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सेठ दामोदर स्वरूप का संविधानसभा में 19 नवंबर 1949 को दिया गया स्पीच

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सेठ दामोदर स्वरूप (युका प्रान्तः जनरल)- आदरणीय सभापति जी. ड्राफ्ट का दूसरा वाचन खत्म हो चुका है। और यह तीसरा वाचन चल रहा है, जो दो चार दिन के अन्दर खत्म हो जायेगा। इसके बाद 26 जनवरी के ऐतिहासिक दिन तक इस कास्टीटूशन का उद्घाटन मुलतवी रहेगा। यह जो कुछ हो चुका है ठीक ही हुआ है और उसके लिये आनबिल डॉक्टर अम्बेडकर और ड्राफ्टिंग कमेटी के उनके दूसरे साथी सारे हाउस के बधाई के पात्र है, क्योंकि उन्होंने दिन रात एक करके कठिन परिश्रम और चतुराई के साथ इस विधान को खत्म किया है।
सभापति जी, इस हाउस के एक सदस्य की हैसियत से मुझे भी इस विधान के समाप्त हो जाने पर सन्तोष और खुशी होनी चाहिये। लेकिन आप मुझे यह कहने की इजाजत दें कि आज जब मैं इस विधान के सम्बन्ध में इस हाउस में कुछ कह रहा हूँ तो मुझे न केवल कुछ सन्तोष ही नहीं है, कुछ खुशी ही नहीं है, बल्कि सच बात तो यह है कि मुझे अन्दर से ऐसा मालूम होता है कि मेरा दिल बैठा जा रहा है और उसके अन्दर जो काम करने की शक्ति है वह छिनी जा रही है। कारण यह है कि लगभग दो वर्ष से ज्यादा गुजर चुके जबसे अंग्रेजी हुकूमत हमारे देश से विदा हो चुकी है, लेकिन बदकिस्मती से यहां आम जनता, यहां के जन साधारण ने आज तक भी यह महसूस नहीं किया कि शासन का परिवर्तन होने से उनकी किसी प्रकार की बेहतर या बहबूदी हो सकी है। इतना ही नहीं, वह तो कुछ ऐसा अनुभव कर रहे हैं कि शासन में परिवर्तन होने से उनकी स्थिति दिन-ब-दिन ज्यादा खराब होती जा रही है और वह यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि उनकी हालत की यह खराबी कहां पर जाकर रुकेगी। सच बात तो यह है कि देश के जन साधारण को तो, जिनके नाम पर यह विधान बना है और पास किया जायेगा, अपने चारों तरफ निराशा और अन्धकार ही दिखाई देता है।
सभापति जी, हमारे कुछ साथियों का ऐसा समझना था कि जन साधारण की स्थिति में उनको कुछ तबदीली इसलिये नहीं दिखाई देती क्योंकि अभी तक विधान और कायदे कानून वही चल रहे हैं जो अंग्रेजी हुकूमत के बनाये हुए थे। वह ऐसा विश्वास करते थे कि जब हमारा स्वदेशी विधान बनकर तैयार हो जायेगा, तो यहां की जनता अवश्य ही यह महसूस करेगी कि वह उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो रही है।
लेकिन सभापति जी, मैं कुछ साफ और खरी बात कहने के लिये क्षमा मांगता हूँ। इस विधान के बन जाने और लागू हो जाने के बाद भी यहां की जनता को जरा भी संतोष नहीं होगा, जरा भी खुशी नहीं होगी। क्योंकि इस विधान में जो कि बनकर तैयार हुआ है, जो कि शीघ्र ही लागू होने जा रहा है उसमें उनके लिये क्या है? ऊपर से लेकर नीचे तक इस विधान को पढ़ जाइये तो इसमें आपको हिन्दुस्तान के गरीब, भूखे नंगे और पीड़ित लोगों के लिये रोटी का किसी प्रकार का भी इन्तजाम नहीं है। उनकी रोजाना कठिनाइयों को हल करने के लिए यहां पर क्या प्रयत्न हुआ है? यह बात छोड़कर, उनको काम की गारन्टी भी नहीं है, उनको रोजगार मिलेगा उसको भी गारन्टी नहीं है। उन्हें परिश्रम के अनुसार मजदूरी या वेतन मिलेगा, यह तो दूर की बात है, उन्हें लिविंगवेजेज मिलेगी, उ जोवन निर्वाह करने के लिये मजदूरी और तनख्वाह मिल सकेगी. इसको भी मारको नहीं है।
ऐसी हालत में सभापति जो यह विधान दुनिया के सारे विधानों से सम्ब और भारी विधान हो सकता है, ज्यादा विस्तृत भी हो सकता है। यह हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े कानूनदानों के लिये एक स्वर्ग भी हो सकता है और हिन्दुस्तान के पूंजीपतियों के लिये इसमें मैगनाकाट भी हो सकता है। लेकिन जहां तक हिन्दुस्तान के गरीब और करोड़ों मेहनत करने वाले भूखे गंगों की जनता का ताल्लुक है उसके लिये इस विधान में कुछ नहीं है। उनके लिये यह भारी पोथी एक रह की किताब से ज्यादा हैसियत नहीं रखता है। यह दूसरी चीज है कि हम इस चीज को मानें या न मानें, लेकिन यह तो हमें मानना पड़ेगा कि आम जनता को बातें यदि हम छोड़ भी दें तो भी कुछ बड़े लोगों की बात पर तो हम ध्या
अभी हमारे हिन्दुस्तान के पार्लियामेंट के जो माननीय स्पीकर साहब है, उनकी बात की तरफ मुझे आपका ध्यान दिलाना है। वह कहते हैं कि जो यह विधान तैयार हुआ है उसमें हिन्दुस्तान की प्रतिभा का नाम व निशान बिल्कुल नहीं है और उसके वह सबंधा प्रतिकूल है। अगर मैं गलती नहीं करता तो इस हाउस के अन्दर के श्री शंकर राव देव ने भी अपने विचार इस विधान के ऊपर प्रकट किये है। उन्होंने कहा है कि अगर जनमत लिया जाये तो इस विधान को अम्वीकार किया जाना निश्चित है। तो जब इस विधान के सम्बन्ध में हम आम जनता की राय को छोड़ भी दें और इतने बड़े बड़े आदरणीय लोगों की राय की ओर हो न दें, तो फिर इस विधान के सम्बन्ध में हम कैसे कहें कि जनता को इससे कुछ संतोष हो सकता है।
सभापति जो इसका कारण स्पष्ट है क्योंकि यह विधान जिन लोगों की ओर से बनाया गया है, वह सच्चे मानों में किसी भी हालत में आम जनता प्रतिनिधि नहीं है। मैं पहले भी इस बात को कह चुका हूँ कि ज्यादा से ज्यादा इस विधान के बनाने वाले हिन्दुस्तान को 14 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह एक कड़वा सत्य है। हम लोग जो इस हाउस में जनता प्रतिनिधि बन कर बैठे हैं यह भी अनेक कारणों से पार्टी की गुटबन्दी के कारण अथवा किसी दूसरे कारण अपने उस कर्तव्य को जिसके लिये हम यहां पर जमा हुए थे, पूरा नहीं कर सके। इसका ही यह नतीजा हुआ कि आज हिन्दुस्तान की जनता को विशेष रूप से ऐसी ही निराशा होने जा रही है जैसा कि बदले हुए शासन प्रबन्ध से उन्हें हुई है। तो फिर क्या होता है, यह हमें सोचना है। इसमें शक नहीं कि यह जो विधान पास होने जा रहा है, उसको हिन्दुस्तान की जनता आदरणीय श्री शंकर राय देव के शब्दों में कभी भी नहीं स्वीकार करेगी। यह विधान स्थायी रूप से इस देश में नहीं चल सकेगा।
हमने देखा कि इसमें कुछ अच्छी बातें दी गई है और कुछ अच्छे उमूल का भी इसमें वर्णन है। जैसाकि मताधिकार और संयुक्त निर्वाचन की बात है, अस्पृश्यता को खत्म करने की बात है लेकिन जहां तक की बातों का ताल्लुक है, वह तक तो और बात है, लेकिन इन बातों पर किस तरह से अमल बरामद होगा, यह तो तब ही मालूम होगा जब इन उसूलों को अमल में लाया जायेगा। हम देखते हैं कि इसमें मौलिक अधिकारों की फण्डामेंटल राइट्स (Fundamental (Rights) को एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। लेकिन, सभापति जी क्या वाकई हमें इस विधान के जरिये कुछ मौलिक अधिकार मिले हैं, मैं जोरों के साथ कह सकता हूं कि मौलिक अधिकारों की देने की बात महज एक दिखावा है। यह एक हाथ से तो दिये गये हैं और दूसरे हाथ से छीन लिये गये हैं। स्पष्ट शब्दों में हमें बता दिया गया है कि यह जो मौलिक अधिकारों की गारण्टी दी गई है. यह गारण्टी नहीं लागू होगी, उन कायदे कानून पर जो आज जारी हैं, लिबेल (libel), स्लेण्डर (slander) या कंटेम्ट ऑफ कोर्ट के सम्बन्ध में और सरकार को यह भी अधिकार है कि वह आगे भी दूसरे ऐसे ही कानून बना सकती है? इसके अलावा जहां संघ बनाने या राइट् ऑफ ऐसोसियेशन (Right of Association) का ताल्लुक है या लोगों के कहीं आने जाने या बसने का सम्बन्ध है यहां भी सरकार को यह अधिकार हासिल होगा कि वह जनहित के नाम पर इन अधिकारों को छीन लेने के लिये जिस तरह का कानून चाहेगी बना सकती है। तो फिर मौलिक अधिकारों को देना न देना एक प्रकार से बराबर है।
इसके बाद सभापति जी, हमने देखा कि सम्पत्ति के सम्बन्ध में जो कानून (Law) है, वह वैसे का वैसा ही है जैसा कि सन् 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट में था। इस का परिणाम यह होगा कि सम्पत्ति का समाजीकरण या सोशलाइजेशन (socialisation) नहीं हो सकेगा और जो आर्थिक सुधार जनता के हित के लिये हो सकते हैं उनके रास्ते में बड़ी काफी कठिनाई पैदा होगी।
सभापति जी, आश्चर्य होता है, दुख भी होता है कि जब हमारे देश के प्रधान मंत्री इस विधान सम्बन्धी उद्देश्य के प्रस्ताव पर बोल रहे थे तो उन्होंने बड़े जोरदार शब्दों में कहा था कि मैं एक सोशिलिस्ट हूँ। उन्होंने यह आशा भी प्रकट की थी कि यह विधान एक सोशिलिस्ट रिपब्लिक (Socialist Republic ) का विधान होगा। लेकिन हमने उनकी सारी बातें सुन लीं और हमने देखा कि जब यह संशोधन हाउस के सामने आया कि रिपब्लिक के साथ सोशिलिस्ट शब्द भी जोड़ दिया जाये तो वह संशोधन अस्वीकार कर दिया गया।
सभापति जी एक तरफ तो हम यह चाहते हैं कि आज का सामाजिक ढांचा बना रहे और उसमें किसी प्रकार की तबदीली न हो और साथ ही हम यह भी चाहते हैं कि इस मुल्क में गरीबी दूर हो इस मुल्क से बेकारी दूर हो। यह दोनों का साथ साथ नहीं चल सकती में नहीं आता कि जब हमारे प्रधान मंत्री अमरीका में थे तो उन्होंने कहा कि सोशलिज्म (Socialism) और कैपिटलिज्म | Capitalism) दोनों साथ साथ नहीं चल सकते। आश्चर्य है कि इस देश में कैसे आशा की जा सकती है कि इस स्की (status quo) को कायम रखा जाये। कैपिटलिज्म भी बना रहे और इसके साथ साथ जनता की गरीबी और बेकारी भी दूर हो जाये। यह दोनों चीजें बिल्कुल असंगत हैं। इस लिये ऐसा अनुभव होता है कि शायद हिन्दुस्तान की नंगी, भूखी और पीड़ित जनता इसी प्रकार मुसीबत में फंसी रहेगी जैसी आज फंसी हुई है। इसके साथ हम कुछ और बातों को तरफ देखते हैं तो भी किसी परिणाम पर नहीं पहुंचते हैं। आज हमारे देश में कोपरेटिव कॉमनवेल्थ (Co-operative Commonwealth) की बात बहुत जोरों के साथ की जाती है लेकिन क्या होता है? डारेक्टिव प्रिन्सिपल (Directive Principle) में स्पष्ट शब्दों में ऐसी कोई हिदायत नहीं की गई है कि सरकारें इस प्रकार की व्यवस्था करेंगी, तो गोल मोल शब्दों में कुछ हिदायतें दे देना और बात है। और खुला यह आदेश दे देना कि इस प्रकार की व्यवस्था लागू की जानी चाहिये, दूसरी बात है। फिर कांग्रेस के सभापति इस बात की आशा दिलाते हैं कि पांच वर्ष में इस देश में वर्गहीन समाज कायम हो जायेगा। पर मेरे जैसे साधारण आदमी की बुद्धि में यह बात नहीं आती कि एक तरफ सोशलिस्ट सिद्धान्त से हम को चिढ़ है, और हम स्टेटस को (staus qu0) कायम रखते हैं, और दूसरी तरफ हम यह चाहे कि शोषक वर्ग को बनाये रखते हुए हमारे देश में वर्ग-हीन समाज कायम हो जाये तो यह दोनों बातें, जो परस्पर विरोधी हैं, कैसे हो सकती है? इसके अलावा और भी कई छोटी-छोटी बातें, जोकि की जा सकती थीं, वह नहीं की गई। )
एग्जीक्यूटिव (Executive) और ज्यूडिशियरी (Judiciary) के अलग होने की मांग बहुत पुरानी मांग है, शायद इतनी पुरानी मांग है जितनी पुरानी कि राष्ट्रीय महासभा कांग्रेस मानी जाती है। लेकिन इस विधान में कोई भी ऐसी निश्चित योजना (ऐडीक्वेट प्रावीजन) (adequate provision) नहीं है कि जिसके द्वारा जल्द से जल्द एग्जीक्यूटिव और ज्यूडिशियरी का सम्बन्ध एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो जायेगा।
रियासतों में देखिये कि अभी तक जागीरदारी प्रथा खत्म करने के सम्बन्ध में कोई भी निर्णय नहीं किया गया है। इसका नतीजा यह होगा कि रियासतों की लाखों करोड़ों किसान जनता गुलाम बनी रहेगी। वहां की जागीरदारों की। इसके अलावा खेतिहर मजदूर महाजनों के गुलाम बने रहेंगे। इसके साथ ही साथ हम यह देखते हैं कि इस विधान में बहुत सी बातें ऐसी पाई जाती है जो कि सन् 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट से भी कहीं ज्यादा पिछड़ी हुई और प्रतिक्रियावादी है, कहीं ज्यादा रिएक्शनरी (react nary) हैं। पहले तो इस विधान में यह बताया गया था कि गवर्नरी का सीधा वोटरों से चुनाव होगा। उसके बाद दूसरा प्रस्ताव यह आया था कि एक पैनल (panel) द्वारा गवर्नरों की नियुक्ति होगी। परन्तु अब गवर्नरों को चुनने का अधिकार सभापति जी को दे दिया गया है और वह भी अधिकार दे दिया गया है कि उनकी नियुक्ति की मुद्दत भी वही निर्धारित करेंगे। यह ठीक है कि सभापति जी जहा तक भी होगा अपने अधिकार का ठीक इस्तेमाल करेंगे, लेकिन इससे प्राप्त की सरकार और गवर्नर के बीच मेस्साकशी हो सकती है। हो सकता है कि प्रान्त की सरकार की विचारधारा कुछ हो और केन्द्रीय सरकार की विचारधारा कुछ हो, और उस विचारधारा के संघर्ष की वजह से प्रान्तीय सरकार और गवर्नर में संघर्ष होने लगे। इसके अलावा गवर्नर की डिस्क्रीशनरी पावर्स (discretionary powers) तो सन् 35 के ऐक्ट मे भी ज्यादा रिएक्शनरी (reactionary) है। सन् 35 के एक्ट में गवर्नर को इंडीवजुअल जजमेन्ट (Individual judgment) की पावर दी गई थी, लेकिन उसके लिये जरूरी होता था कि वह मंत्रिमंडल से राय से। लेकिन अब डिस्क्रीशनरी पावर में तो गवर्नर को मंत्रिमंडल से सलाह लेने की भी जरूरत नहीं है, और यह भी उसके अपने अधिकार की बात है कि किस विषय को यह डिस्क्रीशनरी माने और किस विषय को वह डिस्क्रीशनरी न माने। इस प्रकार हम देखते हैं कि गवर्नरों के सम्बन्ध में और उनके अधिकारों के सम्बन्ध में भी आगे बढ़ने के बजाय हम पीछे ही हटे हैं।
इसके अलावा संकटकालीन अधिकारों के नाम पर इमरजेन्सी पावरस (emergency powers) के नाम पर सभापति जी को जरूरत से ज्यादा अख्तियारात दे दिये गये हैं और सेन्टर (केन्द्र) को भी प्रान्तों के मामलों में हस्तक्षेप करने के जरूरत से ज्यादा अधिकार दे दिये गये है। यों तो कहने के लिये तो हमारे विधान का ढांचा फैडरल (federal) या संधी है परन्तु वास्तव में देखें तो जहां तक एडमिनिस्ट्रेटिव स्फियर (administrative sphere) (शासन क्षेत्र) का ताल्लुक है, वह बिल्कुल यूनिटरी (unitary) एकराज्य-सा बन गया है। हम यह समझते हैं कि कुछ हद तक केन्द्रीकरण होना जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा केन्द्रीकरण के माने यह हैं कि मुल्क में भ्रष्टाचार बढ़े। उम्र भर गांधी जी हमको डिसेंट्रलाइजेशन (विकेन्द्रीकरण) का सबक सिखाते रहे। आश्चर्य है कि उनके विदा होने के बाद हम उस सबक को इतनी जल्दी भूल गये और आज शान्ति रक्षा के नाम पर सभापति जी को और केन्द्रीय सरकार को हम जरूरत से ज्यादा अधिकार दे रहे हैं।
सभापति जी, यों तो आजकल के राज्यों का ढांचा दो खम्भा होता है। कुछ अधिकार प्रान्तों को होते हैं और शेष अधिकार केन्द्र को होते हैं। वह खुद ही जरूरत से ज्यादा केन्द्रित (सेंट्रलाइन्ड) है। अगर हम चाहते हैं कि भ्रष्टाचार बन्द हो, ब्राइबरी (bribery) करप्शन (corruption) और निपाटिज्म (nepotism) का अन्त हो तो इसके लिये आज का दो खम्मा राज का ढांचा उपयुक्त नहीं मालूम देता है। इसके लिये तो जरूरी यही था कि ढांचा चौ खम्भा हो। जैसा कि मैंने पहले एक दफा सुझाव दिया था कि हमारे गांवों की अलग प्रजातंत्र (रिपब्लिबक्स) होती, शहरों की प्रजातंत्र (रिपब्लिक्स) अलग होती, और सूबों की प्रजातंत्र अलग होती और उनका केन्द्रीय रिपब्लिक के रूप में संघ बनता तो यह सच्चे मानों में प्रजातारिक संघ का ढांचा बनता लेकिन जैसा मैंने अभी कहा आज संघ के नाम पर हमने एक यूनिटरी एक ही राज्य का जैसा विधान बना कर रख दिया है। इसका लाजिमी नतीजा यही होगा कि जरूरत से ज्यादा केन्द्रीकरण (centralisation) होगा और हमारी सरकार जो कि जनता की सरकार होनी चाहिये वह एक फासिस्ट जैसी सरकार बनी तो इस दृष्टिकोण से देखने पर भी सभापति जो हम इसी नतीजे पर पहुंचते हैं कि यह जो विधान हमारे देश में बन कर तैयार हुआ है उससे न हमारी जनता की भलाई होती है और न उन ऊंचे सिद्धान्तों की रक्षा होती है जिनके आधार के नाम पर हमने इस विधान को बनाया है। यही कारण जान पड़ता है कि हिन्दुस्तान की सोशलिस्ट पार्टी ने यह घोषणा की है कि जब कभी ऐसा अवसर हुआ कि उनके हाथ में सत्ता आई तो पहला काम वह यह करेंगे कि जनमत के अधिकार पर एक दूसरी विधान परिषद् बनाई जायेगी और वह विधान परिषद् या तो इस सारे विधान को समूल बदल देगी या इसमें आवश्यक संशोधन करेगी। इसलिये सभापति जी मैं और ज्यादा समय न लेकर यही कहूँगा कि जहां तक जनता के हित का ताल्लुक है और जहां तक विधान संबंधी ऊँचे उसूलों का ताल्लुक है, उनको देखते हुए विधान इस काबिल नहीं है कि इसको स्वीकार किया जाये। इस विधान को तो हमें यही चाहिये कि हम अस्वीकार कर दें। लेकिन सभापति जी, हम ऐसा करें या न करें मैं आपसे यही निवेदन करना चाहूंगा, और मैं अपने आदरणीय श्री शंकर राव जी देव की इस बात में पूरा विश्वास करता हूँ कि चाहे हम इस विधान को स्वीकार कर भी लें लेकिन देश की जनता कभी भी इस विधान को स्वीकार नहीं करेगी। उनके लिये इस विधान का महत्व और दूसरी साधारण कानून की किताबों से ज्यादा नहीं होगा। जनता की जो आशायें इस विधान से थीं वह इसी तरह अपूर्ण बनी रहेंगी जैसी अंग्रेजी राज्य के परिवर्तन से उनकी आशायें पूरी नहीं हो सकीं। इस लिये अगर हम चाहते हैं कि हम पर जनता का विश्वास कायम रहे तो अभी भी यह मौका है कि हम उसे बनाये रखें। परन्तु अगर हम इस कार्य में सफल नहीं होते तो मेरा विश्वास है, सभापति जी, कि हिन्दुस्तान की आम जनता आज भी और आने वाली नसले भी हमें किसी अच्छे सम्मानपूर्ण नाम से याद नहीं करेंगी।

http://164.100.47.194/loksabhahindi/Debates/CaDebAdvSearch.aspx

Ramswaroop Mantri

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