव पड़ सकता है. ऐसी स्थिति में आरबीआई ब्याज दरों में अतिरिक्त कटौती कर अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है.

 भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते में अगर और देरी होती है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ब्याज दरों में अतिरिक्त कटौती कर सकता है. यह आकलन वैश्विक ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैश ने किया है. ब्रोकरेज फर्म के अनुसार, अगर व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही तक बनी रहती हैं और इससे आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ता है, तो आरबीआई ग्रोथ को सहारा देने के लिए मौद्रिक नीति को और उदार बना सकता है.

खपत में सुधार, लेकिन अभी पूरी मजबूती नहीं
गोल्डमैन सैश का कहना है कि भारत में खपत में रिकवरी जरूर दिख रही है, लेकिन यह अभी शुरुआती चरण में है. खासकर ग्रामीण इलाकों और कम आय वर्ग के शहरी उपभोक्ताओं में सुधार धीरे-धीरे हो रहा है. अच्छी फसल, राज्यों की योजनाओं के तहत महिलाओं को मिलने वाला नकद लाभ और जीएसटी में कटौती जैसे कदमों से निचले आय वर्ग की क्रय शक्ति में कुछ मजबूती आई है. इससे घरेलू मांग को धीरे-धीरे सहारा मिल रहा है.

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू मांग का सहारा
ब्रोकरेज का मानना है कि ये घरेलू कारक वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितताओं के बावजूद मांग को संभालने में मदद कर रहे हैं. हालांकि, अगर अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में जरूरत से ज्यादा देरी होती है, तो निर्यात और निवेश पर असर पड़ सकता है. ऐसे हालात में आरबीआई और सरकार दोनों को आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए अतिरिक्त नीतिगत कदम उठाने पड़ सकते हैं, जिनमें ब्याज दरों में कटौती एक अहम विकल्प हो सकता है.

आय वर्ग के हिसाब से खपत की तस्वीर अलग-अलग
एक इंटरव्यू में गोल्डमैन सैश के चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट शांतनु सेनगुप्ता ने कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील के वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही तक पूरी होने की उम्मीद है. हालांकि, अगर यह समझौता अगले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही तक टलता है, तो विकास को लेकर जोखिम बढ़ सकते हैं. उन्होंने बताया कि जहां उच्च आय वर्ग की खपत में कोविड के बाद तेज उछाल आया था, वहीं अब उसमें कुछ सुस्ती दिख रही है. दूसरी ओर, मध्यम आय वर्ग को रोजगार को लेकर चिंता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल से चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

सरकारी नीतियों से ग्रोथ को मिला सहारा
नीतिगत स्तर पर केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026 में राजकोषीय सख्ती में कुछ नरमी बरती और आयकर व उपभोग कर में कटौती के जरिए मांग बढ़ाने पर जोर दिया. इसका असर यह रहा कि कैलेंडर वर्ष 2025 में भारत ने 7.6 प्रतिशत की मजबूत वास्तविक जीडीपी बढ़ोतरी दर्ज की. हालांकि, बहुत कम महंगाई के कारण नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ बीते छह वर्षों के निचले स्तर पर रही. ऐसे में अगर ट्रेड डील में देरी से नई चुनौतियां पैदा होती हैं, तो ब्याज दरों में और कटौती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

Ramswaroop Mantri

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