राजकुमार केसवानी
महबूब ख़ान का सफ़र बतौर एक्स्ट्रा शुरू ज़रूर हुआ, लेकिन उसकी निगाह राह पर कम और मंज़िल पर ज़्यादा थी। वह पहले एक्टर और फिर फ़िल्म मेकर बनने आया था। लेकिन सफ़र ज़रा लम्बा था। तकरीबन एक हज़ार दिन लम्बा सफ़र। इन हज़ार दिनों में काम ख़ूब मिला, लेकिन यह सारा काम था बैठने या खड़े रहने का। किसी दरबार में दरबारी बनकर बैठों या कहीं संतरी बनकर खड़े रहो। पूरे हज़ार दिन। और जो यह हज़ार गुंथकर तकरीबन तीन साल होने को थे, तभी आस की एक किरन चमकी और चमककर गुम हो गई। चंद दिन बाद ही यह किरन फिर लौट आई। इस बार उसने भेस धरा था मौके का।
‘जिस वक़्त दादा तोरने राजपूतों की एक कहानी पर आधारित फ़िल्म (मेवाड़ नो मवाली) की कास्टिंग कर रहे थे तो यह बात चल पड़ी थी कि मुझे (महबूब ख़ान) इस फ़िल्म में हीरो का रोल मिलने वाला है। लेकिन यह न हुआ। एकदम आख़िरी मिनट पर ई. बिलीमोरिया को हीरो चुन लिया गया। मैं इस बात से बड़ा मायूस सा हो गया लेकिन मेरी ख़ुशनसीबी वहीं कहीं कोने में खड़ी मुस्करा रही थी।’ (महबूब ख़ान)
इस फ़िल्म की शूटिंग उदयपुर में होनी थी। महबूब ख़ान को कई सारे एक्स्ट्राज़ की तरह घोड़े की पीठ पर सवार होकर दुश्मन का पीछा करते हुए कैमरे की तरफ़ सरपट जाना और फिर पलटना था। महबूब को जिस घोड़े की सवारी मिली वह शाही घोड़ा था। एक अदने से ‘एक्स्ट्रा’ को अपनी पीठ पर पाकर वह ज़रा नाराज़ सा था। लेकिन शह सवार का नाम भी महबूब ख़ान था। लगाम उसके मज़बूत हाथों से ज़्यादा उसके मज़बूत इरादों के काबू में थी। उसने इस बेकाबू घोड़े को जिस तरह काबू में रखते हुए शॉट दिया, वह एक शानदार शॉट था। डायरेक्टर की मंशा तो न थी लेकिन घोड़ा कैमरे के मुंह के इतना नज़दीक तक पहुंचा कि महबूब ख़ान का चेहरा पहली बार ‘क्लोज़ अप’ में नज़र आया।
‘जब आर्देशिर ईरानी ने इसके ‘रशेज़’ देखे तो वह उचककर बैठ गए और सवाल किया; ‘कौन है ये?’ जवाब मिला; ‘महबूब ख़ान।’… ‘अगले महीने से इसकी पगार में दस रुपया बढ़ा दो… सो बिल आख़िर, तीन साल के बाद मैं चालीस रुपया महीना कमाने लगा।’ (महबूब ख़ान)
इस एक दिन के बाद से महबूब सबकी नज़र में चढ़ गया। कल तक भीड़ में शामिल आज सबसे अलग पहचान बनाकर खड़ा हो चुका था। उसे देखकर भी अनदेखी करने वाले अब उसे साथ बिठाने लगे। महबूब के दोस्त बनने लगे। इन्हीं दोस्तों ने आगे चलकर महबूब को महबूब ख़ान बनने में बड़ी मदद की। एक थे राइटर-डायरेक्टर आर.एस. चौधरी और दूसरे थे कैमरामेन फरदून ईरानी। फ़रदून तब कैमरा असिस्टेंट थे मगर तकनीक के मामले में बेमिसाल। महबूब ख़ान को कैमरे की बारीकियां सिखाईं और उसकी सारी फ़िल्मों की सिनेमाटोग्राफ़ी की ज़िम्मेदारी भी निभाई।
इसी बीच एक ख़ास मक़सद से ईरानी सेठ ने चिमनलाल देसाई और डाक्टर अम्बालाल पटेल के साथ मिलकर एक नई कम्पनी खड़ी कर ली। नाम रखा – सागर मूवीटोन स्टूडियोज़। इसी वक़्त कई सारे लोगों को इम्पीरियल से सागर में भेज दिया गया। उनमें से एक था महबूब।
‘1931 में आया बोलता सिनेमा। डायरेक्टर के.पी. घोष ने मुझे ‘फिल्म ‘रोमांटिक प्रिंस’(31) में बोलने वाला रोल दिया। इस फ़िल्म में मास्टर विट्ठल, याक़ूब और ज़ुबैदा जैसे कलाकार थे। इसमें मेरे काम की तारीफ़ हुई। इस बार फिर मेरी पगार में दस रुपए का इज़ाफ़ा किया गया। इस तरह अब मेरी पगार हो चुकी थी पूरे 50 रुपए। फिर आई ‘नाचवाली’(1934)। इस फ़िल्म में जद्दन बाई, याक़ूब के साथ मैं भी था। इस बार फिर दस रुपए का इज़ाफ़ा मिला।’
महबूब साल, दो साल में दस-दस रुपए का इंक्रीमेंट हासिल करने के लिए फ़िल्मों में नहीं आया था। उसकी आंखों में बसी दुनिया का दायरा तो स्टूडियो की दुनिया से भी बड़ा था।
‘जिस ज़माने में महबूब साहब सागर मूवीटोन में एक्स्ट्रा थे, तब भी उनमें इस क़दर ख़ुद-ऐतमादी (आत्म विश्वास) थी कि वह अक्सर मेरी मां (जद्दन बाई) को मुख़्तलिफ़ कहानियां सुनाते हुए कहते कि एक दिन वह ख़ुद भी हिदायतकार बनेंगे और तब फ़लां मंज़र (सीन) की अक़ासी फ़लां तरीके से करेंगे। मेरी मां ने उनके जोश-ओ-ख़रोश को फ़ौरा समझ लिया। उन्हें यक़ीन हो गया कि यह नौजवान लड़का इरादे का मज़बूत और धुन का पक्का है तो एक दिन ज़रूर अपनी मंज़िल पा लेगा। चुनांचे उन्होंने चंद प्रोड्यूसरों से महबूब साहब को मुतारिफ़ (परिचय) भी कराया और आख़िर वह हिदायतकार बन ही गए। ऐसे हिदायतकार जिस का सानी हिंदुस्तान में दिखाई नहीं देता।’ (नरगिस)
इस जगह ज़रा रुकता हूं, ज़रा थमता हूं, कुछ कहता हूं। कहता हूं जोग-संजोग की बात। हिंदुस्तान की पहली टॉकी फ़िल्म ‘आलमआरा’(1931) के हीरो का नाम था मास्टर विट्ठल। इन मास्टर विट्ठल से पहले जिस इंसान को इस रोल के लिए पसंद किया गया था, उसका नाम है महबूब। इस बात को ज़रा ख़ुद महबूब ख़ान की ज़ुबानी सुन लें।
‘मेरे जीवन में नाउम्मीद करने वाले दो बड़े हादसे हुए जिनकी वजह से मैंने एक्टिंग छोड़कर डायरेक्टर बनने का फ़ैसला ले लिया। मुझे उम्मीद थी कि मुझे ‘आलम आरा’ का हीरो बनाया जा रहा है। मेरी नाप के कास्ट्यूम्स तक की तैयारी हो गई और फिर अचानक ही यह रोल मास्टर विट्ठल को मिल गया। इसी तरह ‘ल्यूर आफ़ द सिटी’ (उर्फ़ शहर का जादू – 1934) में भी मुझे हीरो का ख़्वाब दिखाकर मोतीलाल नाम के एक नए अदाकार को ले लिया गया।
अपने दो दोस्तों फरदून ईरानी, जो उस वक़्त असिस्टेंट कैमरामेन था और दूसरे लैब असिस्टेंट गंगाधर की मदद से मैंने एक कहानी तैयार कर ली। इस कहानी को लेकर मैं डाक्टर पटेल और चिमनलाल देसाई के पास पहुंचा। डाक्टर पटेल ने कहानी तो सुनी लेकिन उसे नापसंद करके साफ़ इंकार कर दिया। यक़ीन जानिए, मायूसी के इस आलम में मैं आंसू बहाता रहा।’ (महबूब ख़ान)
आंख और दिल का याराना, इंसानी वजूद जितना ही पुराना है। चोट दिल को लगती है और आंसू आंख बहाती है। महबूब ख़ान का याराना फरदून ईरानी से भी ऐसा ही था। महबूब की नाकामी से फरदून भी बिलबिला उठा। उसने सेठ लोगों से बात करके एक बार सब्र के साथ महबूब की बात सुनने और समझने की गुज़ारिश की।
डाक्टर पटेल की झिझक यह थी कि महबूब को फ़िल्म डायरेक्ट करने का कोई तजुर्बा नहीं है। न कभी किसी को असिस्ट किया है, न ठीक से सीखा है। फरदून ने भरोसा दिलाते हुए कहा कि आप उसे सिर्फ़ तीन दिन की शूटिंग की इजाज़त दे दें। वह फ़िल्म डायरेक्ट करे और मैं उसका कैमरामेन रहूंगा। अगर काम पसंद नहीं आए तो आप मेरी तनख़्वाह से वसूली कर लीजिएगा। महबूब को एक मौका और मिल गया।
‘मैंने एक बार फिर पूरी कहानी, पूरे तफ़्सील के साथ सुना डाली। डाक्टर पटेल बिना कोई जवाब दिए ख़ामोश बैठे रहे। मैंने उनकी हज़ार मिन्नतें की कि वो मुझे फ़िल्म डायरेक्ट करने दें। यह भी कह दिया कि अगर वो मेरे पहले सीन की फ़िल्मिंग से मुतमईन न हुए तो वो उस पर लगी लागत मेरी पगार से काट सकते हैं।
पूरे चार महीने बीत गए। कोई जवाब नहीं मिला। इस दर्मियान, मेरे कुछ दोस्तों ने मुझ जैसे एक ‘एक्स्ट्रा’ के डायरेक्टर बनने की कोशिश का मज़ाक़ बनाना भी शुरू कर दिया। तभी अचानक एक दिन डाक्टर पटेल ने मुझे बुलाया और कहा कि वो मुझे फ़िल्म डायरेक्ट करने का मौका देने को तैयार हैं। मैं ख़ुशी से झूम सा उठा। कुछ हरकती किस्म के लोगों ने डाक्टर पटेल को बहकाने और मुझसे मौका छीनने की बहुत कोशिश की लेकिन वो टस से मस न हुए। मैं उन लफ़्ज़ों को ज़िंदगी भर नहीं भूल सकता जो जवाब उन्होंने उन लोगों को दिया था। उनका जवाब था – ‘जिस वक़्त महबूब मुझे कहानी सुना रहा था, उस वक़्त पूरी फ़िल्म मेरी आंखों के सामने चल रही थी।’ (महबूब ख़ान)
महबूब और फरदून की टीम को तीन दिन की शूटिंग की इजाज़त मिल गई। इन तीन दिनों में जो कुछ शूट हुआ, उसे देखकर चिमनलाल देसाई और डाक्टर पटेल की नयन जोत में नई चमक आ गई। दिल में हिलोरें सी उठने लगीं। यह उनके लिए ‘यूरेका मूमेंट’ था। उन्होंने एक अद्भुत डायरेक्टर और अद्भुत कैमरामेन की खोज कर डाली थी।
इसके बाद बाकायदा शुरू हुई फ़िल्म ‘अल हिलाल उर्फ़ जजमेंट ऑफ अल्लाह।’ साल 1935। सितारे – कुमार, याक़ूब और अज़ूरी।
और …
महबूब ख़ान का मामला दिल का मामला है। बल्कि मुआमला है। वो हर काम दिल से ही लेते थे। बात यारी-दोस्ती की हो कि फ़िल्म का शाट लेने की। फ़ैसले दिल से होते थे। जलील माणिकपुरी का एक शेर है
मुहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है
मगर मुश्किल तो यह है कि दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है
महबूब ख़ान को लेकर अपने दौर की मशहूर अदाकारा नादिरा ने एक बड़ी दिलचस्प बात लिखी है। याद रहे नादिरा ने महबूब ख़ान की 1952 की फ़िल्म ‘आन’ में मुख्य भूमिका निभाई थी।
‘क्या आप इस बात पर यक़ीन कर पाएंगे कि इस इंसान (महबूब ख़ान) के पास काग़ज़ पर लिखी स्क्रिप्ट कभी नहीं होती थी। वह पढ़ नहीं सकता था, लिहाज़ा वह उसके लिए बेकार चीज़ थी। फ़िल्म की तमाम चीज़ें उसके ज़हन में पूरी तफ़्सील के साथ अलबता हमेशा महफ़ूज़ होती थीं। यह बात मुझे आज भी हैरान करती है कि किस तरह एक इंसान ने अपनी एक कमज़ोरी को अपने अंदर की ताकत से जीत रखा था।
वह हमेशा अपने साथ बेहद पढ़े-लिखे और क़ाबिल लोगों को जोड़े रखता था। फ़िल्म के सींस और डायलाग्स को लेकर इन लोगों के बीच होने वाले बहस-मुबाहिसों के दौरान मैं भी ख़ूब मौजूद रही हूं। जब सारे लोग किसी डायलाग या सीन को लेकर एक राय हो जाते थे तो महबूब ख़ान सिर्फ़ एक लाइन कहकर सबको चुप करा देते थे – ‘नहीं, यह दिल को लगता नहीं है।’ (नादिरा)
मुझे यह तो नहीं पता कि किस डायलाग को लेकर महबूब ख़ान ने यह बात कही होगी लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि महबूब का डायलाग ज़रूर दिल को लगता है। आपको लगता है कि नहीं?
जाते-जाते एक दुआ। नया साल मुबारक हो। दुनिया की हर अला-बला से महफ़ूज़ रहें। नीली छतरी का रंग लाल से फिर नीला हो जाए। आमीन।





