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21 साल पहले 10 हजार किलो थी चांदी, 12 महीने में ऐसे तय किया 86 हजार से चार लाख का सफर

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वैश्विक स्तर पर चांदी की कीमतों में आए उछाल का असर भारत पर भी पड़ा है। बीते कुछ ही वर्षों में देश में चांदी की कीमतें कुछ हजार रुपये प्रति किलो से बढ़कर लाखों रुपये में पहुंच गई है। आइये जानते हैं चांदी की कीमत का इतिहास..

भारत में क्या है चांदी की कीमतों का इतिहास?

1980 का दशक (जब बढ़ा चांदी पर भरोसा): इस दौरान चांदी को ग्रामीण परिवारों के लिए एक सुरक्षित निवेश माना जाता था, जहां किसान सूखे के समय इसे बेचते और फसल के बाद खरीदते थे। इस दशक में चांदी की कीमतों में औसत वार्षिक वृद्धि 10-12% रही।
1990 का दशक (मंदी का दौर): आर्थिक उदारीकरण के कारण निवेशकों का ध्यान सोने और इक्विटी की ओर चला गया, जिससे चांदी की कीमतें लगभग स्थिर रहीं।
2000 का दशक (कीमतों में तीन गुना उछाल): वैश्विक वित्तीय संकट (2008) ने चांदी को एक ‘सेफ-हेवन’ एसेट बना दिया। 2000 से 2010 के बीच कीमतें लगभग तीन गुना बढ़ गईं।
2011-2020 (अस्थिरता का दौर): 2011-12 में चांदी ₹57,316 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, लेकिन 2015 तक गिरकर ₹40,000 के नीचे आ गई। इसके बाद चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहा।
2020-2026 (ऊर्जा धातु का युग): स्वच्छ ऊर्जा क्रांति (सौर पैनल, ईवी और 5जी) के कारण मांग में जबरदस्त बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। सिर्फ 3 साल (2023-2026) में कीमतें करीब छह गुना बढ़ गईं।

एक साल पहले 86 हजार में खरीदी होती चांदी, तो आज 4 लाख रुपये के होते मालिक
चांदी की कीमतों में असली उछाल का दौर जनवरी 2025 में शुरू हुआ। दरअसल, यह वो दौर था, जब दुनियाभर में अनिश्चितताएं अपने चरम पर थीं। खासकर यह अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के ठीक बाद का समय था और डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति की शपथ लेने के लिए तैयार थे। उनकी कई नीतियों के एलान के बाद से ही बाजार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। इस दौरान चांदी 86 हजार के करीब थी। हालांकि, अगले एक साल में जो हुआ, उसके बारे में शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा।
2025-26 के बीच क्यों तेजी से बढ़े हैं चांदी के दाम?
चांदी की कीमतों में इस भारी बदलाव के पीछे क्या वजह

  1. औद्योगिक मांग: वैश्विक चांदी की 50% से अधिक मांग अब गहनों के बजाय उद्योगों (जैसे सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मेडिकल) से आती है।
  2. रुपये की कमजोरी: चूंकि भारत चांदी का बड़ा आयातक है, इसलिए डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से घरेलू बाजार में चांदी महंगी हो जाती है।
  3. वैश्विक आपूर्ति में कमी: चांदी की खदानों से उत्पादन सीमित है, जबकि भविष्य की तकनीक (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, एआई) में इसकी खपत अनिवार्य है। चीन ने इस जरूरत को देखते हुए कोरोनाकाल से पहले ही चांदी का आयात बढ़ाया था, जो कि रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने लगा।

नवंबर 2025 में अमेरिका ने चांदी को अपनी महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) सूची में शामिल किया। बताया जाता है कि चीन के एआई और सेमीकंडक्टर्स के क्षेत्र में लगातार बढ़त हासिल करने के बाद अमेरिका ने भी इसके आयात को बढ़ाया। इसके तुरंत बाद, चीन द्वारा निर्यात प्रतिबंधों की खबरों और लंदन जैसे वैश्विक बाजारों में भौतिक चांदी की कमी ने कीमतों को और हवा दी।

  • आंकड़े हर महीने के उच्चतम स्तर को दर्शाते हुए
  1. वैश्विक अनिश्चितता: दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तनाव और देशों के बीच विवाद की स्थिति में सोना और चांदी की आपूर्ति मुश्किल होती है। 2020 में कोरोनावायरस महामारी, 2022 से रूस-यूक्रेन युद्ध और फिर 2023 के बाद से इस्राइल-हमास संघर्ष ने रिजर्व के तौर पर सोना-चांदी का महत्व बढ़ा दिया।

दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से दुनिया में चांदी को लेकर होड़ मची है। उनकी अप्रत्याशित विदेश नीति और टैरिफ नियमों के बाद से ही दुनिया ने चांदी जुटाना तेज किया है। वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले, ग्रीनलैंड को खरीदने को लेकर अमेरिका की धमकी और अब ईरान के खिलाफ जंग छेड़ने की धमकी के कारण दुनियाभर में उथल-पुथल का माहौल है। ऐसे समय में निवेशक चांदी को मुद्रा के मुकाबले ज्यादा अहम रिजर्व मानते हैं, जिसकी कीमत हर वक्त बढ़ती है।

Ramswaroop Mantri

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