अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

12 #फरवरी राष्ट्रव्यापी श्रमिक हड़ताल*

Share

श्रम अधिकार कटघरे में शोषण व्यवस्था निर्दोष घोषित*

हड़ताल को सामाजिक समर्थन की दरकार*

हरनाम सिंह

       देश में शारीरिक श्रम करने वाले श्रमिक हों अथवा कार्यालय में काम करने वाले सफेद पोश कर्मचारी, गाहे-बगाहे वे अपनी मांगों को लेकर हड़ताल प्रदर्शन करते रहे हैं। विगत कई वर्षों से आशा- उषा, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गांधी चौराहे पर धरना प्रदर्शन करती रही है। ऐसे अनेक कर्मचारी जो मेहनत के माध्यम से बेहद कम पगार पर कठिन परिस्थितियों में अपने परिवार का पालन पोषण करते हैं। उन्हें सरकार सामाजिक सुरक्षा देने से इंकार करती है। दैनिक वेतन भोगी, अतिथि शिक्षक जैसे अनेक नामधारी पद हैं। इन सबके मूल में निर्मम शोषण है। कम पगार देकर अधिक काम लेना यही इस व्यवस्था का न्याय है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा मनरेगा को कमजोर करते हुए ग्रामीण श्रमिकों के अधिकारों पर कुठाराघात किया गया। इन सब के बीच श्रमिक वर्ग के लिए सर्वोच्च न्यायालय की कुछ टिप्पणियों ने सरकार और उसकी व्यवस्था के वर्ग चरित्र को बेनकाब कर दिया है। इन तमाम परिस्थितियों से शेष समाज अछूता नहीं रह सकता। एक तरफ गरीबी है असमानता है दूसरी ओर विकास के फर्जी दावे हैं। अब नागरिक समाज को तय करना होगा कि वह शोषणकारी व्यवस्था के साथ है अथवा मजदूरों और किसानों के साथ है।

क्यों हो रही है हड़ताल ?*

         12 फरवरी की हड़ताल प्रमुख रूप से केंद्र सरकार द्वारा 29  श्रम कानून के स्थान पर थोपे गए 4 नए कानूनों के खिलाफ है, जिनके चलते हड़ताल जैसे संवैधानिक अधिकार को सीमित कर दिया गया है। ये नए कानून नियोक्ताओं के पक्ष में हैं। इनमें रोजगार की सुरक्षा को कम करते हुए अनुबंध आधारित एवं आउटसोर्स नौकरियों की ओर बेरोजगारों को धकेला जा रहा है। इस व्यवस्था में कर्मचारियों के लिए न पेंशन है, नहीं तरक्की के अवसर और नहीं सामाजिक सुरक्षा। यह कानून नई गुलामी की शुरुआत है। पूंजीपतियों को शोषण का पूरा अधिकार दे दिया गया है। इन कानूनों के कारण कर्मचारी संगठनों की सामूहिक मोल- भाव की क्षमता कम हो गई है।
         सरकार श्रम कानून में सुधार के नाम पर मेहनतकश जनता के शोषण को वैधानिकता प्रदान कर रही है। सरकार स्वयं सफाई कर्मियों, आशा- ऊषा, आंगनवाड़ी, मिड डे मिल, सुरक्षा गार्ड, डिलीवरी बाय, ड्राइवर, गिग वर्कर, एप आधारित रोजगार प्राप्त करने वालों को कर्मचारी ही नहीं मानती है। प्रदेश में विगत सात माह से आशा कार्यकर्ताओं को दी जा रही न्यूनतम राशि भी नहीं दी जा रही है।

      सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देश में औद्योगिक बदहाली के लिए ट्रेड यूनियनों को ज़िम्मेदार ठहराना और घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन की मांग को एक झटके में खारिज कर देना—ये दोनों घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं। ये उस वर्गीय दृष्टि की ही अभिव्यक्ति हैं, जिसमें श्रम को समस्या और पूंजी को समाधान मान लिया गया है।

         यह कहना कि ट्रेड यूनियनें उद्योग की प्रगति में बाधक हैं, न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से मुंह मोड़ना है, बल्कि एक खतरनाक नरेटिव गढ़ना भी है। यदि यूनियनें ही बदहाली का कारण थीं, तो फिर वे देश कैसे संपन्न  हैं जहाँ यूनियनें मज़बूत हैं, लेकिन उद्योग भी फल-फूल रहे हैं? सच्चाई यह है कि भारत की औद्योगिक समस्याओं की जड़ नीतिगत अस्थिरता, असमान विकास, कॉरपोरेट एकाधिकार और श्रम-विरोधी सुधारों में है—न कि श्रमिकों के संगठित प्रतिरोध में।

           ट्रेड यूनियनें उद्योग की दुश्मन नहीं, बल्कि उसे सभ्य बनाने वाली ताकत रही हैं। आठ घंटे का कार्य दिवस, कार्यस्थल पर सुरक्षा मानक, न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा—ये सब यूनियन संघर्षों की देन हैं। इन्हें बाधा बताना दरअसल यह कहना है कि उद्योग का विकास श्रमिक के अधिकार कुचल कर ही संभव है।

        घरेलू कामगारों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। घंटों काम करने के पर भी कामगार को 5 से 10 हजार रुपए ही मिल पाते हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक है घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन की याचिका को “नीति का विषय” बताकर खारिज किया जाना। जो श्रम रोज़ घरों के संचालन में मददगार होता है। बच्चों को संभालता है, बुजुर्गों की सेवा करता है—उसे न्यूनतम वेतन के योग्य भी न मानना क्या न्याय है? संविधान गरिमामय जीवन यापन की बात करता है, पर जब बात सबसे कमजोर श्रमिकों की आती है, तो वही गरिमा अचानक अदृश्य हो जाती है।

         यह न्यायिक संयम नहीं, बल्कि न्यायिक पलायन है। कॉरपोरेट अधिकारों, अनुबंधों और निवेश सुरक्षा पर अदालतें सक्रिय रहती हैं, लेकिन श्रमिकों के मामले में “नीति” की दीवार खड़ी कर दी जाती है। यह संतुलन नहीं, शोषण की व्यवस्था के प्रति स्पष्ट झुकाव है।

         सबसे बड़ा खतरा यह है कि ऐसे वक्तव्य और फैसले समाज को यह संदेश देते हैं कि शोषण सामान्य है और उसका विरोध अस्वीकार्य। जब यूनियनें दोषी और घरेलू कामगार हक़ से बाहर कर दिए जाएँ, तो सवाल सिर्फ न्यायपालिका का नहीं रह जाता—सवाल लोकतंत्र और संविधान की आत्मा का बन जाता है।

        न्याय का अर्थ असुविधाजनक सच बोलना है, न कि शक्तिशाली के तर्क दोहराना। यदि श्रम को कटघरे में खड़ा किया जाएगा और शोषण को व्यवस्था की मजबूरी बताया जाएगा, तो देश में उद्योग तो चलेंगे पर न्याय नहीं हो पाएगा।

        निजीकरण की नीतियों के कारण श्रमिक- कर्मचारियों की बीमारी, बुढ़ापा और दुर्घटना सब उसकी व्यक्तिगत समस्या बना दी गई है। "सबका साथ- सबका विकास" के नाम पर पूंजी पतियों के हितों की रक्षा करने वाली सरकार अब कॉरपोरेट हित को ही राष्ट्रहित बता रही है। श्रमिक वर्ग जब न्यूनतम जीवन स्तर की मांग करता है तो उसे विकास में बाधा प्रचारित कर समाज को गुमराह किया जाता है। 
      12 फरवरी की हड़ताल केवल श्रमिक वर्ग की हड़ताल नहीं है, अपितु समूचे समाज का भविष्य निर्धारण का  एक अवसर है।  श्रम आंदोलन का समर्थन करना अपने ही अधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा करना है। श्रमिक वर्ग की पराजय समाज की पराजय होगी ।मजदूरी घटती है तो खरीदने की क्षमता भी कम होती है। इसके चलते बाजार में मंदी आती है, जिसका असर छोटे व्यापारियों, किसानों और पर भी पड़ता है। इतिहास बताता है कि जो अधिकार पहले मजदूरों से छीने जाते हैं बाद में वही अधिकार मध्य वर्ग और  कर्मचारियों से भी छीने जाते हैं। यह हड़ताल वेतन बढ़ाने के लिए नहीं है अपितु सरकार की पूंजीपतिपरस्त नीतियों से असहमति व्यक्त करने के अधिकार की अभिव्यक्ति है। अगर आज मजदूर, कर्मचारियों का दमन होगा तो कल समाज के अन्य तबके भी सरकार के आसान शिकार बन जाएंगे। समाज तटस्थ नहीं रह सकता *मुझे क्या* अथवा *मेरी बला से* की स्थिति अंततः शोषण व्यवस्था को ही मजबूत करती है। समाज को हड़ताल का समर्थन इसलिए करना चाहिए क्योंकि यह केवल श्रमिक वर्ग का संघर्ष नहीं है यह मानव गरिमा लोकतंत्र और न्याय का प्रश्न है। श्रमिकों के साथ शेष समाज खड़ा होगा तभी व्यवस्था बदलेगी। शायद ऐसे ही समय के लिए रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कालजयी रचना "परशुराम की प्रतीक्षा" में अन्याय के खिलाफ खामोश रहने वालों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हुए कहा था -

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध*

जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध*

Ramswaroop Mantri

Add comment

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें