अमरकंटक से आरम्भ अमरकंटक में अंत। दूरी 3500 किलोमीटर समय 96 दिन लगभग 37 किलोमीटर प्रतिदिन दिन माँ नर्मदा की पैदल परिक्रमा। 3500 किमी की दूरी..वो भी पैदल.. मौसम की ठंडक और रास्ता भी दुर्गम … कई संत / महात्मा इस परिक्रमा को 3 साल 3 महीने 13 दिन में पूर्ण करते है।
नदी की पैदल परिक्रमा ..क्या मिलेगा इससे..? क्या मिलेगा..? क्या नहीं मिलेगा पर बहुत कुछ मिला सैकड़ों दिनों तक नर्मदा मैया (प्रकृति) का सानिध्य … दुनियाँ में केवल एक ही नदी है नर्मदा जिसकी परिक्रमा की जाती है। जीवन में आत्मविश्वास,सात्विकता.. संतुष्टि.. किसी को जीतने की जगह अपने मन पर विजय प्राप्त करना और पता नहीं क्या क्या मिला ? जिसकी कल्पना नहीं केवल अनुभूति ही की जा सकती है।
दोहराने से कविता की लाइन, उसके परिवर्तन से प्राप्त ऊर्जा दुरूह को सुगम कर देती है।
जब तक बढ़े न पाँव, तभी तक ऊँचाई है
वरना, शिखर कौन सा है, जो छुआ न जाए।
जब तक कसी न कमर, तभी तक कठिनाई है
वरना, काम कौनसा है, जो किया न जाए ।
जिसने चाहा पी डाले सागर के सागर
जिसने चाहा घर बुलवाए चाँद-सितारे
कहने वाले तो कहते हैं बात यहाँ तक
मौत मर गई थी जीवन के डर के मारे ।
जब तक खुले न पलक, तभी तक कजराई है
वरना, तम की क्या बिसात, जो पिया न जाए ।
तुम चाहो सब हो जाए, बैठे ही बैठे
सो तो सम्भव नहीं भले कुछ शर्त लगा दो
बिना बहे पाई हो जिसने पार आज तक
एक आदमी भी कोई ऐसा बता दो ।
जब तक खुले न पाल, तभी तक गहराई है
वरना, वे मौसम क्या, जिनमें जिया न जाए ।
यह माना तुम एक अकेले, शूल हज़ारों
घटती नज़र नहीं आती मंज़िल की दूरी
लेकिन पस्त करो मत अपने स्वस्थ हौसले
समय भेजता ही होगा जय की मंज़ूरी ।
कवि मुकुट बिहारी सरोज






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