अग्नि आलोक
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हम आस्थावान लोग…हैं

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शशिकांत गुप्ते

हे प्रभु रक्षा करों।रक्षा करों हे दयानिधान।आप तो जगत के पालनहार हो।आप हर युग में मानव रूप में अवतरित हुए हो।दुष्टों का संहार किया है।
भगवान आपने स्वयं भगवत गीता में अपने श्री मुख से कहा है।
यदा यदा : जब-जब
हि: वास्तव में
धर्मस्य: धर्म की
ग्लानि: हानि
भवति: होती है
भारत: हे भारत
अभ्युत्थानम्: वृद्धि
अधर्मस्य: अधर्म की
तदा: तब तब
आत्मानं: अपने रूप को रचता हूं
सृजामि: लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
अहम्: मैं
परित्राणाय: साधु पुरुषों का
साधूनां: उद्धार करने के लिए
विनाशाय: विनाश करने के लिए
: और
दुष्कृताम्: पापकर्म करने वालों का
धर्मसंस्थापन अर्थाय: धर्मकी अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए
सम्भवामि: प्रकट हुआ
युगे युगे हर युग में।
आप स्वयं ने गीता में कहा है कि आप सूक्ष्म से सूक्ष्म में और विराट रूप में विद्यमान हो।आप अंतर्यामी हो।
इनदिनों आप जहाँ भी जैसे भी हो आप देख ही रहे होंगे,आपके प्रति हमारी आस्था कितनी बढ़ रही है।त्रेतायुग में आप ने सभी सुखों को त्यागा था।रघुकुल की रीत को निभाने के लिए आप चौदह वर्षो तक वन में चले गए।पांच वृक्षों की ओट में आपने एक कुटिया बनाई।
कलयुग में हमारी आस्था इतनी अधिक जागृत हो गई है कि, हमें आप का त्रेतायुग का वनवास और कुटिया में निवास करने से बहुत ही दुःखद हुआ।
इसीलिए हमनें कलयुग में आप के आपके लिए दिव्यभव्य बेशकीमती मंदिर निर्मित करने के लिए आंदोलन तक किया।आप तो सब जानते हो आपके मंदिर निर्माण में जो धन लग रहा है वह शुद्ध सफेद धन है।आस्थावान धनकुबेर मुक्तहस्त से दान दे रहें हैं।अंतः इनदिनों मंदिर निर्माणाधीन है।
हमारे अंतर्मन में आपके प्रति दिन-ब-दिन आस्था बढ़ते ही जा रही है।आस्था बढ़ने से हम राष्ट्रवादी होतें जा रहें हैं।राष्ट्र के प्रति हमारी आस्था इतनी बढ़ गई है कि, हमारे इरादे पाक साफ होते जा रहें है।हम अधर्मी लोगों को पड़ौसी देश में भेजने की धमकी देतें हैं।दो के झगड़े में तीसरे का भला होता है।हमें अधर्मियों को भेजने के लिए एक पड़ौसी मुल्क अफगानिस्तान और मिल गया।
धार्मिक आस्था के साथ हमारे अंतर्मन में व्यक्ति के प्रति भी आस्था जागृत हो गई है।व्यक्ति के प्रति आस्था के कारण ही हम व्यक्ति को राष्ट्र का पर्याय समझतें हैं।
हम हर एक समस्या धार्मिक आस्था के बलपर दूर करना चाहतें है।इस मुद्दे पर विरोधी हमें अंधभक्त तक कह देतें हैं।हम इसका बुरा नहीं मानतें है।हम संस्कार,संकृति,के विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित अनुयायी हैं।
हमने व्यक्ति के प्रति अपनी आस्था प्रकट करने के लिए, व्यक्ति के कहने पर कोरोना जैसे महामारी से मुक्ति पाने के लिए थाली,और तालियां बजाई।महंगाई को दर किनार रखतें हुए हमने दीपक भी जलाएं।
हे प्रभु आप हमारी आस्था को ऐसे बरकर्रार रखों।हमारी आस्था ऐसे ही दिन प्रति दिन बढ़ते रहे।
हमें अपनी आस्था पर पूर्ण विश्वास है।
तेरे फूलों से प्यार तेरे कांटो से भी प्यार
तू जो देना चाहे दे दे करतार
दुनिया के पालनहार

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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