ज्योतिरादित्य सिंधियाकी चिंता अपने उन समर्थकों को लेकर है जो विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए. दलबदल के कारण विधायिकी भी चली गई. इनमें पूर्व मंत्री इमरती देवी, रणवीर जाटव प्रमुख हैं. ये दोनों अनुसूचित जाति वर्ग से हैं.
दिनेश गुप्ता
भोपाल. शिवराज सिंह चौहान ) के मंत्रिमंडल और पार्टी संगठन में समर्थकों को एडजस्ट कराने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगली चुनौती बोर्ड कॉर्पोरेशन की है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कोशिश है कि बोर्ड, कॉर्पोरेशन में चेयरमेन उन पार्टी कार्यकर्ताओं को बनाया जाए,जिन्होंने 28 सीटों के उपचुनाव में पार्टी को सफलता दिलाई है. आने वाले कुछ महीनों में एक लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों के लिए भी उप चुनाव होना है. यदि पार्टी का मूल कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करेगा तो उप चुनाव कठिन हो सकते हैं.
सिंधिया की भोपाल यात्रा से गर्माती सियासत
कोरोना की दूसरी लहर के आनलॉक के बाद सिंधिया दो बार भोपाल आए. उनकी भोपाल यात्रा कई राजनीतिक कयासों को जन्म दे जाती हैं. लंच-डिनर के कार्यक्रम में भी डिप्लोमेसी तलाश की जाती है. सिंधिया के आने के बाद भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भी बदली है. सिंधिया नए शक्ति केन्द्र माने जा रहे हैं. पार्टी में उनकी बात को गंभीरता से सुना भी जा रहा है. पार्टी की सत्ता में वापसी सिंधिया के कारण हुई है. इस कारण शिवराज सिंह चौहान भी उनकी हर बात को तवज्जो देते दिखाई दे रहे हैं. चौहान ने अपने मंत्रिमंडल में सिंधिया समर्थक नौ विधायकों को मंत्री बनाया. पार्टी कार्यसमिति में भी सिंधिया के साथ भाजपा में आए लोगों को जगह मिली. इससे यह स्पष्ट संकेत चला गया कि पार्टी सिंधिया की भावना को तरजीह दे रही है.
सिंधिया की चिंता अपने उन समर्थकों को लेकर है जो विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए. दलबदल के कारण विधायिकी भी चली गई. इनमें पूर्व मंत्री इमरती देवी, रणवीर जाटव प्रमुख हैं. ये दोनों अनुसूचित जाति वर्ग से हैं. ग्वालियर-चंबल संभाग में इस वर्ग के बीच भाजपा को अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए बोर्ड अथवा कॉर्पोरेशन में पद देना जरूरी है
.सिंधिया विरोधी चेहरा नहीं है सामने है
सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में आने के बाद उनके परंपरागत विरोधियों की स्थिति भी कमजोर पड़ी है, लेकिन,सिंधिया पार्टी में उनके विरोधियों को भी साधने की कवायद कर रहे हैं. पिछले दिनों जब वे ग्वालियर में पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया के घर गए तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था. पवैया महल विरोधी राजनीति के नेता माने जाते हैं. ग्वालियर केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का भी प्रभाव क्षेत्र है, लेकिन वे पार्टी लाइन को समझकर चुप्पी साधे हुए हैं. पार्टी अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा की नजर भविष्य की राजनीति पर है. इस कारण वे सिंधिया से तालमेल बैठाकर चल रहे हैं. तोमर और शर्मा की नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है. पूर्व सांसद प्रभात झा जैसे विरोधियों की चुप्पी जरूर चौकाने वाली है. प्रभात झा को अभी भी लगता है कि यदि सिंधिया भाजपा में नहीं आते तो उन्हें राज्यसभा में जाने का एक और मौका मिल सकता था.
संघ को साधना चुनौती से कम नहीं
सिंधिया को भारतीय जनता पार्टी में सिर्फ पंद्रह माह ही हुए हैं. अभी तक उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली पाई है. इस कारण पार्टी के एक वर्ग की सहानुभूति भी उन्हें मिल रही है. सिंधिया के लिए भाजपा में अपनी जगह बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण है. भाजपा कैडर आधारित पार्टी है. पार्टी में पद और व्यक्ति का चयन लंबे विचार-विमर्श के बाद किया जाता है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारकों की राय भी बेहद महत्वपूर्ण होती है. सिंधिया, संघ में भी अपनी पकड़ बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं. नागपुर जाकर संघ प्रमुख मोहन भागवत से भी उन्होंने मुलाकात की थी. मध्यप्रदेश की राजनीतिक यात्रा के दौरान भी वे इस बात का ख्याल रखते हैं कि संघ कार्यालय जरूर जाएं. भोपाल में समिधा के नाम से संघ का कार्यालय है. सिंधिया नियमित तौर पर वहां मौजूद पदाधिकारियों से मेल-मुलाकात और बातचीत करते हैं. संघ की सहमति के बिना सिंधिया समर्थक भाजपा में अपनी जगह बना पाएंगे, यह मुश्किल दिखाई देता है. सिंधिया की कोशिश सभी को साधने की है.
कोरोना के कारण टली गईं नियुक्तियां
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तीन विधानसभा और एक लोकसभा के उप चुनाव तक बोर्ड,कॉर्पोरेशन की नियुक्तियों को टालना चाहते हैं. लोकसभा का उप चुनाव खंडवा में होना है. जिन तीन सीटों पर विधानसभा के उपचुनाव हैं, उनमें दो कांग्रेस के कब्जे वाली हैं. उप चुनाव से पहले यदि नियुक्ति होती हैं तो जाहिर है कि असंतोष के स्वर भी उठेगें. जिसका असर चुनाव परिणामों पर भी पड़ सकता है. कोरोना के कारण अब तक मुख्यमंत्री चौहान नियुक्तियों को टालने में सफल रहे हैं, लेकिन जिस तरह से सिंधिया का दबाव बन रहा है, उसमें मामले को लंबा नहीं टाला जा सकता.





