अग्नि आलोक
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विज्ञापनों की एहमियत ?

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शशिकांत गुप्ते

समाचार पत्रों में समाचार ढूंढना पडतें हैं।समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर ही विशालकाय विज्ञापन दिखाई देता है।समाचार पत्र के पन्ने पलटते रहो।विज्ञापनों के बीच में इस तरह से समाचार पढ़ने को मिलतें हैं।जिस तरह स्वागत अभिनंदन और वंदन की कर्कश ध्वनि और हुजूम के बीच किसी बीमार मरीज को अस्पताल पहुँचाने वाली एम्बुलेंस दिखाई देती है। एम्बूलेंस में मरीज का होना ही मरीज की गम्भीर स्थिति का द्योतक है।
हमारा नेता कैसा हो फलाँ चंद जैसा हो के नारों के बीच एम्बूलेंस के सायरन की आवाज दब जाती है।बेचारा मरीज अपनी साँसों को अपने दम पर क्रियाशील रखने की कौशिश करता रहता है।बहुत सी बार तो मरीज अपनी कौशिश में असफल हो जाता है।मरीज की साँसे मरीज के शरीर का साथ छोड़ देती है,और मरीज के परिजन अपनी सहिष्णुता का परिचय देते हुए,समझदारी के साथ, मरीज की अस्पताल में होने वाली शल्यक्रिया को स्थगित कर अंतिम क्रियाकर्म की तैयारी में लग जातें हैं।मरीज अपने इलाज से वंचित होने पर भी गर्व का अनुभव करता होगा,कारण वह जीवन के अंतिम सत्य को जानने में सफल हो जाता है।साथ ही वह इस सूक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव लेता है।
कभी कभी अभिषाप ही वरदान सिद्ध होता है
स्वागत,अभिनंदन और वंदन के उत्साह वर्धक शोरगुल के बीच प्रसव पीड़ा से पीड़ित स्त्री अपनी कोख में पल रही देश की भावी पीढ़ी को एम्बुलेंस में ही जन्म देने के लिए बाध्य होती है।
ऐसे समय सर्वोच्य शक्ति कोई है।इस बात का एहसास हो जाता है।यदि कोई आदि शक्ति नहीं होती तो ऐसे विषम परिस्थिति में भी देश के भावी कर्णधार इस धरा पर जन्म लेने से वंचित रह जातें?
स्वागत सम्पन्न हो ने के बाद सड़क पर मुझाएँ फूल, स्वयं को अंग्रेजी का Fool समझतें हुए आत्मग्लानि से अपनी इहलीला समाप्त कर लेतें हैं।
विभिन्न प्रकार के उत्पादों के विज्ञापनों के साथ सियासी, धार्मिक और सामाजिक संगठनों की गतिविधियों के विज्ञापनों की भरमार ही समाचार माध्यमों की आर्थिक पोषक होती है।इन्ही गतिविधियों के कारण ही बैनर पोस्टर,झंडे,डंडे बनाने वालों को रोजगार मिलता है।
जो भी सियासी लोगों के जन्म दिनों, रैलियों और स्वागत के विज्ञापनों को देखकर एक बात स्पष्ट हो जाती है।अपना देश कहीँ से कहीँ तक गरीब नहीं है।
वैसे भी सन 2014 के बाद की अर्थनीति ने हरएक देशवासी को आर्थिक दृष्टि से ऊपर उठा दिया है।महंगा राशन,महंगा ईंधन,महंगा खाद्य तेल,खरीद ही रहा है।मोबाइल का महंगा रिचार्ज भरवा ही रहा है।
यही तो प्रमाण है आर्थिक दृष्टि से ऊपर उठने का।
आर्थिक रूप से ऊपर उठने की चर्चा गलती से लेखक ने व्यंग्यकार मित्र के साथ की।व्यंग्यकार मित्र अपनी व्यंग्यात्मक शैली ने कह दिया कि, आमजन आर्थिक रूप से इतना ऊपर उठ रहा है कि, ऊपर ही उठ जाता है।
जो थोड़ा बहुत सक्षम होता है उसके उठावने का विज्ञापन प्रकाशित होतें हैं।इनदिनों उठावने की सूचना के विज्ञापन भी महंगे हो गए हैं।
इसीलिए समाचारों से अधिक महत्वपूर्ण है विज्ञापन।
अंत में प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी का यह शेर मौजु होगा
हर शख्स दौड़ता है,यहाँ भीड़ की तरफ
फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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