शशिकांत गुप्ते
आमजन के मन बहलाने के लिए वादों का झुनझुना बजाया जा है।
भाइयों बहनों की कर्कश आवाज के साथ झुनझुने की आवाज सुनाई जाती है।अच्छेदिन आएंगे इस जुमले से शुरू होती है।
झुनझुने के साथ हर बार नई नई आवाज निकाली जाती है।जो सिर्फ उन लोगों को ही कर्णप्रिय लगती है,जो लोग भावपूर्ण भक्ति लीन है।यह लोग भावपूर्ण भक्ति में इतने लीन हो गएं हैं, इन्हें बाजार में बढ़ते हुए भाव से कोई लेना देना नहीं है।
झुनझुने की आवाज के साथ जो जुमले बोले जातें हैं,उन्हें सुनकर आमजन तो सन 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म सन ऑफ इंडिया के गीत यह पंक्तियां दोहरा रहा है।जो गीतकार शकील बदायुनी ने लिखी है।
दिखला के किनारा मुझे मल्लाह ने लूटा
कश्ती भी गई, हाथ से, पतवार भी छूटा
अब और न जाने मेरी तक़दीर में क्या है
दिल तोड़ने वाले, तुझे दिल ढूँढ रहा है
सड़क पर करिश्मे दिखाने वाला जादूगर डमरू बजाकर भीड़ इकट्ठी करता है।इसे सड़क छाप जादूगर तो नहीं कहेंगे लेकिन सड़क पर करिश्मे दिखाने वाले जादूगर के डमरू की आवाज झुनझुने की आवाज के आगे धीमी पड़ गई है।सड़क पर करिश्मे दिखाने वाला जादूगर अब Inferiority Complex अर्थात हीन भावना महसूस कर रहा है।
सड़क पर जादुई करिश्मे दिखाकर लोगों का मनोरंजन करता है।लोग खुशी से उसके कटोरे में भीख के रूप में कुछ पैसे दाल देतें हैं।
झुनझुने बजाकर अलौकिक करतब दिखाने वाला जादूगर विज्ञापन बहुत करता है।जो सर्वथा असम्भव है,वह जादू भी सिर्फ विज्ञापनों में दर्शाता है।
सड़क पर जादुई करिश्मे वाला जादूगर मुह से बड़े बड़े लोहे के गोले निकाल कर दिखाता है।झुनझुने वाला जादूगर तो आमजन के मुह से निवाले छीन रहा है।
सड़क पर जादुई करिश्मे दिखाने वाले जादूगर का तो स्वरोजगार है।झुनझुने की आवज के साथ नाली की गैस से रासायनिक क्रिया के द्वारा ईंधन प्राप्त कर,रोजगार पैदा करने की अनोखी अदभूत सलाह दी जा रही है।
सड़क पर जादू दिखाने वाला जादूगर ईमानदारी से कहता है कि यह सिर्फ हाथों की चालाकी है।
झुनझुने बजाने वाला तो हर बार वादे करता है।भक्त लोग वादों को मंत्र समझकर उनका जाप करने लगतें हैं।
अंधश्रद्धा उन्मूलन के अभियान में सक्रिय लोग भक्तों को समझाते हैं।दुर्भाग्य से अंधभक्त समझने की कोशिश तो दूर अंधश्रद्धा उन्मूलन के पुरोधा दाभोळकरजक को ही परलोक भेज देतें हैं।
यह सारे मुद्दे वैचारिक बहस के मुद्दे हैं।
अंत में प्रख्यात गीतकार स्व. नीरज की लिखी निम्न पंक्तियों का स्मरण होता है।
मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है
शशिकांत गुप्ते इंदौर





