राकेश श्रीवास्तव
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साहित्य सर्जन के विभिन्न आयाम हो सकते हैं।स्वांतः सुखाय से लेकर मनोरंजन,सूचना,जानकारी,इतिहास,आलोचना,व्यंग समाज को दिशा देना एवं समाज की लड़ाई मे शामिल होना हो सकता है।हर एक विषय की अपनी महत्ता है।पर समाज को दिशा देने वाले,समाज की लड़ाई लड़ने वाले विरले ही होते हैं।साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद इस यात्रा में यूं ही नहीं शिखर पर बैठे हैं।जब गांधी देश को अपने आचरण,आंदोलन एवं नवाचार से दिशा दिखा रहे थे तो कलम के सिपाही की रचनाएं समाज को उद्वेलित कर रही थीं।वह न केवल लेखन से वरन अपने सार्वजनिक जीवन में भी समाज को जागरूक करने की लड़ाई लड़ रहे थे।
प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना इसका जीवन्त उदाहरण है।किसी महान साहित्यकार का यश केवल इसमें ही नहीं निहित है कि उसने कितने उपन्यासों की रचना की,कितनी कहानियां और लेख लिखें,कितने महाकाव्य लिखे,आलोचक उनके बारे में क्या कहते वरन यह अधिक महत्वपूर्ण है कि वह पराधीन भारत की लड़ाई में किसके बगल मे खड़े थे।वह किसके लिए लड़ रहे थे।इसके साथ ही महानता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज की विद्रूपताओं और विसंगतियों को किस बहादुरी से सामने ला रहे थे।साहित्य के जनपक्षधरता के आयाम की लड़ाई लड़ने वालों की एक अलग ही धुन होती है।ऐसा नहीं है कि वह साहित्य के सौंदर्यशास्त्र एवं उसकी बारीकियों से अनभिज्ञ होते हैं या उसका आदर नहीं करते हैं परंतु उनकी मुख्य चिंता के केंद्र मे सामाजिक सरोकार रहते हैं।
धनपत राय से मुंशी प्रेमचंद का सफर वाया नवाब राय अंग्रेजी हुकूमत में जन्मे,आत्मसम्मान से जागृत किसी साधारण युवक की यात्रा की तरह ही शुरू हुआ।जहां अधिकांश भारतीय अंग्रेज शासन को नियति मान कर उसके साथ सहयोग कर रहे थे वहीं स्वतंत्रता के दीवाने अनेक लोग अलग-अलग जगह पर अलख जगा रहे थे और एक दूसरे को हिम्मत,ऊर्जा और प्रकाश दे रहे थे।भारत के इतिहास में बीसवीं सदी बहुत ही अद्भुत और महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय देश में अनेक लोग जिनका जन्म 19वीं और 20वीं सदी में हुआ था वह अपने क्षेत्र की महान विभूतियां थे।उनका व्यक्तित्व और कृतित्व बहुत विशाल था।वह विचारक भी थे और कार्यकर्ता भी थे।उनकी दृष्टि बहुत विशाल थी।उनकी सोच व्यापक थी।उनका फलक बहुत विस्तृत था।स्वामी विवेकानंद,गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर,महात्मा गांधी,नेताजी सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह, मुंशी प्रेमचंद,सीमांत गांधी,जयप्रकाश,डाक्टर राम मनोहर लोहिया जैसे लोगों की सदी थी।यह मानव जिजीविषा के उत्कर्ष का समय था।इन सब के मार्ग में अलग-अलग अवलंबन हो सकते है परंतु सबका लक्ष्य एक ही था कि अंग्रेजी शासन से मुक्ति और साथ ही एक ऐसे समाज की स्थापना जिसमें सबके लिए बराबर संसाधन एवं अवसर उपलब्ध हों,जहां मानवता शीर्ष पर हो,जहां किसी का शोषण न हो,जहां भूख और दरिद्रता का स्थान न हो।यह सभी महान शख्सियत विजनरी थे।इनका लक्ष्य अंग्रेजी शासन को समाप्त करना तो था ही साथ ही समाज में बराबरी एवं मानव की गरिमा बनाए रखना भी था।
इस महान सदी में अभाव के बीच में जन्मे अपने संघर्ष से अपना स्थान बनाने वाले मुंशी अजायबराय श्रीवास्तव के पुत्र धनपत राय हिंदी,उर्दू और फारसी की के लेखकों से बहुत प्रभावित थे।उन्होंने अनेक विदेशी लेखकों की रचनाओं का अनुवाद भी किया।1910 में उन्होंने सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप)लिखा।ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर राजद्रोह का आरोप लगाया और उनके संग्रह को जब्त कर लिया। 8 फरवरी 1921 को गोरखपुर में महात्मा गांधी ने नौजवानों से नौकरी छोड़ने को कहा।उनके आह्वान पर आपने भी अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।आप बनारस,गोरखपुर,इलाहाबाद,लखनऊ, प्रतापगढ़,हमीरपुर,कानपुर इत्यादि स्थानों पर घूमते रहे।
साहित्य मे सरल विचारों को जटिल बना कर पेश करना बहुत आसान होता है परंतु सरल विचारों को आसान भाषा में लिखना बहुत ही कठिन होता है।वह तभी हो पाता है जब लेखक दिल से लिख रहा हो।यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद,महात्मा गांधी,प्रेमचंद जो बात करते हैं वह आम बोलचाल की भाषा में बात करते हैं। उनको समझने के लिए शब्दकोशों की आवश्यकता नहीं होती है।उनकी बात किताब से सीधे हमारे मन मस्तिष्क एवं हमारे हृदय में घर कर जाती है। बात जितनी ईमानदारी और दिल की गहराई से कही जायगी, सम्प्रेषण उतना ही अधिक प्रभावशाली होगा।
आप का लेखन यथार्थवादी एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ है।यदि पिछले सौ वर्षों के भारतीय साहित्य को देखा जाए तो जनमानस में सबसे अधिक सम्मान,आदर,लोकप्रियता और प्रेम मुंशी प्रेमचंद, गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर व शरत चंद्र चट्टोपाध्याय को मिला है। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने ही उन्हें उपन्यास सम्राट का संबोधन दिया था।
आज लोग टुकड़ों टुकड़ों में छुटपुट ढंग से चाहे जो भी बातें कहें या करें,साहित्य के वृहद स्तर पर साम्राज्यवाद,सांप्रदायिकता और सामंतवाद के खिलाफ लड़ने वालों में वह सबसे बड़े योद्धा रहे हैं।उनका कहना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।
उनका लेखन और सामाजिक सरोकार एक दूसरे के पूरक रहे हैं। उनकी रचनाओं के पात्र कहीं से भी आयातित नहीं लगते हैं, वे जीवंत हैं और हमारी रोजमर्रा ग्रामीण जिंदगी में दिखते हैं। उनके पात्र लगता है हमारे अगल-बगल ही रह रहे हैं।आज एक सौ साल बाद किसी के साहित्य और उसके व्यक्तित्व का आकलन करने के लिए हमें उस काल खंड की पृष्ठभूमि और परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना पड़ेगां।हमें आज भी अपने इर्द-गिर्द होरी,जुम्मन,हामिद,बूढी काकी,नवाब साहब मिल जाएंगे।
वैसे तो उनकी रचनाएँ कालजयी हैं और कोई एक भी अपने आप में किसी को भी साहित्य में अमरत्व दिला सकती हैं पर कुछ एक के नाम का उल्लेख करना आवश्यक है यथा
निर्मला,कायाकल्प,गबन,कर्मभूमि,गोदान,मंगलसूत्र (अपूर्ण) आदि।यदि कहानियों की बात की जाए तू कुछ हैं जिनका नाम बार-बार मन से हटता नहीं है हैं, जैसे,पंच परमेश्वर,गुल्ली डंडा, दो बैलों की कथा,ईदगाह,बड़े भाई साहब,पूस की रात,ठाकुर का कुआं,बूढ़ी काकी,दूध का दाम,शतरंज के खिलाड़ी,कफन आदि।उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेमपूर्णिमा,प्रेम-पचीसी,प्रेम-प्रतिमा,प्रेम-द्वादशी,समरयात्रा,
मानसरोवर : भाग एक व दो और ‘कफन’।
अभी ऊपर बीसवीं सदी की महानता एवं उसके आदर्शों की जिजीविषा और जागृति का उल्लेख और चर्चा की गई है।परंतु उसके विपरीत यह बड़े दुख की बात है कि आज 21वीं सदी में हम वैज्ञानिक,औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्र में तो बहुत प्रगति कर रहे हैं परंतु मानसिक और इंसानियत के स्तर पर छोटे दायरे में सिमटे जा रहे हैं।हमारी सोच बहुत संकीर्ण और संकुचित हो रही है।पहले हमारा फलक बहुत व्यापक होता था।हमेशा उत्कर्ष की ओर देखते थे।वहीं आज हम अपने महान नायकों को छोटा बनाने पर लगे हुए हैं।अपनी फितरत और क्षुद्रता दिखाते हुए हम उनके छिद्रान्वेषण में लगे हैं।किसी भी स्तर पर बड़ी लकीर खींचने के स्थान पर हर बड़ी लकीर को छोटा सिद्ध करने में लगे हैं।महात्मा गांधी आज पूरे विश्व में पूजे जा रहे हैं।उनका अनुकरण हो रहा है।तब हमारे यहां दुष्प्रचार चलाकर, बिना उनको पड़े या समझे, गांधी को भी छोटा करने की गंभीर कोशिश चल रही है।यद्यपि वह जानते हैं यह निष्फल होगी परंतु फिर भी लगे हुए हैं।इसी प्रकार हमारे अन्य दिवंगत विभूतियों के साथ भी हो रहा है।मुंशी प्रेमचंद भी इसके अपवाद नहीं हैं।
उनके लेखन को समग्र दृष्टि से ना देख कर,उस कालखंड को न देखकर,उस समय की परिस्थितियों को न देखकर,उस समय की सामाजिक ताने-बाने को न देख कर,उनको टुकड़ों टुकड़ों में देखने का कुत्सित प्रयास कुछ लोग पूरी शिद्दत से करने में लगे हैं।कोई उनको ब्राह्मण विरोधी बताता है तो कहीं उनको दलित विरोधी बताया जाता है।और तो और की उनके गाय के कथन को लेकर उनको आरएसएस समर्थक बताया जाता है तो कहीं पर उनको केवल एक हिंदू बताया जाता है।जबकि उनका
चिंतन,उनका जीवन,उनका लेखन इन सब से परे है।उनकी मुख्य चिंता समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करना और उनको दूर करना था।साथ ही ब्रिटिश हुकूमत से छुटकारा पाना था।उनकी नजर से जात पात का भेद,छुआछूत,गरीबी,अमीर गरीब का भेद कुछ भी बच नहीं पाया।उनकी सोच समाज मे समता स्थापित करने की और सबको बराबर न्याय दिलाने की थी।
इस महान रचनाकार की महानता इस बात मे निहित है कि इनके लेखन में समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के सरोकारों की चिंता सदैव समाहित रही तथा प्रगतिशील लेखक संघ के माध्यम से उसकी अगुवाई भी की।प्रेमचंद ने लिखा था ‘जब तक संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा, तब तक मानव समाज का उद्धार नहीं हो सकता।जब तक सम्पत्तिहीन समाज का संगठन न होगा,जब तक संपत्ति-व्यक्तिवाद का अंत न होगा, संसार को शांति न मिलेगी।” आज उनके जन्मदिन पर उनके चरणो मे पुष्प अर्पित हैं।
राकेश श्रीवास्तव,लखनऊ





