रामबाबू अग्रवाल
मोदी सरकार के कैबिनेट विस्तार में सहकारिता मंत्रालय का बनना नई बात है. इसका प्रभार गृहमंत्री अमित शाह को दिया गया है. मंत्रीमंडल के विस्तार से पहले ही इस नए मंत्रालय को बनाने की घोषणा कर दी गई थी. सहकारिता का स्वतंत्र भारत में अपना इतिहास रहा है. यहां तक कि सहकारिता ने देश को कई कद्दावर नेता तक दिए हैं. सहकारिता आंदोलनों ने देश की राजनीति को हमेशा ही प्रभावित कर नई दिशा देने का काम किया है। कहा गया है कि मोदी सरकार ने ‘सहकार से समृद्धि’ (सहकारिता के माध्यम से समृद्धि) के सपने को साकार करने के लिए यह ऐतिहासिक कदम उठाया है। नया सहकारिता मंत्रालय देश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचा प्रदान करेगा। यह सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुंचने वाले एक सच्चे जनभागीदारी आधारित आंदोलन को मजबूत बनाने में भी सहायता प्रदान करेगा। इस कदम से सरकार ने समुदाय आधारित विकासात्मक भागीदारी के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता का संकेत दिया है। यह वित्त मंत्री द्वारा वर्ष 2021 में की गई बजट घोषणा को भी पूरा करता है।
सहकारिता से अभिप्रा
सहकारिता से अभिप्राय सह+कार्य अर्थात मिलकर कार्य करने से है। शाब्दिक दृष्टि से सहकारिता का अर्थ मिलजुलकर काम करना है। सहकारिता के अन्तर्गत दो या दो से अधिक साथ मिलकर काम करने वाले व्यक्ति आते है। कोई भी मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अकेले नहीं कर सकता। उसे अन्य लोगों के सहयोग की आवश्यकता जरूर होती है एक-दूसरे को सहयोग करने से ही सहकारिता का जन्म होता है।
सहकारिता का आशय निर्बल, अशक्त और निर्धन लोगों का परस्पर सहयोग है ताकि वे उन लाभों को प्राप्त कर सकें जो शक्तिशाली एवं धनी लोगों को उपलब्ध है। सहकारी समिति एक ऐसी स्वैच्छिक संस्था होती है जिसमें कोई भी सम्मिलित हो सकता है। समिति के सभी सदस्यों के समान अधिकार और समान उत्तरदायित्व होते है।
सहकारिता का महत्त्व:• यह उस क्षेत्र को कृषि ऋण और धन प्रदान करता है जहाँ राज्य तथा निजी क्षेत्र की पहुँच अप्रभावी है।• यह कृषि क्षेत्र के लिये रणनीतिक इनपुट प्रदान करता है, जिससे उपभोक्ता रियायती दरों पर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।• यह उन गरीबों का एक संगठन है जो सामूहिक रूप से अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं।• यह वर्ग संघर्षों और सामाजिक दूरियों को कम करता है।• यह नौकरशाही की बुराइयों और राजनीतिक गुटबाज़ी को कम करता है;• यह कृषि विकास की बाधाओं को दूर करता है;• यह लघु और कुटीर उद्योगों के लिये अनुकूल वातावरण तैयार करता है।
सहकारिता मंत्रालय का महत्त्व:
• यह देश में सहकारिता आंदोलन को मज़बूत करने के लिये एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढाँचा प्रदान करेगा।• यह सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने वाले एक जन आधारित आंदोलन के रूप में मज़बूत करने में मदद करेगा।• यह सहकारी समितियों के लिये ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ के लिये प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और बहु-राज्य सहकारी समितियों (MSCS) के विकास को सक्षम करने के लिये काम करेगा।
केंद्र ने 2002 में बहुराज्यीय सहकारी सोसाइटी क़ानून बनाया, जिसके तहत एक से ज़्यादा राज्यों में सहकारी सोसाइटी को काम करने की अनुमति मिली ।इनमें से ज़्यादातर बैंक, डेयरी और चीनी मिल जैसे कारोबार शामिल हैं।इनका दायरा एक से अधिक राज्यों में है. इन पर सेंट्रल रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज़ का नियंत्रण होता है लेकिन वास्तविक नियंत्रण स्टेट रजिस्ट्रार का होता है.
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में देश भर के ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में सहकारी संस्थान फैले हुए हैं. गाँव के स्तर पर प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसाइटी हैं. ये सोसाइटी गाँव के ख़र्चों के अनुमान की मांग ज़िला सहकारी बैंकों को भेजती हैं.ग्रामीणों को क़र्ज़ मुहैया कराने में इन सहकारी संस्थानों की अहम भूमिका होती है. इन सहकारी बैंकों में सामूहिक भागीदारी होने के कारण क़र्ज़ लेने में तोल-मोल का अधिकार किसानों के पास होता है जो कि दूसरे व्यावसायिक बैंकों में नहीं होता है. इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सहकारी मार्केटिंग सोसाइटी और शहरी इलाक़ों में सहकारी हाउसिंग सोसाइटी भी हैं।
2019-20 की नाबार्ड की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में कुल 95,238 प्राइमरी एग्रिकल्चर सोसाइटी (पीएसीएस), 363 डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव सेंट्रल बैंक और 33 स्टेट कोऑपरेटिव बैंक हैं। स्टेट कोऑपरेटिव बैंक को निवेशकों से 6,104 करोड़ की राशि मिली और कुल 1,35,393 करोड़ रुपये जमा हुए।पीआईबी की प्रेस रिलीज़ के अनुसार, अलग सहकारिता मंत्रालय बनने से दूर-दराज़ के इलाक़ों में पहुँचने में मदद मिलेगी. हमारे देश में सहकारिता आधारित आर्थिक विकास बहुत प्रासंगिक है. इस मॉडल में हर व्यक्ति ज़िम्मेदारी और उत्साह के साथ काम करता है. यह मंत्रालय कारोबार को सुलभ बनाने को लेकर काम करेगा।अपने बजट भाषण में भी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सहकारिता को मज़बूत बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. शनिवार को अमित शाह ने कुछ सहकारी संस्थानों के प्रमुखों के साथ बैठक भी की है उन्होंने कहा- मोदी जी के नेतृत्व में हम सहकारिता और सभी सहकारी संस्थाओं को और सशक्त बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।सहकारिता संस्थानों का निर्माण ज़मीनी स्तर पर सामूहिक कोशिश के ज़रिए हुआ है जिनका कल्याणकारी लक्ष्य होता है. मिसाल के तौर पर कृषि क्षेत्र में सहकारी डेयरी, चीनी मिल और कपड़ा मिलों का निर्माण किसानों ने अपने साझे संसाधनों से उत्पादों की अच्छी क़ीमत हासिल करने के लक्ष्य से किया।अभी भारत में दो लाख के क़रीब सहकारी डेयरी सोसाइटी और 330 सहकारी चीनी मिल हैं. नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सहकारी डेयरी ने 1.7 करोड़ सदस्यों से हर दिन 4.80 करोड़ लीटर दूध ख़रीदा और 3.7 करोड़ लीटर लिक्विड दूध हर दिन बेचा. इसी तरह देश के चीनी उत्पादन में सहकारी चीनी मिलों का हिस्सा 35 फ़ीसदी है
सहकारिता मंत्रालय के ज़रिए सरकार चाहती है कि किसान अपने को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनाएँ, अपना माल ख़ुद बेचें. इससे ग्रामीण इलाक़ों में किसानों को संगठित करने में और मदद मिलेगी। विदित हो महाराष्ट्र की राजनीति में सहकारी संस्थानों का दख़ल बहुत ही प्रभावी है. महाराष्ट्र में 100 से ज़्यादा विधायक किसी ने किसी तरह के सहकारी संस्थानों से जुड़े हैं. यहाँ तक कि महाराष्ट्र में एनसीपी प्रमुख शरद पवार और वर्तमान उपमुख्यमंत्री अजीत पवार ने सहकारी संस्थानों में होने वाले चुनावों से ही राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी. महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में सहकारी संस्थानों की भूमिका बहुत ही अहम है।
सहकारिता की प्रमुख मिसालें
भारत में सहकारिता का सबसे बेहतरीन उदाहरण अमूल है जदो भारतीय डेयरी सहकारिता समिति है जिसे गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड संचालित करता है. गुजरात के 3.6 करोड़ दुग्ध उत्पादक इसके मालिक हैं. गुजरात में अगर दूध उत्पादन सहकारिता की देने हैं तो महाराष्ट्र में शक्कर उत्पादन सहकारिता की मिसाल है. शरद पवार यहीं से सहकारिता आंदोलन से एक बड़े नेता बन कर उभरे हैं।
भारत में सहकारिता एक बड़ा वित्तीय सेक्टर हो गया है। देश भर में कृषि उत्पादों खास कर सब्जियां, फल आदि सहकारिता पर बड़े पैमाने पर अपने उत्पादन क्षेत्र से दूर विक्रय के लिए जाते हैं। इसके अलावा गृह निर्माण के क्षेत्र में सहकारिता ने देश ने उल्लेखनीय वृद्धि की है।
(लेखक प्रसिद्द सहकारी नेता एवं जिला सहकारी संघ के सचिव रहे है तथा म. प्र. अपैक्स बैंक के पूर्व डायरेक्टर रह चुके हैं और विगत ४५ वर्षों से सहकारी आंदोलन से सीधे तौर पर जुड़े हुए है।)





