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मामा ने फेंका पांसा :सतर्क रहें बेरोजगार

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*सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों मध्यप्रदेश में पिछड़े वर्ग ने आरक्षण वृद्धि हेतु जो जबरदस्त प्रदर्शन भोपाल में किया था उसका असर नज़र आने लगा है। हालांकि प्रर्दशन के दिन मामा ज्ञापन नहीं लिए कहीं तफ़री पर चुपचाप निकल लिए। पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठी चार्ज किया और पकड़ कर जेल में भी डाला गया ।यह अप्रत्याशित इतना बड़ा आंदोलन शिवराज को अंदर तक हिला गया क्योंकि अभी तक पिछड़ा वर्ग का बड़ा धड़ा मामा के ही नहीं बल्कि भाजपा के साथ मज़बूती से खड़ा था।यह आंदोलन इसमें बिखराव ना ला दे इस चिंता में बेचेन मामा ने शकुनि की तरह एक जबरदस्त पांसा फेंका है जिससे उन्हें पूरी उम्मीद है कि वे इस वर्ग को पुटिया लेंगे। बेरोजगारों की गत दिनों भोपाल में उमड़ी भारी भीड़ पर पुलिस की पिटाई ने भी शिवराज को भर्तियां निकालने मज़बूर किया है ।

Four months after taking charge in MP, Shivraj Singh Chouhan tests COVID  positive, hospitalised | India News,The Indian Express


आपने पिछले दिनों एक रपट देखी होगी जिसमें कहा गया है कि रोजगार देने के मामले में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी सबसे आगे चल रहे हैं । उसमें शिवराज मामा की पोजीशन दूसरे नंबर पर है। हालांकि इन आंकड़ों से आम लोगों की सहमति नहीं है वे इसे फर्जी मान रहे हैं।इसे यदि सच मान भी लिया जाए जो बहुप्रचारित समाचार है तो मामा पीछे रहने वालों में से नहीं है और इसी चक्कर में राज्य सेवा आयोग ने कुछ महत्त्वपूर्ण पदों की भर्ती हेतु आवेदन मांगे हैं जिसमें पिछड़े वर्ग का इतना ख़्याल रखा गया है कि अनारक्षित पदों की संख्या शून्य कर दी है। इससे पिछड़े वर्ग को संतुष्ट करने के साथ अपने रोजगार के ग्राफ को बढ़ाने की कोशिश हुई है।
 निकाली गई भर्तियों में मध्यप्रदेश राज्य सेवा आयोग ने कुल 966 पदों में से 533 पद अर्थात 55.17% सर्वाधिक पद ओबीसी (पिछड़ावर्ग) के लिए आरक्षित किये हैं  ओबीसी नेताओं का कहना है यह कदम भाजपा सरकार ने पिछड़ा वर्ग आंदोलन के बाद उठाया है। लेकिन जिस तरह की भर्ती निकाली गई है उसमें दाल में काला साफ़ नज़र आ रहा है।इसे देखें और राजनीति समझने की कोशिश करें। मेडिकल आफीसर्स की भर्ती में एस टी-25, ओबीसी-401,ई डब्ल्यू एस-73, अनारक्षित-00। महिलाओं के लिए आरक्षित पदों में भी देखिए–सामान्य-00,एस सी-00,एस टी-83, ओबीसी-132,ई डब्ल्यू एसपी 24 में यह स्थिति है।

सबसे बड़ी बात ये है कि सामान्य वर्ग के लिए कोई भर्ती नहीं।ये शून्य क्यों?। इससे अनारक्षित वर्ग में आक्रोश शुरू हो गया है एक तो आरक्षण वृद्धि से वह पहले से ख़फ़ा है ही दूसरे उनके लिए पद नहीं रखना निश्चित तनाव बढ़ाने वाला है।यह मामा की सोची समझी चाल है।वह पिछड़े वर्ग को भारी पद देकर यह जताना चाहती है कि वे तो उनके पक्षधर हैं उनकी तरक्की के इच्छुक हैं और दूसरी तरफ अनारक्षित वर्ग को रुष्ट कर उनसे दमदार विरोध की अपेक्षा रखते हैं। कोशिश यह होगी मामला अदालत में जाए,उलझ जाए और उनका लंबा वक्त गुज़र भी जाए।यह पूरी तरह शकुनि चाल है। राजनीति का ऊंचा खेला है इसे बेरोजगारों को समझना चाहिए। बेरोजगारों को लड़ाना और तमाशा जारी रखने का सिलसिला प्रदेश में नया नहीं है। सहायक प्राध्यापकों का मामला हो या सहायक शिक्षकों का मामा की इसी पालिटिक्स के बीच लंबे अंतराल से पेंडिंग है।

ओबीसी वर्ग से गुजारिश है कि इन भर्तियों की तालिका से ख़ुशी से काफ़ूर ना हो जाए और मामा के फेके पांसा से ख़बरदार रहें। तमाम बेरोजगारों की एकजुटता की रणनीति बनाकर  ही  मामा की राजनीति से निपटा जा सकता है।वरना सभी अदालतों के झूले में झूलते रहते जाएंगे।

Ramswaroop Mantri

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