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किसान संघर्ष समिति ने ‘‘सिकल सेल’’ से पीड़ित लोगों की मदद का बीड़ा उठाया

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एड. आराधना भार्गव

हमारा क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, सिकल सेल एक अनुवांशिक रोग है। सरकार के पास सिकल सेल से पीड़ित बच्चों तथा अन्य लोगों का सही रिकार्ड उपलब्ध नही है। जवाहर लाल नेहरू कैंसर एण्ड रिसर्च संस्थान द्वारा सिकल सेल से पीड़ित लोगों का सर्वे करवाया गया है। सरकार को उन से सही रिपोर्ट लेकर सिकल सेल से पीड़ित लोगों की मदद करना चाहिए। कोरोना महामारी की चपेट में सिकल सेल से पीड़ित बच्चे आ सकते हैं, उन्हें तत्काल पौष्टिक भोजन तथा शिशु रोग विशेषज्ञ की विशेष निगरानी में रखना चाहिए। सिकल सेल से पीड़ित बच्चों के माता पिता के पास शिशु रोग विशेषज्ञ डाॅक्टरों के फोन नम्बर उपलब्ध कराने तथा आपात स्थिति में डाॅक्टर द्वारा आधी रात में भी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिए।

यह बीमारी आदिवासी, भारिया, अन्य जनजाति और पिछड़ी जातियों में ज्यादा पायी जाती है। जिला मुख्यालय के अलावा तामिया, पातालकोट, जुन्नारदेव, बिछुआ, पांढुरणा, परासिया, आदिवासी क्षेत्रों में हजारों की संख्या में सिकल सेल से पीड़ित बच्चें तड़पते दिखाई देते हैं। मैंने तामिया नगर के अन्दर सात साल की बेटी चंचल डेहरिया से मुलाकात की थी, जिसके माँ-बाप गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते है। चंचल एक होनहार बेटी है जिसके सपने कलेक्टर बनकर देश की सेवा करने के हैं। मुझे अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि चंचल के स्वास्थ्य को लेकर जिला प्रशासन जरा भी चौकन्ना दिखाई नही दिया।  सिकल सेल एक अनुवांशिक बीमारी है। विवाह से पूर्व खून जाँच कराने से इस बीमारी पर काबू पाया जा सकता है, इस तरीके का कोई कैम्प सरकार द्वारा पातालकोट में समय समय पर लगाया जाना चाहिए, ताकि आदिवासी तथा पिछड़े समुदाय में जागृति पैदा हो। इस अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित बच्चों का बचपन उनसे छीना जा रहा है। पातालकोट क्षेत्र में पीड़ित बच्चों का ईलाज झाड फूंक करके किया जाता है, जादू टोना तथा भूत प्रेत बाहरी बाधा कहकर गुनिया (ज्ञाता) सिकल सेल से पीड़ित बच्चों को मौत से नही बचा पाता। मुर्गी तथा बकरा की बलि चढ़ाकर बच्चों के ईलाज की मांग करता है, परिणाम स्वरूप सिकल सेल से पीड़ित बच्चें की मौत तो नही रूकती बल्कि परिवार मुर्गी और बकरा की बलि देने के कारण आर्थिक तंगी का शिकार हो जाता है। गुनिया की दुकानदारी तेजी से चलने लगती है, पाँच मुर्गी, पाँच बकरे की बलि नही दी गई तो प्रेत आत्मा परिवार के पांच लोगों को लेकर चली जायेगी जैसे भ्रम झाड़ फूक करने वाले पढ़यार फैलाते रहते है।  आज पूरा विश्व सिकल सेल जागरूकता दिवस मना रहा है, किन्तु मध्यप्रदेश सरकार ने सिकल सेल से पीड़ित आदिवासी बाहुल्य जिले शहडोल, डिंडोरी, मण्डला और छिन्दवाड़ा में कोई अभियान नही चलाया है। अभियान चलाना तो दूर सरकार के पास पीड़ित व्यक्तियों के आंकड़े भी नही है। सिकल सेल से पीड़ित बच्चों के परिवार में देखा गया है कि शादियाँ अपनी ही जनजाति में करने का रिवाज है। गरीबी के कारण पौष्टिक आहार भी पीड़ित बच्चों को नही मिलता। पातालकोट गड्ढे के अन्दर बसे अनेक गांव का समूह है, उन गांव में रोजगार के साधन भी उपलब्ध नही है, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। सिकल सेल से पीड़ित बच्चों को खून का संचालन सही तरीके से नही होने के कारण सांस लेने में दिक्कत होती है। कोरोना महामारी की चपेट में ऐसे बच्चें जल्दी आ जाते हैं। किसान संघर्ष समिति मध्यप्रदेश सरकार से मांग करती है कि सिकल सेल से पीड़ित गांव में जागरूकता लाने के लिए समय समय पर कैम्प लगाये तथा पीढ़ित बच्चों की जाँच गांव में ही करायी जाएं, बच्चों को नियमित फोलिक एसिड उपलब्ध कराया जाए, बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराने की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध करायी जाए ताकि बीमारी से बच्चों को छुटकारा मिल सकें। किसान संघर्ष समिति तथा कस्बाई सिकल सेल से पीड़ित बच्चों को निःशुक्ल ऑक्सीजन कंसेेंट्रेटर तथा पौष्टिक आहार एवं दवाईयों की किट उपलब्ध कराएगी तथा पातालकोट में निवास करने वाले समझदार लोगों को दवाईयों के किट के  संबंध में जानकारी देगी, जो सिकल सेल से पीड़ित बच्चों को आपातकाल स्थिति से निपटने में मददगार होगी। 
एड. आराधना भार्गव

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