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पेंशन : जीवन की संध्या की वफ़ादार नायिका

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(एक व्यंग्यात्मक-दार्शनिक लेख)

-तेजपाल सिंह ‘तेज’

 जब नौकरी कहती है — “अब मैं चलती हूँ…”

        जीवन की कहानी भी क्या अद्भुत पटकथा है। युवावस्था में नौकरी एक नयी-नवेली प्रेमिका की तरह जीवन में प्रवेश करती है—रोमांच, सपने, लक्ष्य और महीने की पहली तारीख का जादू। सुबह की दौड़, बॉस की डांट, फाइलों की खुशबू और वेतन-दिवस का रोमांस… सब कुछ किसी तेज़ रफ्तार फिल्म जैसा लगता है। लेकिन समय का निर्देशक बड़ा कठोर होता है। धीरे-धीरे बालों में चाँदी उतरने लगती है, घुटनों में संगीत बजने लगता है, और चश्मे के बिना दुनिया धुंधली हो जाती है। तभी नौकरी मुस्कुरा कर कहती है— “प्रिय, मेरी भूमिका यहीं तक थी… अब मैं जा रही हूँ। पर चिंता मत करो, मैं तुम्हारे लिए एक ऐसी नायिका छोड़ जा रही हूँ जो अंतिम दृश्य तक साथ निभाएगी।” उस नायिका का नाम है — पेंशन

 अध्याय 1 : वेतन — चंचल प्रेमिका

        वेतन बड़ी नटखट चीज़ है। महीने की पहली तारीख को बड़े प्रेम से आती है और पाँच-दस दिनों में उड़नछू हो जाती है। कभी बिजली बिल ले जाता है, कभी बच्चों की फीस, कभी EMI और कभी अचानक किसी रिश्तेदार की शादी।

वेतन का स्वभाव बिल्कुल आधुनिक प्रेमिका जैसा है—

·       मूड बदलता रहता है

·       कभी ज्यादा, कभी कम

·       और कभी बोनस के नाम पर सरप्राइज गिफ्ट दे देती है

        किंतु अंततः उसकी नियति अस्थायी ही होती है। वह कहती है—“मैं जवान दिनों की साथी हूँ, स्थायी रिश्ता मत समझना।”

अध्याय 2 : सेवानिवृत्ति — जीवन का इंटरवल

        एक दिन ऑफिस की विदाई पार्टी होती है। फूल मिलते हैं, भाषण होते हैं, और लोग कहते हैं— “अब आराम कीजिए!” लेकिन घर लौटते ही सच्चाई सामने आती है। सुबह 9 बजे न ऑफिस जाना, न मीटिंग, न बॉस का फोन। अचानक लगता है कि जीवन की फिल्म का इंटरवल आ गया है। यहीं से मन में सवाल उठता है —“अब आगे क्या?” और तभी दरवाजे पर दस्तक होती है…

अध्याय 3 : पेंशन — संस्कारी और वफ़ादार नायिका

        पेंशन का स्वभाव अद्भुत है। यह हर महीने समय पर आती है, मुस्कुराकर कहती है—“डार्लिंग, मैं आ गई हूँ… पूरे महीने तुम्हारे साथ रहूँगी।”

न कोई नखरा, न कोई शिकायत। न कभी डेट मिस, न कभी ब्रेकअप। पेंशन उस भारतीय नायिका की तरह है जो सादगी में विश्वास रखती है—

·       घर चलाती है

·       दवाइयाँ दिलाती है

·       चाय और नाश्ते की मुस्कान बनाए रखती है। उसका प्यार शांत है, स्थिर है, और गहरा है।

अध्याय 4 : दार्शनिक सत्य — कमाई का कर्मफल

        अगर थोड़ा गहराई से सोचें तो पेंशन सिर्फ पैसा नहीं है। यह वर्षों की मेहनत, अनुशासन और धैर्य का कर्मफल है। जवानी में जो समय आपने दिया,
जो पसीना बहाया, जो तनाव झेला — वही बुढ़ापे में बदलकर पेंशन बन जाता है। वेतन वर्तमान का पुरस्कार है, लेकिन पेंशन अतीत की तपस्या का आशीर्वाद।

अध्याय 5 : व्यंग्य का मीठा सच

        समाज भी बड़ा मज़ेदार है। जवानी में लोग पूछते हैं — “कितनी सैलरी है?” और बुढ़ापे में पूछते हैं – “पेंशन कितनी है?” बच्चे अचानक अधिक सम्मान देने लगते हैं, बैंक वाले मुस्कुराकर कुर्सी देते हैं, और रिश्तेदार कहते हैं —
“अंकल जी, अब तो जिंदगी सेट है!” दरअसल, पेंशन वह शक्ति है जो बुजुर्ग को “रिटायर” नहीं होने देती; वह केवल नौकरी से मुक्त करती है, जीवन से नहीं।

अध्याय 6 : शाम की चाय और स्थिर प्रेम

        शाम को जब पुराने गाने बजते हैं, चाय की भाप उठती है, और दिन की भागदौड़ शांत हो जाती है—तब पेंशन पास बैठकर कहती है—“डरो मत मेरे हीरो, पूरी फिल्म में मैं तुम्हारे साथ हूँ।” यही वह क्षण है जब समझ आता है कि असली सुख तेज़ दौड़ में नहीं, बल्कि धीमे और निश्चित कदमों में है।

उपसंहार : अंतिम दृश्य का सुखद अंत

        जीवन की पटकथा में वेतन चमकदार अध्याय हो सकता है, लेकिन पेंशन उसका संतुलित समापन है। सेलेरी एक अस्थायी प्रेमिका है—जो एक दिन अलविदा कह देती है। पर पेंशन जीवन की वह सच्ची नायिका है जो अंतिम दृश्य तक साथ निभाती है और कहानी को सुखद अंत देती है। और शायद यही जीवन का सार भी है—जवान दिनों में हम भविष्य के लिए मेहनत करते हैं, और बुज़ुर्ग दिनों में वही भविष्य पेंशन बनकर हमें गले लगा लेता है।

आदरणीय सभी पेंशनभोगियों को प्रणाम —आप सचमुच जीवन की उस फिल्म के अनुभवी नायक हैं, जिनकी कहानी का संगीत धीमा जरूर है, पर सबसे मधुर है।

Ramswaroop Mantri

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