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भाजपा, सामाजिक न्याय और राजनीतिक कूटनीति

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(ओबीसी–अनुसूचित जातियों के साथ एक रणनीतिक भ्रम)

– तेजपाल सिंह ‘तेज’

          13 से 29 जनवरी के घटनाक्रम को यदि केवल न्यायपालिका की भूमिका तक सीमित करके देखा जाए, तो चित्र अधूरा रह जाता है। इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में एक और निर्णायक शक्ति है—भारतीय जनता पार्टी—जिसकी राजनीतिक नीयत, रणनीति और सामाजिक समूहों के साथ व्यवहार इस विवाद की वास्तविक कुंजी है।

ओबीसी–दलित राजनीति : समर्थन नहीं, उपयोग:

          भाजपा पिछले एक दशक से स्वयं को ओबीसी और अनुसूचित जातियों की “स्वाभाविक प्रतिनिधि” के रूप में प्रस्तुत करती रही है। प्रधानमंत्री की सामाजिक पृष्ठभूमि को बार-बार रेखांकित करना, दलित प्रतीकों का चुनावी उपयोग, और संविधान के प्रति औपचारिक श्रद्धा—ये सब उसी छवि-निर्माण का हिस्सा हैं। लेकिन ज़मीनी और नीतिगत स्तर पर तस्वीर भिन्न दिखाई देती है।

  • आरक्षण के प्रश्न पर बार-बार पुनर्विचार की भाषा
  • निजीकरण के ज़रिये आरक्षित अवसरों का संकुचन
  • शिक्षा और रोजगार में राज्य की भूमिका का क्षरण
  • और सामाजिक सुरक्षा कानूनों को “दुरुपयोग” की दृष्टि से देखना

          ये सभी संकेत बताते हैं कि भाजपा की सामाजिक न्याय की राजनीति अधिकार आधारित नहीं, प्रतीक आधारित है।

यूजीसी प्रकरण : सवर्ण असंतोष, ओबीसी संदेश:

          यूजीसी नियमों और उस पर उभरे सवर्ण विरोध को यदि ध्यान से देखा जाए, तो यह ओबीसी–दलित समाज के लिए एक संदेश-निर्माण अभ्यास प्रतीत होता है। संदेश यह था— “देखिए, हम आपके लिए अपने सबसे मजबूत समर्थक वर्ग की नाराज़गी भी झेल सकते हैं।” लेकिन यह नाराज़गी न तो अनियंत्रित थी, न ही सत्ता-विरोधी। यह एक नियंत्रित असंतोष था—जो अंततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सुरक्षित रूप से समाप्त हो गया। यहाँ ओबीसी और अनुसूचित जातियों के लिए वास्तविक लाभ क्या था? न कोई ठोस अधिकार,
न कोई संरचनात्मक सुधार, न कोई दीर्घकालिक नीति। मिला तो केवल राजनीतिक भावनात्मक संकेत

भ्रामक रवैया : अधिकार नहीं, भ्रम का निर्माण:

          यह भाजपा की राजनीति की एक स्थायी विशेषता रही है कि वह वंचित समुदायों को—

  • अधिकार देने के बजाय आश्वासन,
  • संरचना बदलने के बजाय प्रतीक,
  • और संघर्ष स्वीकारने के बजाय भावनात्मक संतुष्टि
    प्रदान करती है।

          ओबीसी और अनुसूचित जातियों को यह दिखाया जाता है कि भाजपा “उनके लिए लड़ रही है”, जबकि वास्तविक नीतियाँ सवर्ण प्रभुत्व और पूँजी-हितों को सुरक्षित रखती हैं। यह द्वैधता—भाषण में सामाजिक न्याय, नीति में सामाजिक संकुचन— भ्रम नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक व्यवहार है। क्या यह राजनीतिक कूटनीति नहीं हैयहाँ प्रश्न स्पष्ट है—क्या यह सब राजनीतिक कूटनीति नहीं है? उत्तर है—हाँ, और वह भी उच्च स्तर की।

  • सवर्ण असंतोष को नियंत्रित करना
  • ओबीसी–दलित समाज को नैतिक समर्थन का भ्रम देना
  • न्यायपालिका के माध्यम से टकराव को शांत कराना
  • और अंततः स्वयं को “सभी वर्गों के संतुलनकर्ता” के रूप में प्रस्तुत करना

          यह सब लोकतांत्रिक संवाद नहीं, बल्कि सत्ता-संरक्षण की रणनीति है। इस कूटनीति में ओबीसी और अनुसूचित जातियाँ साझेदार नहीं, बल्कि राजनीतिक औजार हैं।

दीर्घकालिक परिणाम : विश्वास का क्षरण:

          इस तरह की राजनीति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि वह वंचित समुदायों के भीतर—

  • अधिकार की चेतना को कमजोर करती है,
  • संघर्ष को प्रतीक्षा में बदलती है,
  • और संविधान को भावनात्मक प्रतीक तक सीमित कर देती है।

          जब सामाजिक न्याय केवल चुनावी नैरेटिव बन जाए, तो वास्तविक न्याय और भी दूर खिसकता चला जाता है।

निष्कर्ष : राजनीति या लोकतंत्र?

          भाजपा का यह रवैया किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह एक राजनीतिक पद्धति है—जहाँ सामाजिक समूहों को एक-दूसरे के विरुद्ध भावनात्मक रूप से सजाया जाता है, लेकिन संरचनात्मक शक्ति-संतुलन जस का तस रहता है। इस अर्थ में, हाँ—यह राजनीतिक कूटनीति है, पर लोकतांत्रिक नहीं। और जब कूटनीति सामाजिक न्याय के नाम पर की जाए, तो वह केवल सत्ता की चाल नहीं रहती— वह संविधान के साथ किया गया छल बन जाती है।

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Ramswaroop Mantri

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