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‘भाग्य के चार सितारे’ पर सदन में जिम्मेदार करते रहे उठा बैठक आखिरकार क्यों ? 

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-सुसंस्कृति परिहार 

आज सदन में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान अब तक की सबसे अजीब तस्वीर सामने आई।प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी ने जब पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की पुस्तक भाग्य के चार सितारे के कुछ अंश जो कारवां पत्रिका ने प्रकाशित किए हैं उसको पढ़ना चाहा तो सदन में रक्षा मंत्री के साथ किरन रिजीजू और अन्य सरकार के चमचे सांसदों , मंत्रियों ने ऐसी उठा बैठक की, मानों सत्य से डरे हुए हों।तरह तरह की बातें हुईं। पुस्तक क्या प्रकाशित है।जबकि सरकार इसे प्रकाशित नहीं होने दे रही है।ऐसी किताब या किसी पत्रिका में छपे लेख पर चर्चा नहीं हो सकती। उन्हें प्रमाण चाहिए।सदन ने प्रतिपक्ष नेता को बोलने नहीं दिया। लेकिन उतनी ही तेज़ी से उस पुस्तक और कथित पत्रिका की डिमांड बढ़ गई। इधर कुछ अंश सोशल मीडिया पर सामने आ गए तथा एक बार फिर यह सच सामने आ गया कि कि छप्पन इंची छाती वाले मोदी जी और दबे कुचले रक्षा मंत्री ने कैसे गोली चलाने का आदेश ना देकर सेना प्रमुख नरवणे पर डाल दिया।जिससे वे पुस्तक में लिखते हैं मुझे गर्म आलू पकड़ा दिया।

बात यह है कि भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी को 31 अगस्त 2020 को रात 8.15 बजे एक फोन कॉल आया। उन्हें जो जानकारी मिली, उससे वे चिंतित हो गए। इन्फैंट्री के सपोर्ट से चार चीनी टैंक पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर एक खड़ी पहाड़ी के रास्ते आगे बढ़ने लगे थे।  जोशी ने इस मूवमेंट की जानकारी आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी, जिन्होंने तुरंत स्थिति की गंभीरता को समझ लिया। टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे। यह एक रणनीतिक ऊंची जगह थी, जिस पर भारतीय सेना ने कुछ घंटे पहले ही कब्जा किया था। विवादित लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल जो दोनों देशों के बीच असल सीमा है के इस इलाके में ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक दबदबे में बदल जाता है।  

भारतीय सैनिकों ने एक illuminating round फायर किया, जो एक तरह की चेतावनी थी। इसका कोई असर नहीं हुआ। चीनी आगे बढ़ते रहे। नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान के नेताओं को ताबड़तोड़ फोन करना शुरू कर दिया, जिनमें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह; राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, और विदेश मंत्री एस जयशंकर शामिल थे।  

‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ में नरवणे लिखते हैं, ‘मेरा हर किसी से एक ही सवाल था, ‘मेरे लिए आदेश क्या हैं?’ स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्टता की जरूरत थी। मौजूदा प्रोटोकॉल के मुताबिक नरवणे को साफ आदेश थे कि “जब तक ऊपर से मंजूरी न मिले, तब तक गोली न चलाएं।” ऊपर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आए।मिनट बीतते गए। रात 9.10 बजे, लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने फिर फोन किया। चीनी टैंक आगे बढ़ते हुए दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर आ गए थे। रात 9.25 बजे, नरवणे ने राजनाथ को फिर फोन किया, “स्पष्ट निर्देशों” के लिए पूछा। कोई निर्देश नहीं मिला।  इसी बीच, PLA कमांडर, मेजर जनरल लियू लिन का एक मैसेज आया। उसने हालात को शांत करने का एक प्रस्ताव दिया; दोनों पक्षों को आगे बढ़ना बंद कर देना चाहिए और अगले दिन सुबह 9.30 बजे, पास पर स्थानीय कमांडर अपने तीन-तीन प्रतिनिधियों के साथ मिलेंगे। यह एक उचित प्रस्ताव लग रहा था। एक पल के लिए ऐसा लगा कि कोई रास्ता निकल रहा है।  

रात 10 बजे, नरवणे ने यही मैसेज देने के लिए राजनाथ और डोभाल को फोन किया। दस मिनट बाद, नॉर्दर्न कमांड ने फिर से फोन किया। चीनी टैंक नहीं रुके थे। वे अब टॉप से ​​सिर्फ पांच सौ मीटर दूर थे।  नरवणे को याद है कि लेफ्टिनेंट जनरल जोशी ने कहा था कि “चीनी सेना को रोकने का एकमात्र तरीका हमारी अपनी मीडियम आर्टिलरी से फायरिंग करना था, जो तैयार थी और आदेश का इंतजार कर रही थी।”   

वे लिखते हैं कि पाकिस्तान के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर आर्टिलरी की लड़ाई आम बात थी, जहां डिवीजनल और कोर कमांडरों को ऊपर किसी से पूछे बिना हर दिन सैकड़ों राउंड फायर करने का अधिकार दिया गया था। लेकिन यह चीन था। यहां बात अलग थी। PLA के साथ आर्टिलरी की लड़ाई बहुत नाजुक स्थिति में बदल सकती थी।  “मेरी स्थिति नाज़ुक थी,” 

नरवणे लिखते हैं। ‘कमांड जो सभी संभावित तरीकों से फायरिंग शुरू करना चाहता था’ और ‘एक सरकारी समिति जिसने अभी तक स्पष्ट आदेश नहीं दिए थे’। इनके बाच नरवणे फंसे हुए थे। सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में, विकल्पों पर विचार किया जा रहा था और उन्हें खारिज किया जा रहा था। पूरा नॉर्दर्न फ्रंट हाई अलर्ट पर था।  

टकराव की संभावित जगहों पर नज़र रखी जा रही थी। लेकिन फैसले का पॉइंट रेचिन ला था। नरवणे ने रक्षा मंत्री को एक और फोन किया, जिन्होंने वापस फोन करने का वादा किया। समय बीतता गया। हर मिनट, चीनी टैंक टॉप पर पहुंचने के एक मिनट करीब आ रहे थे।   

राजनाथ सिंह ने रात 10.30 बजे वापस फोन किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी, जिनके निर्देश एक ही वाक्य में थे: “जो उचित समझो, वह करो” यानी ‘जो आपको ठीक लगे, वह करो’।  

यह ‘पूरी तरह से एक सैन्य फैसला’ होने वाला था। मोदी से सलाह ली गई थी। उन्हें ब्रीफ किया गया था। लेकिन उन्होंने फैसला लेने से मना कर दिया था।  नरवणे याद करते हैं कि “मुझे एक गर्म आलू पकड़ा दिया गया था और अब पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर थी।”

आज सदन में,इसी कायरता को ढंकने के लिए चिल्ला चिल्लाकर सदन को बाधित किया और आखिरकार सदन स्थगित कर दिया गया।

आखिरकार राजनाथ सिंह कैसे रक्षामंत्री हैं जिन्होंने अपने देश की भूमि पर चीनी फौज को बढ़ने से रोकने का आदेश नहीं दिया। नरवणे जी को उलझा दिया। प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री दोनों खुद चीन के डर से अपने अधिकार का उपयोग नहीं कर पाए। सवाल उठता है क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आगे जिस तरह मोदीजी नतमस्तक हैं अपनी पोल खोलने से रोक कर भारत की आर्थिक समृद्धि को क्षति पहुंचा रहे उसी तरह चीन में मानसी सोनी और उनकी रंग रैलियों के वीडियो से मोदीजी डरे हुए हैं। इसलिए डोकलाम , पैगाग झील तथा अक्साई चीन और चीन के बढ़ते कदम रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। अमेरिका जिस तरह आहिस्ता आहिस्ता ऐप्सटीन फाइल के पन्ने खोल रहा है ऐसा ही चीन भी यदि आवाज़ उठाई तो एक नई फ़ाइल सामने आ सकती है।लगता है चीन, मोदीजी रहे तो डरा धमकाकर कर हमारी चिकिन नेक पर कब्ज़ा कर बांग्लादेश देश को अपने को जोड़ देगा।

ऐसे मुश्किलात में फंसीं भाजपा सरकार और क्या कर सकती सदन में प्रतिपक्ष नेता की आवाज़ दबा सकती है। लेकिन अब नरवणे की पुस्तक ज़रुर सामने आएगी कब तक प्रकाशन पर रोक लगेगी।सदन में सरकार के मंत्रियों की उठाबैठक यह भी बता रही है उस पुस्तक में नेता प्रमुखों सलाहकार के बारे में और भी बहुत कुछ है जिससे सब डरे हुए हैं। पूर्व आर्मी चीफ नरवणे और प्रतिपक्ष नेता की आवाज़ को कुचलना और भारतीय सीमाओं पर कब्ज़ा करना अब जनता के सामने आ गया है।एक ना एक दिन सच बाहर आ ही जाता है।

अपनी निजी बदनामी और बेइज्जती के एवज में देश के साथ ये गंदा सौदा उसे कमज़ोर कर रहा है।ये सदाएं देश को झकझोर रहीं हैं।याद रखिए देश सुलग रहा है।

Ramswaroop Mantri

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