।। राम विद्रोही।।
ग्वालियर गोआ षडयंत्र केस में जिन चार लोगों को कठोर कारावास की सजाएं हुई थी उनमें स्टीफन जोसफ फर्नान्डीज का नाम गुमनामी में खो गया है। जिन अन्य तीन लागों को सजाएं हुई थी उनमें कामरेड रामचंद्र सर्वटे, बालकृष्ण शर्मा और गिरधारी सिंह थे। जब मैं ग्वालियर के स्वतंत्रता संग्राम पर नई सुबह पुस्तक लिख रहा था तब सबसे ज्यादा महनत मुझे फर्नान्डीज के बारे में जानकारी जुटाने में करना पडी क्यों कि उनके बारे में किसी को भी जानकारी नहीं थी। अधिकतर लोगों ने तो उनका नाम ही पहली बार सुना था। ग्वालियर का इसाई समुदाय भी फर्नान्डीज के बारे में कुछ भी नहीं जानता था। यहां तक कि ग्वालियर के पुराने कम्युनिस्ट नेता भी उनके बारे में किसी जरह की जानकारी नहीं दे सके थे। दो वर्ष के कठिन श्रम के बाद मैं उनके बारे में कई स्रोतों से जानकारी जुटा पाया। इससे मुझे बहुत संतुष्टि मिली और लगा कि मैंने ग्वालियर का कर्ज उतार दिया है। असल में मुम्बई जेल की सजा पूरी होने के बाद फर्नान्डीज न तो ग्वालियर लौटे और न गोआ या मुम्बई में सक्रिय रहे। फर्नान्डीज कमजोर शरीर के तो पहले से ही थे पुलिस और जेल की कठोर यातनाओं ने उनके शरीर को न केवल और भी कमजोर बना दिया था, बल्कि जानलेवा बीमारी की ब्याधियां भी खडी कर दी थीं जिससे कम आयु में ही उनका निधन हो गया था।
ग्वालियर रियासत के तत्कालीन महाराजा माधौराव सिंधिया मोटर गाडियों आदि पर रंग रोगन करने के लिए गोआ निवासी एक पेंटर को ग्वालियर लेकर आए थे और उनकी नियुक्ति ग्वालियर इंजीनियरिंग वर्कशॉप में कर दी थी। शुरू शुरू में तो सभी उन्हें पेंटर मास्टर ही कहते थे लेकिन धीरे धीरे मुख सुख में उनका नाम बिगड कर पिंटु मास्टर हो गया। उनका वास्तविक नाम तो किसी को याद ही नहीं था। इन्हीं पिंटु मास्टर के घर सन 1914 में एक बालक का जन्म हुआ जिसे ग्वालियर के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में दबे पन्नों में स्टीफन जोसफ फर्नान्डीज के नाम से पहचाना जाता है। इनके ठौर ठिकाने के बारे में भी सही सही जानकारी किसी को नहीं है। जैसी कि मुझे जानकारी मिली यह दानाओली में कहीं रहते थे। साठ सत्तर साल बाद इस गुमनाम क्रांतिकारी का सही ठौर ठिकाना तलाशना दुर्लभतम काम था क्यों कि इतने लम्बे अन्तराल में सटीक जानकारी के स्रोत अब इस दुनिया में नहीं हैं।
जोसफ बहुत छोटी उम्र में ही रामचंद्र सर्वटे और बालकृष्ण शर्मा के सम्पर्क में आ कर उनके क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के साथी बन गए थे। पिता की तरह जोसफ भी अच्छे पेंटर और चित्रकार थे। हिंदी और अंग्रेजी पर पकड भी उनकी बहुत अच्छी थी। इसके अलावा जोसफ की सबसे बडी खूबी यह थी कि वह एक अच्छे निशानेबाज भी थे। बंगाल के क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति ने अपनी ग्वालियर शाखा को हथियारों की आपूर्ति करने की जिम्मेदारी दी हुई थी। जब स्थानीय हथियार धोखा देने लगे तो जोसफ ने ही गोआ से हथियार खरीदने का सुझाब दिया था। जोसफ का परिवार मूल रूप से गोआ का ही रहने वाला था और इनके वहां कई रिश्तेदार भी रहते थे। गोआ पुर्तगाल का उपनिवेश था और जो लोग ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे उन्हें वहां से सस्ते दामों में हथियार मिल जाया करते थे और कभी कभी तो बिना पैसा खर्च किए भेंट में भी हथियार मिल जाते थे। यह बात सन 1931/ 32 की है। जोसफ अपने सम्पर्को के कारण हथियार प्राप्त करने में कामयाब रहे। बोरों में नारियल के साथ हथियार ग्वालियर भेजने में यह दो बार कामयाब रहे। गोआ में दो महीने तक रहने के बाद जब हथियारों का इंतजाम पक्का हो गया तो बालकृष्ण शर्मा तो ग्वालियर लौट आए पर हथियारों की व्यवस्था के लिए जोसफ वहीं रूक गए। तीसरी बार जोसफ अपनी दोनों जांघों में चार रिवाल्बर बांध कर ग्वालिया आ रहे थे तो मुम्बई बन्दरगाह पर पकड लिए गए। दरअसल एक पुलिस अधिकारी को जोसफ पर शक हो गया था और वह पणजी से ही पीछे लगा हुआ हुआ था जिसे जोसफ भांप नहीं पाए। जोसफ के पास से चार रिवाल्बर बरामद होने के बाद मुम्बई पुलिस में हडकम्प मच गया और वह इसमें किसी बडी साजिश को सूंघने में लग गई। जोसफ के पास बरामद पत्रों के आधार पर रामचंद्र सर्वटे गिरधारीसिंह और बालकृष्ण शर्मा की पहचान हुई और इन्हें बंदी बना लिया गया। पुलिस को इसमें किसी बडे षडयंत्र की आश्ंका थी इसलिए चारों को अलग अलग जेलों में रखा गया ताकि यह आपस में सम्पर्क नहीं कर सकें। इस मामले में सबसे कठोर यातनाएं जोसफ को ही झेलना पडीं। पुलिस जोसफ से हथियारों और षडयंत्र का पूरा सच उगलवाना चाहती थी इसके लिए उसने जोसफ पर थर्ड डिग्री के सभी हथकंडों का इस्तेमाल किया। पुलिस ने जोसफ से सच उगलवाने के लिए उन्हें सात दिन रात खडे रखा जिससे उनके शरीर का पूरा खून पैरों में उतर आया और वह बेहोश हो गए। उनका कमजोर शरीर कठोर यातनाएं झेलने में सक्षम नहीं था। कठोरतम यातनाएं देने के बाद भी पुलिस जोसफ से चार रिवाल्बरों के अलावा न तो हथियरों का कोई जखीरा बरामद कर सकी और न साजिश के बारे में काई जानकारी प्राप्त कर सकी। अन्य तीन लोगों के साथ जोसफ को भी तीन साल की बामुशक्कत कारावास की सजा दी गई। जेल में भी जोसफ पर पुलिसिया बर्बरता का अंत नहीं हो सका। इससे जेल में उनकी हालत बिगडती गई; उनके उपचार पर भी ध्यान नहीं दिया गया। जेल में जोसफ को टाट के गीले कपडे पहनाए जाते थे जिससे उन्हें कुष्ठरोग हो गया। कुष्ठ रोग के कारण जोसफ को सजा पूरी होने के कुछ समय पहले रिहा कर दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद जोसफ ग्वालियर नहीं आए और गोआ चले गए औरर चार साल बाद उनका निधन हो गया। इस तरह एक क्रांतिकारी इतिहास के पन्नों में गुमनामी की भेंट चढ गया। जोसफ को क्रांतिकारी सलाम।
स्टीफन जोसफ फर्नान्डीज:कलम आज उनकी जय बोल






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