इंदौर
शहर में कोरोना संक्रमण दर अब 1% से भी कम हो गई है, लेकिन अब वे लोग ज्यादा परेशान हो रहे हैं, जिन्होंने कोरोना काल में अपनों को खोया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले माह घोषणा की थी कि प्रदेश में कोरोना से मृत लोगों के परिजन को 1 लाख रुपए मुआवजा दिया जाएगा।
घोषणा को करीब तीन हफ्ते हो गए हैं, लेकिन लोग इसके लिए परेशान हो रहे हैं। वे अस्पताल, नगर निगम और कलेक्टरेट के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिल पा रहा। नगर निगम का तो दो टूक कहना है कि उन्हें इस संबंध में शासन से निर्देश नहीं मिले हैं। वैसे, क्लेम मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि लोगों को दस्तावेजों के मामले में पसीना आ रहा है।
मार्च-अप्रैल में जब संक्रमण चरम पर था, तो उस दौरान हजारों लोगों की मौतें हुई थी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 13 जून तक कोरोना से 1371 मौतें हुई हैं, लेकिन उस दौरान जो हालात थे और अब जिस प्रकार से लोग चक्कर लगा रहे हैं, उससे अनुमान होता है कि मौतें काफी तादाद में हुई हैं।
21 मई को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कोरोना से मृत लोगों के परिजनों को एक-एक लाख रु. का मुआवजा देने की घोषणा की तो अधिकांश लोगों को इस आर्थिक मंदी के दौरान में सहारा मिलने की उम्मीद जगी, लेकिन यह प्रक्रिया कैसी होगी, इसके लिए ठोस गाइडलाइन नहीं बनी। इस बीच लगातार जनता कर्फ्यू रहा, तो अधिकारियों के पास बहाना है कि छूट मिलने के बाद ही इसमें गति मिलेगी।
- परेशानियां झेल रहे लोग
– कोरोना के इलाज के लिए सरकारी MRTB अस्पताल, MTH, न्यू चेस्ट सेंटर व सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल (SSH) हैं, जबकि तब 110 निजी अस्पतालों में भी कोरोना का इलाज हुआ। इस दौरान जिनकी अस्पताल में मौत हुई है, उन लोगों के परिजन को जरूरी दस्तावेज जुटाने पड़ रहे हैं। इसमें कई केस ऐसे हैं, जिनमें मौत का कारण कोरोना नहीं बताया गया है।
दरअसल, अस्पताल में पॉजिटिव रहने के दौरान मौत होने पर कोरोना से मौत का कारण बताया जाता है, लेकिन ऐसे मरीज जिन्हें तब अस्पतालों में बेड फुल होने से पॉजिटिव स्थिति में ही डिस्चार्ज किया। घर पर मौत हुई तो उसका आधार ही नहीं है।
– अस्पताल में किसी मरीज की रिपोर्ट निगेटिव आने पर उसे डिस्चार्ज किया गया और फिर मौत हुई है। ऐसे कई लोगों के परिजन चक्कर लगा रहे हैं कि संबंधित को तो कोरोना था लेकिन चूंकि सरकारी पोर्टल पर आखिरी रिपोर्ट निगेटिव अपलोड की गई है, इसलिए ऐसे लोग मुआवजा के पात्र नहीं हैं।
– अस्पताल में किसी मरीज के ठीक होने के बाद रिपोर्ट निगेटिव आई है। बाद में उसकी मौत किडनी, अस्थमा, हार्ट अटैक या अन्य कारण से हुई है, तो डेथ समरी में मौत का कारण कोरोना नहीं लिखा जाता।
– एक बड़ी परेशानी यह कि निजी अस्पताल में कोरोना से मौत होने पर इसकी जानकारी नगर निगम को दी जाती है। सरकारी कोविड अस्पतालों में मौत होने पर मृत्यु प्रमाण पत्र MY अस्पताल से जारी किए जा रहे हैं। इस दौरान कई लोगों के प्रमाणपत्र में नाम, उम्र व पता गलत होने की गड़बड़ियां भी सामने आई हैं। इसके लिए संबंधितों को सुधार के लिए शपथपत्र देना पड़ रहे हैं।
– अहम यह कि नगर निगम द्वारा जारी मृत्यु प्रमाणपत्र पर भी कई दिनों से मौत का कारण नहीं लिखा जा रहा। आए दिन लोग वहां चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही।
परिजन की पीड़ा
सुखलिया निवासी संतोष दुबे (41) की 9 मई को सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में मौत हो गई। परिजन को अब तक मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिला है। उन्हें मंगलवार को बुलाया गया है। ऐसे ही जयप्रकाश जोशी (62) निवासी साहिल एवेन्यू की 25 अप्रैल को सुपर स्पेशलिटी में मौत हो गई है। बहन कुसुम जोशी ने बताया कि 10 दिनों बाद मृत्यु प्रमाण पत्र मिला, लेकिन अब एक लाख के मुआवजे के लिए प्रक्रिया कैसी करनी है, यहां गाइनलाइन ही जारी नहीं की गई है।
एक मामला दिनेश यादव (43) निवासी नंदानगर का है। पिछले महीने DNS अस्पताल में कोरोना से उनकी मौत हो गई। मृत्यु प्रमाणपत्र में इसका जिक्र नहीं है। भाई दीपक के मुताबिक एक लाख रु. के मुआवजे के लिए विधायक प्रतिनिधि को दस्तावेज सौंपे हैं।
मामले में एडिशनल कमिश्नर श्रृंगार श्रीवास्तव का कहना है कि अभी नगर निगम को दिशा-निर्देश नहीं मिले हैं। ADM पवन जैन ने बताया कि शासन ने पूर्व में कुछ निर्देश मिले थे, लेकिन नए दिशा-निर्देश अभी आना है। इसके लिए कमेटी बनी है, जो हर केस की छानबीन करेगी। आवश्यक दस्तावेज प्रमाणित पाए जाने पर उन्हें प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाएगा।





