लागत के 1.5 गुना दाम भी नही देनेवाले मोदीजी किसानों को भ्रमित करना चाहते है ।*
*हैदराबाद (तेलंगाना) के उच्च अदालत के शासन को ज्वार खरीदने का आदेश, सभी अनाज को देशभर लागू हो !*
पिछले 6 महीनों से दिल्ली के द्वार पर बैठे किसानों से *”न्यूनतम समर्थन मूल्य”* के आँकलन पर पलभर भी बिना चर्चा – सलाह मशविरा ना करते हुए स्वयं घोषणा की और किसान आंदोलन को भ्रमित करने की साजिश असफल रही है । मोदी शासन का खेल जानकर *संयुक्त किसान मोर्चा के सैकड़ों संगठनों ने इस निर्णय को नकारा ही नही, धिक्कारा भी है ।*
खरीफ़ की कुछ फसलों के लिए जिसमें गेहूँ भी शामिल है, *करीबन 250 से 500 तक बढ़ावा देकर, स्वामीनाथन आयोग के निष्कर्ष पर सभी प्रकार के लागत का मूल्यांकन करके न्यूनतम समर्थन मूल्य देना टाल दिया है ।*
इतनी भरसक महँगाई, खेतिहरों के डीज़ल – पेट्रोल, बीज और खाद तक की कीमतें बढ़ते हुए हैरान कर रही है । सरकार द्वारा यह घोषणा थोड़ा सा चारा फेंकने जैसी है जिससे हम अधिक महसूस कर रहे है किसानों की अवमानना और खेत मजदूरों की उपेक्षा। परिवारजनों के श्रम और आज बढ़े हुए खेती के लिए हर जरूरी चीज के दाम बढ़ाने से खेती और उद्योग के बीच की दूरी ना केवल बरकरार रहेगी लेकिन बढ़ेगी , यह पोलखोल भी इस मौके पर हो चुकी है । ज्वार पर प्रति क्विंटल मात्र 125 /- रुपए तो अरहर दाल पर 300/- रुपए बढ़ोत्तरी देकर क्या डीज़ल के बढ़े हुए दाम की भी भरपाई होगी । किसानों के कर्जे का 1 प्रतिशत हिस्सा भी छूट सकेगा । *मोदी शासन के ही नही, तमाम जनप्रतिनिधियों के भी सामने, 2018 में ही पेश किया है न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून !* संसद में एक भी सत्र में इस पर बहस ना करते, तीन अभूत कानून थोंपनेवाले सत्ताधीश जनतंत्र को कुचलकर मात्र घोषणाबाजी से MSP देने का दिखावा खड़ा करते रहे है … और किसान – मजदूर, मोदी – शाह की सच्चाई इन साज़िशों से समझकर ही *जनआंदोलन के रास्ते पर ” हर उपज का सही दाम”* *पाने के लिए नारेबाजी मात्र नही, संकल्प लेकर लड़ रहे है । लड़ेंगे, जितेंगे ।*
ज्वार के साथ हर पहाड़ी अनाज को न केवल सही MSP बल्कि शासन से खरीदी भी चाहिए ।
तेलंगाना के उच्च न्यायालय में रयतु वेदिका की याचिका में दिया गया फैसला एक महत्वपूर्ण जीत है ।आदिवासी ही नही, कई खेतिहर समुदाय ज्वार, बाजरा, तिल जैसे जो पहाड़ी अनाज उगाते है, उनमें से कुछ की लागत और क़ीमत कमजोर MSP के रूप में सही, लेकिन घोषित है किंतु मोर, बंटी, भादी जैसे अनाज पर वह भी नही है और इन सकस खाद्यान्न – उपज की खरीदी तो शासन की योजनाओं में है ही नही । तेलगांना के फैसले के बाद अब हर राज्य में और देशभर, ये मुद्दे उठाकर हासिल करनी होगी शासन से स्वीकृत जिम्मेदारी । *कानूनी और मैदानी लड़ाई से ही जीतते आए है जनआंदोलन । किसान भी लड़ेंगे और जितेंगे भी ।*
*किशोर सोलंकी* *महेंद्र तोमर* _(9755544097)_ *मेधा पाटकर*





