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लोकतंत्र और कब तक?

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

            लोकतंत्र केवल चुनावों की नियमितता का नाम नहीं है; यह नागरिक स्वतंत्रता, वैचारिक बहुलता, संस्थागत संतुलन और नैतिक उत्तरदायित्व का सम्मिलित तंत्र है। संविधान इसकी रीढ़ है, परंतु इसकी आत्मा नागरिक चेतना में बसती है। जब सार्वजनिक जीवन में असहिष्णुता, भय, दुष्प्रचार और प्रतीकों के विध्वंस जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगती हैं, तब यह प्रश्न तीव्र हो उठता है—

            लोकतंत्र केवल एक शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि एक जीवित चेतना है। यह संविधान की धाराओं में जितना लिखा होता है, उससे कहीं अधिक लोगों के मन, व्यवहार और सार्वजनिक जीवन में बसता है। जब किसी समाज में उसके राष्ट्र निर्माताओं, विचारकों और स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत पर आघात होने लगते हैं, जब असहमति को अपराध और प्रश्न पूछने को विद्रोह माना जाने लगे, तब यह पूछना स्वाभाविक हो जाता है—लोकतंत्र और कब तक?

            हाल के वर्षों में देश के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में जो घटनाएँ सामने आई हैं, वे केवल अलग-थलग घटनाएँ नहीं हैं; वे एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती हैं। मूर्तियों का गिराया जाना, वैचारिक असहमति को देशद्रोह की संज्ञा देना, विपक्ष की आवाज़ को सीमित करना, मीडिया का पक्षधर होना, और न्यायिक संस्थाओं पर प्रश्न उठना—ये सब मिलकर लोकतंत्र के स्वास्थ्य का तापमान बताते हैं।

लोकतंत्र और कब तक?

            पिछले वर्षों में देश की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों ने कई ऐसे संकेत दिए हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों की सेहत पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। यह विमर्श किसी दल-विशेष के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि उस व्यापक वातावरण का विश्लेषण है जिसमें लोकतंत्र साँस लेता है।

1. इतिहास से टकराव  और राष्ट्र निर्माताओं का अपमान:

            किसी राष्ट्र के संस्थापकों की प्रतिमाएँ केवल पत्थर या धातु नहीं होतीं; वे उस राष्ट्र की स्मृति, आदर्श और ऐतिहासिक चेतना का प्रतीक होती हैं। जब आधुनिक भारत के शिल्पकार माने जाने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा को बुलडोजर से गिराया जाता है, तो यह केवल एक मूर्ति का ध्वंस नहीं होता, बल्कि एक विचारधारा पर प्रहार का संदेश होता है।

            इतिहास साक्षी है कि जब भी समाजों ने अपने अतीत को तोड़ने की कोशिश की है, वे भीतर से विखंडित हुए हैं। 2001 में अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की मूर्तियों का विध्वंस केवल सांस्कृतिक अपराध नहीं था; वह असहिष्णुता की चरम अभिव्यक्ति थी। इसी प्रकार, बांग्लादेश में शेख मुजीबुर्रहमान की प्रतिमा पर हमले ने वहाँ की राजनीतिक अस्थिरता को उजागर किया। भारत जैसे बहुलतावादी देश में यदि राष्ट्र निर्माताओं की विरासत विवाद का विषय बन जाए, तो यह लोकतांत्रिक परिपक्वता पर प्रश्नचिह्न है।

            राष्ट्र निर्माताओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएँ मात्र धातु या पत्थर नहीं होतीं; वे राष्ट्रीय स्मृति और वैचारिक दिशा की प्रतीक होती हैं। जब पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने या हटाने की घटनाएं सामने आती हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध आक्रोश नहीं होता—यह इतिहास की व्याख्या को राजनीतिक हथियार बनाने की प्रवृत्ति का संकेत होता है।

            इसी प्रकार, देश के विभिन्न हिस्सों में डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएँ समय-समय पर सामने आई हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की परीक्षा है। विश्व इतिहास बताता है कि जब समाज अपने अतीत को नष्ट करने लगता है, तो वह अपने वर्तमान को भी अस्थिर कर देता है। 2001 में अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की मूर्तियों का विध्वंस इसका उदाहरण है—वह केवल सांस्कृतिक विनाश नहीं, बल्कि वैचारिक असहिष्णुता का प्रदर्शन था।

2. भीड़तंत्र और कानून का क्षरण

            लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है—कानून का शासन (Rule of Law)। परंतु जब भीड़ स्वयं न्याय करने लगे, तो वह लोकतंत्र नहीं, भीड़तंत्र (Mobocracy) बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में मॉब लिंचिंग की घटनाएं चर्चा में रही हैं। संदेह, अफवाह या धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा—यह प्रवृत्ति सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करती है। यदि अपराधी खुलेआम वीडियो बनाकर हिंसा का प्रदर्शन करें और समाज का एक वर्ग इसे वैचारिक विजय मान ले, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। कानून का भय समाप्त होना, न्याय की प्रक्रिया में अविश्वास और राजनीतिक संरक्षण की आशंका—ये सब लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से खोखला करते हैं।

3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव

            लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा होती है। किंतु जब—

·         पत्रकारों पर राजद्रोह या कठोर कानूनों के तहत मुकदमे दर्ज हों,

·         विश्वविद्यालयों में छात्र आंदोलनों को देशविरोधी ठहराया जाए,

·         फिल्मों, पुस्तकों या कला प्रदर्शनों पर प्रतिबंध की माँग बढ़े, —तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चुनौती है। हाल के वर्षों में कई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी या पूछताछ की घटनाओं ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या आलोचना को अपराध माना जा रहा है? लोकतंत्र में सरकार और राष्ट्र एक नहीं होते; सरकार की आलोचना राष्ट्र की आलोचना नहीं है।

4. डिजिटल दुष्प्रचार और सूचना का संकट

            आज सूचना-प्रौद्योगिकी लोकतंत्र की शक्ति भी है और चुनौती भी। “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” जैसे व्यंग्यात्मक शब्द इस बात की ओर संकेत करते हैं कि अपुष्ट सूचनाएँ और आधी-अधूरी खबरें कितनी तेजी से जनमत को प्रभावित कर रही हैं। फर्जी वीडियो, सांप्रदायिक अफवाहें और विकृत इतिहास—ये सब सामाजिक विभाजन को बढ़ाते हैं। यदि नागरिक सत्यापन की आदत छोड़ दें और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं पर आधारित राजनीति को बढ़ावा दें, तो लोकतंत्र तर्कसंगत विमर्श से दूर चला जाता है।

5. चुनावी प्रक्रिया और विश्वास का प्रश्न

            लोकतंत्र का हृदय चुनाव हैं। यदि चुनावी प्रक्रिया पर अविश्वास बढ़ने लगे—चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को लेकर हो, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल हों, या धनबल और बाहुबल का प्रभाव—तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। चुनाव केवल परिणाम का नाम नहीं; वह प्रक्रिया की पारदर्शिता और सभी दलों के लिए समान अवसर का भी नाम है।

6. संस्थागत संतुलन का संकट : संसद, न्यायपालिका और मीडिया

लोकतंत्र तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—पर टिका होता है, जबकि मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है।

·         यदि संसद में विपक्ष की आवाज़ सीमित हो जाए,

·         यदि बहस की परंपरा औपचारिकता बन जाए,

·         यदि न्यायिक निर्णयों पर लगातार पक्षपात के आरोप लगें,

·         यदि मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता की प्रशंसा में व्यस्त हो जाए, तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है।

            भारत में आपातकाल (1975-77) के दौरान भी लोकतंत्र की परीक्षा हुई थी। तब प्रेस पर सेंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया। किंतु जनता ने अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्स्थापित किया। आज परिस्थितियां भिन्न हैं—संविधान और कानून औपचारिक रूप से कायम हैं, परंतु उनकी आत्मा पर बहस जारी है।

            लोकतंत्र में संसद बहस का मंच है। यदि विधेयक बिना व्यापक चर्चा के पारित हों, यदि विपक्ष की आवाज़ बार-बार निलंबन या व्यवधान में दब जाए, तो संवाद की संस्कृति कमजोर होती है। न्यायपालिका लोकतंत्र की अंतिम आशा मानी जाती है। किंतु यदि न्यायिक नियुक्तियों, निर्णयों या देरी पर लगातार सार्वजनिक प्रश्न उठें, तो विश्वास की दरारें गहरी हो सकती हैं। मीडिया, जिसे चौथा स्तंभ कहा जाता है, यदि निष्पक्ष प्रहरी के बजाय राजनीतिक प्रचारक के रूप में देखा जाने लगे, तो लोकतंत्र का संतुलन और डगमगा जाता है।

7. सामाजिक ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक असुरक्षा

            लोकतंत्र का आधार संवाद है, परंतु जब संवाद की जगह दुष्प्रचार और नफरत ले लेती है, तब समाज की संरचना कमजोर होने लगती है। आज सोशल मीडिया, विशेषकर तथाकथित “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी”, सूचनाओं के बजाय भ्रम और विभाजन फैलाने का माध्यम बनती जा रही है।

            राजनीतिक विमर्श में विरोधी दलों को शत्रु की तरह प्रस्तुत करना, उन्हें देशविरोधी बताना या व्यक्तिगत हमलों तक उतर आना—यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा के विपरीत है।

यदि किसी विपक्षी नेता को खुलेआम धमकियां मिलती हैं, और समाज का एक हिस्सा उसे सामान्य मान लेता है, तो यह गंभीर संकेत है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, कमजोरी नहीं।

            भारत की शक्ति उसकी विविधता है। किंतु जब धार्मिक या जातीय पहचान के आधार पर राजनीतिक लामबंदी बढ़ती है, तो सामाजिक ध्रुवीकरण गहरा होता है। अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना और बहुसंख्यक समुदाय में श्रेष्ठताबोध—दोनों ही लोकतांत्रिक संतुलन के लिए हानिकारक हैं। लोकतंत्र संख्या की शक्ति से चलता है, परंतु उसकी नैतिकता समान अधिकारों पर आधारित होती है।

8. युवाओं का मोहभंग और बेरोजगारी

            लोकतंत्र की स्थिरता आर्थिक अवसरों से भी जुड़ी है। बढ़ती बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, और युवाओं में निराशा—ये सब सामाजिक असंतोष को

जन्म देते हैं।  जब युवा वर्ग वैचारिक विमर्श के बजाय भावनात्मक उग्रता की ओर आकर्षित होता है, तो लोकतांत्रिक संस्कृति प्रभावित होती है।

9. नागरिक समाज और प्रतिरोध की परंपरा

            आज का भारत युवा देश है। यदि युवा वर्ग केवल डिजिटल अभियानों तक सीमित रह जाए और वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक सहभागिता से दूर हो जाए, तो लोकतंत्र का भविष्य कमजोर होगा। नागरिक समाज, बुद्धिजीवी वर्ग, और स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतांत्रिक विमर्श के प्राण हैं। यदि वे भय या सुविधा के कारण मौन हो जाएँ, तो लोकतंत्र का क्षरण तीव्र हो जाता है। भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल तक नागरिक प्रतिरोध की समृद्ध परंपरा रही है। महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के माध्यम से अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष का मार्ग दिखाया। आज भी यदि नागरिक समाज, छात्र, बुद्धिजीवी और पत्रकार सजग रहें, तो लोकतंत्र का संतुलन बना रह सकता है। लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं; यह नागरिकों की सतत भागीदारी पर निर्भर है।

लोकतंत्र और कब तक?

            यह प्रश्न निराशा से नहीं, आत्ममंथन से जन्म लेता है। लोकतंत्र तब तक जीवित रहेगा जब तक —

·          कानून भीड़ से ऊपर रहेगा,

·         प्रश्न पूछना अपराध नहीं बनेगा,

·         इतिहास को बदला नहीं, समझा जाएगा,

·         संस्थाएँ व्यक्तियों से बड़ी रहेंगी।

·         नागरिक प्रश्न पूछते रहेंगे,

·         न्यायपालिका स्वतंत्र निर्णय देती रहेगी,

·         मीडिया निष्पक्षता का साहस दिखाएगा,

·         और राजनीतिक दल वैचारिक मतभेद को शत्रुता में परिवर्तित नहीं करेंगे।

लोकतंत्र का अंत अचानक नहीं होता; वह धीरे-धीरे कमजोर होता है। इसलिए सजग नागरिकता ही उसकी अंतिम रक्षा है। लोकतंत्र का क्षरण धीरे-धीरे होता है—पहले भाषा बदलती है, फिर व्यवहार, फिर संस्थाएँ।

उपसंहार

            भारत का लोकतंत्र अनेक चुनौतियों से गुज़रा है—विभाजन की त्रासदी, आपातकाल, आतंकवाद, आर्थिक संकट—किन्तु हर बार उसने स्वयं को पुनर्स्थापित किया है। आज भी परिस्थितियाँ जटिल हैं। राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक तनाव, और संस्थागत अविश्वास जैसे तत्व लोकतंत्र की परीक्षा ले रहे हैं।

            परंतु आशा का आधार यह है कि भारतीय समाज में बहुलता, सहिष्णुता और प्रतिरोध की परंपरा गहरी है। यदि नागरिक सजग रहें, संस्थाएँ आत्ममंथन करें, और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन करें, तो लोकतंत्र न केवल बचेगा, बल्कि और सशक्त होगा।

            अंततः, लोकतंत्र किसी सरकार का उपहार नहीं—यह जनता की अर्जित धरोहर है। प्रश्न “लोकतंत्र और कब तक?” का उत्तर भी जनता के हाथ में ही है। जब तक नागरिक जागरूक हैं, लोकतंत्र जीवित है। जब नागरिक मौन हो जाएँ—तभी उसका अंत शुरू होता है। लोकतंत्र न केवल बचेगा बल्कि सशक्त भी होगा। अंततः लोकतंत्र कोई स्थायी उपलब्धि नहीं—यह सतत साधना है। प्रश्न “लोकतंत्र और कब तक?” का उत्तर भी हमारे सामूहिक आचरण में छिपा है। जब तक नागरिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिए खड़े हैं—तब तक लोकतंत्र जीवित है।

(आशीष चित्रांशी हूँ:https://youtu.be/FRyknUttx7A?si=7Rw4wlVZimITlrMY)

Ramswaroop Mantri

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