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क्या मोदी लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने की अपील कर सकते हैं?

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अरुंधती धुरू और संदीप पांडेय

1965 में जब भारत पाकिस्तान के साथ युद्ध झेल रहा था और अमरीका भारत के खाद्यन्न संकट को दूर करने के लिए पी.एल. 480 समझौते के तहत भारत को गेहूं उपलब्ध करा रहा था लेकिन साथ ही भारत की विदेश नीति प्रभावित करना चाह रहा था तो प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमरीका पर निर्भरता से मुक्त होने के लिए देशवासियों से अपील की कि एक वक्त के भोजन का परित्याग करें। बहुत सारे मध्यम वर्गीय घरों में एक समय खाना बनना बंद हो गया था। वर्तमान में भारत तेल संकट से जूझ रहा है क्योंकि ट्रम्प के दबाव में भारत ने रूस से तेल की खरीद कम/बंद कर दी। अब अमरीका हमें अपमानित करते हुए इजाजत दे रहा है कि हम एक माह के लिए रूस से तेल खरीद सकते हैं। क्या मादी शास्त्री की तरह देशवासियों से अपील कर सकते हैं कि लोग पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें? मोदी ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि मोदी के लिए अपने पूंजीपति मित्रों अडानी-अंबानी को फायदा पहुंचाना प्राथमिकता है। देश उनके लिए माएने नहीं रखता। वर्तमान में चल रहे अमरीका-इजराइल व ईरान के युद्ध के बीच ही ट्रम्प की घोषणा हुई है कि मुकेश अम्बानी की कम्पनी रिलायंस अमरीका में तेल परिशोधन संयंत्र लगाने के लिए रुपए 277 खरब का पूंजीनिवेश करने जा रही है। बताया जा रहा है कि अमरीका से भारत को रूस का तेल खरीदने की एक माह की छूट अम्बानी ने ही दिलवाई है।

आज नरेन्द्र मोदी के ट्रम्प के सामने घुटने टेक देने से भारत बहुत अपमानित हो रहा है। जिन नेहरू को कोसने का मोदी कोई मौका नहीं छोड़ते उन्होंने भारत को गुटनिर्पेक्ष आंदोलन का नेता बना दिया था। मोदी ने भारत को अमरीका व चीन का पिछलग्गू बना दिया है। देश के आत्म-सम्मान के साथ ऐसा समझौता पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने पूंजीपति मित्रों के हितों को साधने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

महात्मा गांधी ने कोई बात सही है या गलत इसको पहचानने के लिए एक तावीज दी थी कि अपने आप को सबसे समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की जगह रख कर सोचो कि हमारे फैसले से उसका भला होगा या बुरा। अमरीका-इजराइल व ईरान के बीच में तो कमजोर पक्ष इैरान ही है इसलिए वर्तमान में चल रही लड़ाई में हमें ईरान के साथ खड़ा होना चाहिए था। किंतु हमारी नीतियां अब नैतिकता के आधार पर तय नहीं होतीं। हमने वर्तमान में चल रहे रूस बनाम यूके्रन, इजराइल बनाम फिलीस्तीन अथवा अमरीका-इजराइल बनाम ईरान सभी युद्वों में ढुलमुल नीतियां ही अपनाई हैं। ज्यादातर समय हम आक्रांता के साथ खड़े नजर आते हैं। यह नीति महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के ठीक विपरीत हैं। गांधी और नेहरू का आज भी पूरे विश्व में उनकी नीतियों की वजह से सम्मान होता है। महात्मान गांधी ने 1947 में जब इजराइल बनाया जा रहा था तो कहा था कि फिलीस्तीन उसी तरह से अरब लोगों को है जैसे इंग्लैण्ड अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का। 1947 में नकबा की घटना में जब यहूदियों ने फिलीस्तीन से करीब सात लाख फिलीस्तीनियों को खदेड़ दिया और उन्होंने आस-पड़ोस के देशों में शरण ली तो जवाहरलाल नेहरू ने शरणार्थी शिविरों का दौरा किया। इस बात को अरब दुनिया आज भी याद करती है। नरेन्द्र मोदी को बहुत शौक है कि वे दुनिया के ताकवर देशों की पंक्ति में भारत को खड़ा करें। लेकिन ये ताकतवर देश सिर्फ भारत का बाजार चाहते हैं और अपने अनुकूल शर्तों पर खरीद-बिक्री चाहते हैं। ट्रम्प ने जिस तरह से भारत पर आयात व निर्यात शुल्क लगाए हैं उससे यह बहुत स्पष्ट हो गया है। पिछली बार जब ट्रम्प राष्ट्रपति थे तो नरेन्द्र मोदी ने अमरीका में बसे भारतीयों की जन सभा में ’अब की बार फिर ट्रम्प सरकार’ के नारे से वहां मौजूद ट्रम्प का दिल जीतना चाहा। लेकिन ट्रम्प भारत को अपना गुलाम समझते हैं, कहते हैं कि नरेन्द्र मादी उनको खुश करने के लिए उनका कहना मानते हैं। उन्होंने कितनी बार कह डाला है कि उन्होंने ही भारत पाकिस्तान युद्ध रुकवाया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि शायद युद्ध उनसे अनुमति लेकर ही शुरू किया गया हो? पहले भी अमरीका लोकतंत्र व मानवाधिकार की रक्षा के नाम पर दुनिया को भ्रमित करता था, किंतु अब अमरीका एकदम निर्लज्ज तरीके से अपने से कम ताकवर देशों के साथ मनमानी कर रहा है।

अब समय आ गया है कि हमें आक्रांता के बजाए पीड़ित के साथ खड़े होना चाहिए। खुलकर ईरान, यूके्रन और फिलीस्तीन का साथ देना चाहिए। 

अमरीका और इजराइल साम्राज्यवादी देश हैं। अमरीका वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी का अपहरण कर लाया है और वहां के तेल भण्डार पर कब्जा कर लिया है, कनाडा, ग्रीनलैण्ड और डियगो गार्शिया जैसी जगहों पर उसकी नजर है, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह खामेनेई की हत्या कर वहां सत्ता पलट करना चाह रहा है। इजराइल गजा को ध्वस्त कर चुका है और पड़ोसी देशों की भूमि पर कब्जा करने का उसका इतिहास रहा है। अमरीका गजा के प्रशासन के लिए एक बोर्ड आॅफ पीस के गठन का प्रस्ताव लेकर आया है जो उसकी नव-साम्राज्यवादी नीतियों का ही हिस्सा है। फिलीस्तीन के किसी भी प्रतिनिधि के बिना दुनिया भर से लोगों को इस बोर्ड में भर कर अमरीका चाहता है कि वह फिलीस्तीन का भविष्य तय करे। कोई भी स्वाभिमानी लोग, खासकर अपने आत्म-सम्मान के साथ कभी भी समझौता न करने वाले फिलीस्तीनी, ऐसे प्रसताव को कैसे मान सकते हैं? हम अमरीका और इजराइल जैसे देशों का साथ कैसे दे सकते हैं जो सरे आम गुण्डागर्दी कर रहे हैं? उन्होंने लोकतंत्र व मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा दी हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी वैश्विक इकाई जिसका दुनिया के पैमाने पर साझा निर्णय लेने के लिए, खासकर अंतर्राष्ट्रीय शांति की दिशा में, गठन किया गया था को धता बता रहे हैं।

भारत की जनता तो पीड़ित पक्षों – वेनेजुएला, यूके्रन, ईरान, आदि के साथ खड़ी है और लोकतंत्र व मानवाधिकारों की हिमायती है। अब हमारी सरकार और प्रधान मंत्री को तय करना है कि वे किसके साथ खड़े होना चाहते हैं?

लेखकः अरुंधती धुरू और संदीप पांडेय

सम्पर्कः 9415022772, 0522 2355978, 3564437

ई-मेलः arundhatidhuru@gmail.comashaashram@yahoo.com

लेेखक परिचयः अरुंधती धुरू जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय के साथ जुड़ी हैं व संदीप पाण्डेय सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के प्रधान महासचिव हैं।

Ramswaroop Mantri

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