चार दिन बीतने के बावजूद न बीज वापसी, न वैकल्पिक व्यवस्था — जिम्मेदारों पर कार्रवाई शून्य
इंदौर।
जिले में किसानों को वितरित किए गए घटिया मूंगफली बीज को लेकर किसानों में भारी आक्रोश व्याप्त है। यह अत्यंत चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि कृषि विभाग को औपचारिक शिकायत दर्ज कराए जाने के चार दिन बाद भी न तो घटिया बीज वापस लिया गया और न ही गुणवत्तायुक्त वैकल्पिक बीज की कोई व्यवस्था की गई। प्रशासन की यह निष्क्रियता किसानों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।
बीज वितरण के प्रारंभिक चरण में ही अनेक किसानों ने बीज की गुणवत्ता पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज कराई थीं। कृषि विस्तार अधिकारियों द्वारा बीज की वास्तविक स्थिति दर्शाती तस्वीरें एवं तथ्यात्मक रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी गईं। इसके बावजूद अधिकारियों ने आंख मूंदकर अनदेखी की।
यह भी उल्लेखनीय है कि एक सप्ताह पूर्व बड़वानी जिले में भी मूंगफली के बीजों के खेतों में अंकुरित न होने की घटनाएँ सामने आ चुकी थीं, फिर भी समय रहते कोई सबक नहीं लिया गया।
सबूत सामने होने के बावजूद वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा बीज को “अच्छा अंकुरण वाला” बताकर किसानों की शिकायतों को खारिज करना अत्यंत आपत्तिजनक, असंवेदनशील और संदेहास्पद है। यह रवैया कमीशनखोरी, मिलीभगत और भ्रष्टाचार की प्रबल आशंका को जन्म देता है, जिसकी निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
किसानों का कहना है कि समय पर बीज वापसी और वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। खेत की तैयारी, मजदूरी, सिंचाई, समय और संसाधन—सब व्यर्थ हो चुके हैं। इस नुकसान की पूर्ण जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों और विभागीय नेतृत्व की है।
किसान नेता बबलू जाधव ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री तक भेजते हुए मांग की है कि किसानों के साथ हुए इस अन्याय पर तत्काल हस्तक्षेप किया जाए और दोषियों को संरक्षण देने के बजाय उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
प्रशासन से किसानों की स्पष्ट मांग है कि—
घटिया मूंगफली बीज को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए।
प्रभावित किसानों को बिना देरी गुणवत्तायुक्त एवं प्रमाणित बीज उपलब्ध कराया जाए।
इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कर दोषी अधिकारियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
किसानों को हुए आर्थिक नुकसान का समुचित मुआवजा दिया जाए।
यदि शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो किसान संगठन आंदोलनात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य होगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन और कृषि विभाग की होगी।





