स्वतंत्रता प्राप्ति के चौहत्तर सावन देखने के बाद भी कुछ लोगों के द्वारा यही, कहा जा रहा है कि, पिछले सात दशक तक देश में कुछ हुआ ही नहीं है।
पिछले सात सावनों में तो कुछ प्रतिशत लोगों को एक ही संवाद रटाया गया कि नौ दिन चले अढ़ाई कोस
अच्छेदिन लाने के वादें को सिर्फ शाब्दिक रूप से सार्थक बनाने के लिए,पिछली उपलब्धियों को अढ़ाई कोस की कहावत की आड़ में छिपाने की कोशिश की जा रही है।
शाब्दिक उपलब्धियां झूठ के पाँव जैसी होती है।कारण झूठ के पाँव होतें ही नहीं है।
उक्त छद्म वातावरण बनाने वालों के लिए सन 1962 में प्रदर्शित फ़िल्म असली नकली के इस गीत निम्न पंक्तियों का स्मरण होता है।गीतकार हसरत जयपुरी इसे लिखा है।
लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा
दिल की बात बता देता है, असली नक़ली चेहरा
अब न हम को और बनाओ हमने तो पहचान लिया
सागर से भी गहरे निकले हमने तुम को जान लिया
जिस के मन में चोर छिपा हो सामने कब वह ठहरा
लोग तो दिल को खुश रख्ने को क्या क्या ढोंग रचाते है
भेष बदल कर इस दुनिया में बहरूपिये बन जाते हैं
मन दर्पण में मुखड़ा देखो उतरा रंग सुनहरा
किसी शायर ने कहा है।
दुनिया में झूठे लोगों को बड़े हुनर आतें हैं
सच्चे लोग तो इल्जाम से ही मर जातें हैं
कोई लाख करें चतुराई।यदि भगवान पर आस्था रखते हो तो यह भी समझ लो।
माना झूठ बोलकर तुम तरक्की कर लोगे
अंतिम समय में तुम खुदा को क्या जवाब दोगे
सच्चाई अंतः सच्चाई ही रहेगी।
हम तो स्वतंत्रता की चौहत्तर वर्ष की खुशियां मनाएंगे।
स्वतंत्रता संग्राम में जिन कर क्रांतिकारियों ने शहादत दी उन्हें सादर नमन।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





