संतोष वात्सायन
2020 और फिर 2021 के लॉकडाउन में लगभग सारे धंधे चौपट हो गए, लेकिन दवा, पेट्रोलियम और किराना-फल-सब्जी वालों का बिज़नेस किसी भी दुष्प्रभाव से अछूता रहा।रुपये की सबसे ज्यादा लिक्विडिटी अभी भी इन्ही बिज़नेसेस में है।
ऐसे हरे भरे बिज़नेस और बाजार में इनकी निरंतर सप्लाई के पीछे एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट है जो कैसी भी स्थिति में आवश्यक वस्तुओं या उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा उन्हें जमाखोरी एवं कालाबाज़ारी से रोकने के लिये वर्ष 1955 में बनाया गया था। इसमें सिर्फ दाल, चावल, आलू, प्याज, ही नहीं, दवाएं, रासायनिक खाद, दलहन और खाद्य तेल, पेट्रोलियम पदार्थ आदि भी शामिल हैं।
दवा की कीमत पर सरकार का ज्यादा नियंत्रण नही।कई सारी फार्मा कंपनियां दवाइयां बनातीं हैं, इसके अलावे जेनेरिक दवाओं का भी विकल्प है सो छोटी मोटी कालाबाज़ारियों को छोड़ दें तो दवाओं के दाम लगभग स्थिर हैं।
पेट्रोलियम सेक्टर पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण है।30-35 रुपये प्रति लीटर वाला पेट्रोल आपको 100-110 रुपये लीटर मिल रहा है।इसका एक बड़ा हिस्सा(एक तिहाई-पेट्रोल के मूल कीमत जितना) केंद्र सरकार आपकी जेब से लूट रही है।चूँकि इस कमोडिटी पर केंद्र सरकार का एकाधिकार है तो आप चूँ करने से ज्यादा कुछ नही कर सकते।या ज्यादा से ज्यादा आप अपनी गाड़ियों को खड़े-खड़े जंग लगता देख सकते हैं और साईकल चलाने के गुण गा सकते हैं।
अगर कृषि उत्पादों की बात करें और छोटी-मोटी कालाबाज़ारियों को दरकिनार कर दें तो दाल-चावल, आलू, प्याज, हरी साग-सब्जी आदि की कीमतें भी कम से कम लॉकडाउन की वजह से अस्थिर नही हुईं।ये वह कमोडिटी है, जिसे कोई भी ज्यादा दिन तक स्टोर करके नही रख सकता।जमाखोरी के खिलाफ़ कड़े कानून हैं।इसके अलावा इसके उत्पादन,वितरण, क्रय-विक्रय में एक विकेन्द्रीकृत सिस्टम काम करता है।उदाहरण के लिए अगर दिल्ली की किसी मंडी का कोई थोक व्यापारी अरहर की दाल की कमी बताकर इसे 200 रुपये किलो बेचता है और यही दाल कानपुर की मंडी में 100 रुपये किलो बिक रही है तो दिल्ली वाले व्यापारी का खेल ज्यादा दिन नही चल पाता।यही कारण है कि इन वस्तुओं का (कृत्रिम)अभाव नही दिखाया जा सकता और दामों में मामूली बदलाव होने पर भी अलार्म बज जाता है।सरकार इसे रेगुलेट करती है और इस तरह से माँग और आपूर्ति में ट्रांसपेरेंसी बनी रहती है।
मुझे गार्डनिंग का शौक है।मुट्ठी भर ज़मीन में, जिसे आम तौर पर किचन गार्डन कहते हैं, आम-अमरूद के एक दो पेड़ हैं, इसके अलावे गमले में कुछ फूल उगाता हूँ; इससे ज्यादा कुछ नही।मैं किसान नही। मैं अन्न नही उपजाता लेकिन फिर भी मैं किसान बिल का विरोध करता हूँ, क्योंकि मैं कृषि उत्पादों का कंज्यूमर तो हूँ।बात किसानों के नफा नुकसान की नही, मेरी अपनी थाली की है।
किसान बिल के तीसरे ऑर्डिनेन्स में कृषि उत्पाद जैसे चावल-दाल, अन्य दलहन, तेलहन, साग-सब्जी आदि खाद्य पदार्थों को आवश्यक वस्तु (एसेंशियल कमोडिटी) अधिनियम से निकाल दिया गया है।यानि अब इन वस्तुओं की जमाखोरी जुर्म नही है।जिस किसी के पास भी अकूत पैसा है वह इन्हें खरीद कर जमा कर सकता है, इनका कृत्रिम अभाव बना सकता है और फिर इसकी सप्लाई करके मनमाना दाम वसूल सकता है।पंचायत, ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर जो मंडियाँ हैं वह स्वतः खत्म हो जाएँगी क्योंकि कंपीट नही कर पाएंगी।विकेंद्रीकरण वाला सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा और एकाधिकार स्थापित हो जाएगा।इस नए कानून से इस कमोडिटी के लिए सरकार की जवाबदेही खत्म हो जाती है और अकाल, भूखमरी जैसे परिदृश्य के अलावे सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप नही कर सकती।कृषि बिल आने से पहले ही देश मे अलग-अलग राज्यों में अडानी लाखों मीट्रिक भंडारण क्षमता वाले स्टील सायलो प्लांट बनवा चुके हैं।मतलब सब कुछ पहले से तैयार है।
आदमी हर जगह कंजूसी कर सकता है, लेकिन खाने से कैसे करे।आप एक दो दिन पेट काट सकते हैं, लेकिन सदा भूखे जीवित नही रह सकते।आप महँगे फल,प्याज,मीट-मछली आदि खाना छोड़ सकते हैं, लेकिन आँटे-दाल और मोटे अनाज के बिना एक दिन भी रहना संभव नही।आज अगर गेहूँ 200 रुपये किलो हो जाये और चावल 400 रुपये किलो, फिर भी आप खरीदेंगे और खाएंगे।ये बढ़ी हुई कीमतें अभी एक प्रलाप लग सकतीं हैं जैसे 2013 में गैस सिलिंडर की कीमत 1000 रुपये सोच पाना भी एक प्रलाप था।
110 रुपये पेट्रोल और 1000 रुपये गैस सिलिंडर खरीद रहे हैं लेकिन क्या आपने कभी विरोध किया? नही किया तो 200 रुपये किलो गेहूँ और 400 रुपये किलो चावल हो जाने पर आप क्या उखाड़ लेंगे?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नए किसान बिल पर रोक लगा रखी है, इसलिए आपकी थाली में छेद नही हुआ है।अगर ये बिल लागू हो गया तो ठेले या मोहल्ले के किराने के दुकानों का चस्का छूट जाएगा।एक-एक भिंडी और टमाटर छाँटने की सहूलत छिन जाएगी।बड़े-बड़े मॉल्स में शीशे के आलीशान पर्दे के पीछे प्राइस टैग लगे हुए खाद्य पदार्थ सजे-सजाए मिलेंगे,जिन्हें आप देख तो सकेंगे पर छू तक नही पाएंगे।कीमतें मनमानी होंगीं।अभी इसी कांसेप्ट के मॉल्स में प्लास्टिक में करीने से लिपटा एक मक्का 45-50 रुपये का बिकता है।आप नही लेते क्योंकि यही मक्का मुहल्ले में घूमने वाले ठेलों-रेहड़ियों पर आपको 15-20 रुपये किलो मिल जाता है।लेकिन अगर यह ऑप्शन उपलब्ध ना हो तब की सोच कर देखें।नया कानून यह ऑप्शन खत्म कर देने वाला है।
बेरोजगारी और महंगाई पहले ही आपकी जेब मे बड़ा छेद कर चुकी है।कम से कम जिस थाली में आप खाते हैं, उसमे छेद होने से तो बचा लीजिये।अपनी थाली में कौन छेद करता है भाई!?





