अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि जब तक अमेरिका है, तभी तक यूरोप सुरक्षित है. लेकिन अब इस सिक्योरिटी ब्लैकमेल का जवाब जर्मनी ने देने की ठान ली है. चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कुछ ऐसे संकेत दिए हैं, जिससे कहा जा रहा कि जर्मनी अब यूरोपीय देशों को न्यूक्लियर अंब्रेला मुहैया कराएगा. जर्मनी इसके लिए फ्रांस के साथ जुगलबंदी करने की प्लानिंग कर रहा है और न्यूक्लियर सिक्योरिटी डेवलप करने की तैयारी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘नाटो’ को लेकर दी गई धमकियों और सुरक्षा गारंटी पर बढ़ते संदेह ने पूरे यूरोप को अलर्ट कर दिया है. इसी तनाव के बीच, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने यूरोप के लिए एक न्यूक्लियर अंब्रेला डेवलप करने का संकेत दिया है. ट्रंप के ‘सिक्योरिटी दांव’ को बेअसर करने के लिए अब जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ मिलकर परमाणु रक्षा की नई बिसात बिछाने की तैयारी में है.
यूरोपीय देश लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका और उसके न्यूक्लियर वेपन पर निर्भर रहे हैं. लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह उन्हें दोयम दर्जे का बताने की कोशिश की है, उससे यूरोपीय देश काफी गुस्से में हैं. ट्रंप की इस हरकत से उनका भरोसा टूट गया है. क्योंकि ट्रंप कह चुके हैं कि अमेरिका उन देशों की रक्षा नहीं करेगा जो अपनी सुरक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे. ग्रीनलैंड खरीदने और उस पर कब्जा करने की बात कहकर ट्रंप ने आग में घी डाल दी है. इन घटनाओं ने जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उन्हें अमेरिका के भरोसे रहने के बजाय अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना होगा.
क्या है जर्मनी का ‘न्यूक्लियर प्लान’?
जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा, अमेरिका के साथ मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था का एक विकल्प बनाना होगा. पूरे यूरोपीय यूनियन को एक न्यूक्लियर अंब्रेला के नीचे लाना होगा. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि ये बातचीत अभी शुरुआती चरण में है और कोई भी फैसला तत्काल नहीं लिया जाने वाला है. गुरुवार को पत्रकारों से बात करते हुए मर्ज ने कहा, हम जानते हैं कि हमें कई रणनीतिक और सैन्य नीतिगत फैसलों पर पहुंचना है, लेकिन फिलहाल अभी वह समय नहीं आया है. मर्ज ने यह भी साफ किया कि यह बातचीत अमेरिका के साथ न्यूक्लियर-शेयरिंग के विरोध में नहीं है, बल्कि यह उसे और मजबूत करने की एक कोशिश है.
ADVERTISEMENT
कानूनी अड़चनें और जर्मनी का रास्ता
जर्मनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इंटरनेशनल ट्रीटी हैं. 1990 के ‘फोर प्लस टू’ समझौते और 1969 की परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत जर्मनी पर अपना खुद का परमाणु हथियार विकसित करने पर प्रतिबंध लगा हुआ है. लेकिन चांसलर मर्ज ने इसका एक कूटनीतिक तोड़ निकाल लिया है. उनका कहना है कि जर्मनी की संधि के दायित्व उसे अपने भागीदारों के साथ ज्वाइंट सॉल्यूशन पर चर्चा करने से नहीं रोकते. इसमें ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देश शामिल हैं, जो यूरोप की एकमात्र ऐसी शक्तियां हैं जिनके पास अपना परमाणु शस्त्रागार मौजूद है. यानी जर्मनी अपना बम बनाने के बजाय ब्रिटेन और फ्रांस के हथियारों को एक ‘यूरोपीय एसेट’ के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम कर सकता है.
तकनीकी ताकत का इस्तेमाल
मर्ज की पार्टी के सहयोगी और संसदीय रक्षा समिति के प्रमुख थॉमस रोवेकैंप ने इस योजना को और बल दिया है. उन्होंने दावा किया कि जर्मनी के पास वह तकनीकी क्षमता है जिसका उपयोग यूरोपीय परमाणु हथियार विकसित करने में किया जा सकता है. रोवेकैंप ने जर्मनी के ‘वेल्ट टीवी’ से कहा, हमारे पास मिसाइलें या वारहेड्स नहीं हैं, लेकिन हमारे पास एक महत्वपूर्ण तकनीकी लाभ है जिसे हम एक संयुक्त यूरोपीय पहल में योगदान दे सकते हैं.
बदलता हुआ भू-राजनीतिक समीकरण
फ्रेडरिक मर्ज का यह बयान बताता है कि यूरोप अब सुरक्षा के मामले में ‘आत्मनिर्भर’ होने की दिशा में गंभीर है. ट्रंप की अनिश्चित नीतियों ने जर्मनी को यह सोचने पर विवश किया है कि अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो यूरोप के पास अपनी सुरक्षा के लिए क्या विकल्प बचेगा? खुद का परमाणु बम न सही, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर एक ‘ज्वाइंट न्यूक्लियर अंब्रेला’ तैयार करना ट्रंप के ‘सिक्योरिटी दांव’ को बेदम करने का जर्मनी का नया प्लान हो सकता है. फिलहाल गेंद चर्चा के पाले में है, लेकिन यह स्पष्ट है कि बर्लिन अब वाशिंगटन की धमकियों के आगे झुकने के बजाय विकल्प तलाश रहा है.





