शशिकांत गुप्ते
तालिबान का शाब्दिक अर्थ होता है,विद्यार्थी।विद्यार्थी मतलब विद्या का अध्ययन करने वाला।सवाल है, कौन सी विद्या? तालिबानी तो धार्मिक कट्टरता की शिक्षा ग्रहण करने वाला विद्यार्थी है।कट्टरता से तात्पर्य है,अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा की पराकाष्ठा तक जाना।धार्मिक कट्टरता मतलब धर्म के नाम पर हिंसा कर आतंक फैलाना?
तालिबान एक कट्टरपंथी मानसिकता है।यह मानसिकता मानव सभ्यता के विकास के विरुद्ध होती है।यह मानसिकता धर्म की दुहाई देते हुए ख़ौफ़ पैदाकर हिंसक तरीक़े से समाज में आतंक फैलती है।
जिस विद्या में मानवीयता नहीं है वह विद्या नहीं अविद्या है।कोई भी धर्म में मानवता के विरुद्ध हो ही नहीं सकता है।यदि वह सच्चा धर्म हो तो?धर्म के नाम पर हिंसा फलाने वाले स्वयं के धर्म को बदनाम करतें हैं।धार्मिक उन्माद फैलाकर लोगों आतंकित करना तात्कालिक खुशी पैदा कर सकता है,लेकिन इसके दूर गामी परिणाम बहुत ही विध्वंसक होतें हैं।
हिंसा करने वाले,आमजन को आतंकित करतें हैं।लोगों में अपना ख़ौफ़ पैदा करतें हैं।ऐसे ख़ौफ़ की आयु अल्प ही होती है।
इस मानसिकता के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के लिए धर्म और अध्यात्म के अंतर को समझना जरूरी है।
अध्यात्म की समझ पैदा होगी तो स्वाधीनता के मूल्यों को समझेंगे।
स्वाधीनता का मतलब दिमाग़ी तौर पर सशक्त होना है।
दिमाग़ी तौर पर सशक्त होने से मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूकता आती है।मनुष्य में जब यह जावरुकता विद्यमान होगी तो वह दूसरे मनुष्य को भी मनुष्य ही समझेगा और उसके निजता पर आक्रमण नहीं करेगा।दिमाग़ी तौर पर सशक्त मानव कभी भी दूसरों के पहनावे, खाने पीने, रहन,सहन पर पाबंदी लगाने की जुर्रत नहीं करेगा।
इस संदर्भ में प्रख्यात शायर स्व.निदा फ़ाज़ली का यह शेर मौजु है।
हिन्दू भी खुशहाल है,मुसलमा भी खुशहाल है
फ़क़त परेशान है तो इंसान परेशान है
ईबादद के महत्व को बयां करते हुए शायर स्व.राहत इंदौरी का यह शेर महत्वपूर्ण संदेश देता है।
उसकी याद आई है
साँस ज़रा आहिस्ता चलो
धडकनों से भी इबादत में खलल पड़ता
यह सारे विचार उन लोगों के लिए हैं जिनके शरीर में दिल है।हृदय है।पत्थर दिल वालों के लिए किसी शायर ने क्या खूब फरमाया है।
वो आराम से है जो पत्थर के है
मुसीबत तो एहसास वालों की है
उपर्युक्त मुद्दों पर व्यापक रूप से सशक्त मानसिकता से विश्वव्यापी बहस होना चाहिए।
आतंक के विरुद्ध सिर्फ यह पंक्तियां याद आती है।
दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल
बापू ने अंतिम समय हे राम ही कहा है।यह कहतें हुए बापू ने दुनिया से राम राम कर ली।
अंत में यही कहा जा सकता है।
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बेर रखना
शशिकांत गुप्ते इंदौर





