समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ईरान युद्ध को लेकर भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार की विदेश नीति को लेकर तीखा हमला बोला है. अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार ने विदेश नीति को गिरवी रख दिया है. उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह युद्ध के प्रति अपना रुख स्पष्ट करे और बताए कि इस मुद्दे को किस रूप में देख रही है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा पर गए पत्रकारों की सुरक्षित वापसी कैसे सुनिश्चित की जाएगी, और क्या भारत अमेरिका के निर्देशों का पालन कर रहा है.बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ईरान युद्ध को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए. पार्लियामेंटके बाहर जब उनसे मीडिया ने सवाल किए कि विपक्ष लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला रहा है, इसके लिए क्या तैयारी है तो उन्होंने इस मामले को ईरान युद्ध से जोड़ दिया.
अखिलेश यादव ने कहा, “सरकार अपना पक्ष साफ करे कि वॉर को किस तरीके से ले रहे हैं. प्रधानमंत्री जी के साथ जो जर्नलिस्ट गए थे वह कैसे लौटेंगे वापस? हम अमेरिका का आर्डर मान रहे हैं.” उन्होंने आगे आरोप लगाया कि “भारतीय जनता पार्टी की सरकार में विदेश नीति को गिरवी रख दिया गया.” यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहा है, और भारत की तटस्थता या गठबंधन नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं.
अखिलेश यादव से जब पूछा गया कि लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर विपक्ष का क्या प्लान है. इस पर उन्होंने कहा कि अभी फ्लोर लीडर्स की मीटिंग होगी. उन्होंने कहा कि जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है और कई लोग त्यौहार नहीं मना पाए, उनके लिए भारत सरकार क्या कर रही है. इस सरलार ने देश की विदेश नीति को गिरवी रख दिया. सुनने में आया है कि कई जर्नलिस्ट जो प्रधानमंत्री के साथ गए थे वे अभी भी फंसे हुए हैं. उनका कहना था कि सरकार की विदेश नीति स्वतंत्र नहीं रह गई है, बल्कि बाहरी दबावों के आगे झुक रही है, जो राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा है.
बीजेपी की तरफ से नहीं आई प्रतिक्रिया
हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक अखिलेश यादव के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. भाजपा समर्थकों ने इसे विपक्ष की निराधार आलोचना बताया है और कहा कि भारत की विदेश नीति हमेशा स्वतंत्र और राष्ट्रीय हितों पर आधारित रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी चुनावों में विदेश नीति को एक बड़ा चुनावी हथियार बना सकता है.






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