सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों देश में तीन तरह की मौतें दर्ज हुईं जिनमें कोविड 19से पीड़ित सर्वाधिक ऐसे लोग थे जिन्हें अस्पताल में जगह नहीं मिली वे मजबूरन घर लौटे और अपने साथ दो तीन लोगों को भी मौत की ओर ले गए जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है ,दूसरे नंबर पर वे लोग थे जिन्हें अस्पताल नसीब हुई,बिना बेड के भी अनेक भर्ती हो गए पर आॅक्सीजन और रेमडिसीवर के अभाव में चल बसे । बड़ी संख्या में उन लोगों की भी फौत हुई जिन्हें वेंटीलेटर नसीब नहीं हुआ। तीसरे, मौत उन लोगों की हुई जो अन्य बीमारियों से ग्रस्त थे जिन्हें तत्काल मदद की ज़रूरत थी वह उपलब्ध नहीं हो पाई। इसके अलावा कई परिवारों के बुजुर्ग और बच्चों की दम भूख से टूट गई क्योंकि उनके परिवार के कमाने वाले का रोजगार कोरोना कर्फ्यु ने छीन लिया ।कहने का आशय यह है देश में जो इस बार मृत्यु का आंकड़ा बढ़ा और जिससे शवों की दुर्गति के चित्र सामने आए उसकी वजह स्पष्ट है कुप्रबंधन और दूसरी लहर के प्रति बरती गई घोर लापरवाही।
जबकि संयुक्त राष्ट्र के 1948 के मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 25 में साफ तौर पर कहा गया है कि हर किसी को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार है, जिसमें भोजन, कपड़े, आवास और चिकित्सा देखभाल और आवश्यक सामाजिक सेवाएं आती हैं।इसी तरह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को जीवन जीने का अधिकार है जिसमें रोजगार भी शामिल है ।इस परिप्रेक्ष्य में यदि भारत देश में हुई तमाम मृत्यु के आंकड़ों और उनके कारणों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि देश के नागरिकों की इतनी बड़ी तादाद में मृत्यु के लिए भारत और राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं जिन्होंने दूसरी लहर को कम करके आंका,कोई तैयारी नहीं की और अव्यवस्थाओं और अभावों के बीच लोगों को मरने मज़बूर किया उनके अधिकारों का हनन किया गया तथा अप्रत्यक्ष तौर पर मृत्यु यानि हत्या जैसे घृणित कृत्य सामने आए ।
इधर, दुनिया भर से जब भारत के लोगों की दुर्दशा पर हमले हुए तब जाके हमारी सरकार हरकत में आई और कोरोना रोकने प्रभावी कदम उठाए जिसका सुखद परिणाम भी मिलने लगा है। इसके अलावा सरकार ने कोरोनावायरस से मरे लोगों के परिवार के लिए चार से पांच लाख तक देने की घोषणा की है ।अनाथ हुए बच्चों के लिए भी 5000 ₹ मासिक सहायता 20-22वर्ष तक देने का फैसला किया है।यह अच्छी पहल है पर इसमें भी पेंच है जो आंकड़े आए हैं वे बहुत कम है।वजह ये बताई जा रही है कि जिनके पास कोरोनावायरस से मृत्यु का प्रमाणपत्र है वहीं लाभान्वित हो सकेंगे।उस दौरान जिस तरह लाशों का निष्कासन हुआ ऐसे हालात में मौत का सर्टिफिकेट कितनों ने लिया होगा यह समझने ज़रूरत है।अब जो लोग प्रमाणपत्र लेने जा रहे हैं उन्हें जो प्रमाणपत्र दिया जा रहा है लेकिन वह कोरोनावायरस से मौत का नहीं है। इसमें भी बड़ा खेला होना है क्योंकि सरकार मौत के वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आने देना चाहती है फलस्वरूप प्रभावितों को लाभ की उम्मीद कम ही नज़र आ रही है। कुल मिलाकर कोरोना काल ने जो आपदा के अवसर बढ़ाए हैं उनकी तलाश अब भी जारी है । महामारी से त्रस्त परिवारों के हालात बदतर है प्रशासन और सरकार अपने दायित्व निर्वहन में कोताही बरत रहा हैजरुरत है लोगों की भूख के मसले को दूर करने अन्न के अधिकार का कानून लागू करना।इधर केन्द्र सरकार ने 80करोड़ लोगों को राशन देने की घोषणा की है परंतु कब मिलेगा कितना मिलेगा और सही तरीके से वितरण होगा तभी बात बनेगी वरना अलीगढ़ जैसी तकलीफ़ देह मृत्युओं के समाचार मिलते रहेंगे ?यह भी ज़रूरी है सिर्फ चंद ईमानदार अधिकारियों और समाजसेवियों के भरोसे देश को नहीं छोड़ा जा सकता।देश को बचाना है तो यह मानना ही होगा कि ये हालात शासन और सरकार की बदौलत बने जो किसी जुर्म से कम नहीं। मृतात्माओं से क्षमा मांगते हुए ईमानदार पहल की जाए अभावों को दूर करने की ,तो कुछ उम्मीद की जा सकती है।
हत्या जैसा अपराध है: अभावों में मौत !





