जब पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, तब महाराष्ट्र में विदर्भ के किसान एक और “महामारी” से जूझ रहे थे. यह महामारी है किसानों की बदहाली. विदर्भ के इलाके, मतलब नागपुर और अमरावती संभाग में पिछले 16 महीनों में कुल 1784 किसानों की खुदकुशी से मौत हो चुकी है. मतलब हर महीने 111 किसानों की खुदकुशी से जान गई.

इनमें सबसे ज्यादा मौतें अमरावती डिवीजन के यवतमाल में हुई हैं. 2020 में इस जिले में 319 किसानों ने खुदकुशी कर जान दी थी. वहीं इस साल के चार महीनों में अबतक 83 किसान जान दे चुके हैं. बता दें यवतमाल वही जिला है, जहां 16 फरवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी रैली की थी.
नागपुर डिवीजन में इन 16 महीनों में 386 किसानों ने खुदकुशी कर जान दी है. यहां वर्धा जिले में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, जहां पिछले साल 152 और इस साल 40 किसान जान दे चुके हैं. बता दें नागपुर संभाग में 6 जिले (नागपुर, वर्धा, भंडारा, गोंदिया, चंद्रपुर और गढ़चिरौली) आते हैं.
वहीं अमरावती डिवीजन कमिश्नरेट से मिली जानकारी के मुताबिक, डिवीजन के 5 जिलों में अबतक 1400 किसानों ने 16 महीनें में खुदकुशी कर जान दी है. मतलब अमरावती डिवीजन में हालात नागपुर डिवीजन से बहुत ज्यादा खराब हैं.
अमरावती के यवतमाल के बारे में ऊपर चर्चा कर ही चुके हैं. यवतमाल के बाद सबसे ज्यादा खराब हालात बुलढाणा जिले के हैं, जहां पिछले साल 268 और इस साल 73 किसान खुदकुशी कर जान दे चुके हैं. खुद अमरावती जिले में पिछले साल 295 और इस साल 54 किसानों ने सुसाइड कर जान दी थी.
विडंबना ये है कि आत्महत्या के सैकड़ों केस को मुआवजे का पात्र नहीं माना गया. जैसे अमरावती डिविजन में 2020 में 1137 आत्महत्या में सिर्फ 494 को मुआवजे के योग्य माना गया और 539 को अपात्र. राज्य सरकार से योग्य पाए जाने पर एक लाख रुपए का मुआवजा मिलता है.
सवाल ये है कि जब राज्य से लेकर केंद्र तक सरकारें किसानों के हित की कसमें खाकर बनती हैं तो क्यों ये हाल है?
किसानों की आय नहीं खुदकुशी के मामले दोगुने हुए: विजय जावंदिया
किसान नेता और कृषि अर्थशास्त्र के जानकार विजय जावंदिया कहते हैं कि किसान खुदकुशी के मामलों में कमी नहीं आई है. किसानों के लिए सरकारें पॉलिसी चेंज नहीं कर रही हैं. नीति वही हैं. फसलें खराब हो रही हैं. स्थिति बहुत भयानक है. विदर्भ के कुछ जिलों में हालत बहुत खराब है. वर्धा- यवतमाल इसके उदाहरण हैं. सोयाबीन और कपास की फसल इस बीच कम आई है. पीएम सम्मान निधि से कुछ होता नहीं है. जो कर्जा बढ़ा हुआ है, उससे स्थिति खराब हो रही है. किसानों को बैंक भी लोन नहीं दे रहे हैं, जिससे किसान मजबूर होकर कृषि सेवा केंद्र या साहूकारों से कर्ज ले रहे हैं.
गेंहू को विदर्भ में MSP 1975 रुपए प्रति क्विंटल मिलता है, लेकिन यह गेहूं 1600 से 1800 रुपए प्रति क्विंटल पर ही बिक पाया है. मतलब MSP से काफी कम दाम मिले. इतने कम दाम में किसान गेंहू बेचेगा, तो इस महंगाई में उसे क्या बचेगा? गेंहू की फसल लेने के लिए उसे 6 से 7 सिंचाई देनी पड़ती हैं. चने को एमएसपी से ज्यादा दाम मिल रहा था, किसानों ने जब उसकी ओर रुख किया तो सरकार ने दाल का इम्पोर्ट शुरू कर दिया. जिससे चने के दाम फिर गिर गए. पेट्रोल के दाम बढने से जो खर्च बढ़ा है, उसकी तो गिनती ही नहीं हो रही है.
विजय जावंदिया





