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आत्ममीमांसा: जन आंदोलन ने बचाया राजबाड़ा

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सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

इंदौर का राजबाड़ा यदि सुरक्षित है तो जन आंदोलन की वजह से। खासगी ट्रस्ट ने इसका 20 लाख रुपए में सौदा कर दिया था। सर सेठ हुकुमचंदजी के वंशज कासलीवाल परिवार ने इसका सौदा किया था। राजबाड़ा के अंदर भगवान शंकर का मार्तण्ड मंदिर, दरबार हाल सहित तमाम ऐतिहासिक विरासत सुरक्षित हैं तो उसके लिए निश्चित ही इंदौर की जनता को उसका श्रेय जाता है।

जब सुरेश सेठ ने जन आंदोलन किया

जन आंदोलन का नेतृत्व आदरणीय स्वर्गीय सुरेश सेठ ने किया था। इन्दौर कभी उनको भूल नहीं सकता। अपनी ही सरकार के खिलाफ सुरेश सेठ ने मोर्चा संभाला।वे एक जुझारू राजनेता थे। अपने शहर के लिए जीने-मरने के लिए तैयार रहे। वे सच के साथ हमेशा खड़े रहे। ईमानदार राजनेता,…. वाकई सुरेश सेठ इंदौर के शेर थे, इंदौर की दहाड़ थे, इंदौर की मुखर आवाज थे। मैं उस समय नई दुनिया में ही काम करता था।

नई दुनिया की बेईमान पत्रकारिता

राजवाड़ा बचाओ आंदोलन की खबरों, राजबाड़ा की बिक्री के षड़यंत्र और सौदे की खबरों के साथ नई दुनिया ने बेईमान पत्रकारिता की। सरकार में रहते हुए भी आदरणीय स्वर्गीय नारायण प्रसाद शुक्ला की भूमिका को रेखांकित किया जाना चाहिए, जिन्होंने इस सौदे के भीतरी खेल को मुख्यमंत्री श्यामाचरण जी शुक्ल को समझाया, तथ्यों से अवगत कराया। वे शुक्ल मंत्रिमंडल में सूचना प्रसारण राज्य मंत्री थे। आंदोलन में वे पर्दे के पीछे सुरेश सेठ के साथ जुड़े रहे।

नई दुनिया ने खबरों को दबाया

इंदौर की कई सामाजिक संस्थाएं इस आंदोलन में मुखर थीं। सुरेश सेठ अकेले एक दमदार नेता थे जो सबकी आवाज बन गए थे। नई दुनिया ने आंदोलन की खबरों को तो छापा, लेकिन उसका स्वर मद्दम था। राजबाड़ा को पर्दे के पीछे खरीदने वालों से अभयजी छजलानी की सहानुभूति थी।

ये पत्रकार थे मुखर

वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय बालाराव इंगले, जवाहरलाल राठौर, प्रताप चांद, गोकुल शर्मा आंदोलन के पक्ष में मुखर थे। कासलीवाल परिवार ने राजबाड़ा को बीस लाख रुपए में खरीद लिया था। आपको आश्चर्य होगा की राजबाड़ा खरीदने के बाद उसकी जगह व्यावसायिक परिसर बनाने का विचार था।

पाटोदी, साबू नहीं हुए मुखर

आंदोलन के पक्ष में बाबूलाल पाटौदी, भागवत साबू नजर नहीं आए। इसका मतलब साफ था कि राजबाड़े की खरीदी बिक्री के षड्यंत्र में नई दुनिया संस्थान के तात्कालिक प्रबंधकों की भी भूमिका न रही हो पर सहानुभूति तो थी….? 7 जून 1980 को जब मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने इंदौर को राजबाड़ा समर्पित किया, उस खबर की रिपोर्टिंग भी भेदभावपूर्ण थी….।

नई दुनिया का पहला पृष्ठ

8 जून 1980 का प्रथम पृष्ठ देखिए। मुख्यमंत्री श्री शुक्ला का जो भाषण छपा है उसमें उन्होंने कहा है कि 400 करोड़ के बजट वाले मध्य प्रदेश को 20 लाख रुपए का भुगतान करने में कोई खास भार नहीं पड़ेगा। यानी कासलीवाल परिवार ने खासगी ट्रस्ट से राजबाड़ा 20 लाख रुपए में खरीदा था।

फिर लिया बदला….

राजबाड़ा के सौदै में सुरेश सेठ ने जो भांजी मारी और राजबाड़ा बचाया, उसका बदला कथित रुप से ललित जैन ने लिया, ऐसी आम चर्चा थी। उस चर्चा का ललित जैन ने खंडन भी नहीं किया था। बात 1984 की है। जब इंदिराजी की हत्या हुई तब देश भर में सिख विरोधी दंगे भड़के और कांग्रेस पार्टी के नेता, कार्यकर्ताओं ने सिखों को निशाना बनाया, कत्लेआम किया, जिंदा जलाया।

ललित जैन ने उकसाया….

कांग्रेस के नेता ललित जैन के कथित उकसावे पर राजबाड़ा के आसपास की दुकानों में आग लगा दी गई। उसमें एक सिख परिवार की दुकान भी थी। जिसकी आग से राजवाड़ा का एक हिस्सा जल गया था। सिख परिवार की दुकान की आड़ में ऐसा आरोप लगाया जाता है कि राजबाड़ा के आंदोलन की सफलता का बदला लिया गया था। उनकी पूरी कोशिश थी कि पूरा राजबाड़ा जलकर राख हो जाए।

आम चर्चा तो यही थी

यह बात कितनी सच है, कितनी झूठ यह तो ईश्वर जानता है, लेकिन उस समय जो माहौल था, जो लोगों में आम चर्चा थी, चौराहों पर, मोहल्ले में, पान की दुकानों पर, रेस्टोरेंट में और चाय की दुकान पर चाय की चुस्की लेते हुए लोग इस तरह की चर्चा करते थे… कि ललित जैन ने ही यह करवाया। कसलीवाल परिवार पर भी तरह-तरह के आरोप लगाए गए थे। मैं आज जब आत्ममीमांसा लिख रहा हूँ तो यह मेरा धर्म है और मैं यदि अपने इस ऐतिहासिक दस्तावेज को तैयार करते समय, शहर की इस बड़ी घटना को भूल जाऊँ तो शायद मैं अपने आपके साथ या अपनी पत्रकारिता धर्म के साथ न्याय नहीं करूंगा। सूचना देना पत्रकार का काम है और यह भी सच है कि सच ही लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

नई दुनिया का अक्षम्य अपराध

नई दुनिया में मेरे लिखे पर मैंने आत्ममीमांसा की, साथियों के लिखे पर भी की तब कह सकता हूँ नई दुनिया ने जो लिखा वह अधूरा था। मुझे अच्छी तरह याद है कि नई दुनिया ने राजबाड़ा की बिक्री के सौदे के तथ्यों को छुपाया।जो प्रकाशित किया था वह अधूरा था। आम चर्चा रही कि नई दुनिया ने अपने इतिहास में बहुत सारी भूलें की हैं, मगर राजबाड़ा के संदर्भ में नई दुनिया ने अक्षम्य अपराध किया।

Ramswaroop Mantri

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