नसीरुद्दीन शाह के बयान से सभी धर्म के कट्टरपंथी सबक लें
* अजय खरे *
रीवा । देश जिस धार्मिक कट्टरता और उन्माद की ओर बढ़ रहा है , इसके दुष्परिणाम काफी भयावह हो सकते हैं । देश के नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह धार्मिक कट्टरता का डटकर विरोध करे । यदि सरकार में बैठे लोग इस कट्टरता को बढ़ावा देंगे तो मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी । फिल्म कलाकार नसरुद्दीन शाह ने अपने धर्म के कुछ कट्टरपंथी लोगों के द्वारा तालिबान के समर्थन में खुशी जाहिर करने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है . नसीरुद्दीन शाह ने तालिबान का समर्थन करने वालों की आलोचना करते हुए कहा कि हिंदुस्तान का इस्लाम अलहदा है । उन्होंने कहा है कि कुछ हिंदुस्तानी मुसलमान इन बर्बर लोगों के लिए जश्न मना रहे हैं जो कि चिंता की बात है और खतरनाक भी है । नसरुद्दीन शाह के इस बयान को काफी अच्छा माना जा रहा है , वहीं कुछ मुस्लिम हिंदू कट्टरपंथी इससे असहमत नजर आ रहे हैं । यह भारी विडंबना है कि भाजपा के कट्टरपंथी लोग भी नसरुद्दीन शाह के बयान को लेकर अनावश्यक वाद विवाद खड़ा कर रहे हैं । देखने को मिल रहा है कि नसीरुद्दीन शाह के द्वारा कट्टरपंथी मुसलमानों को दी गई नसीहत से कट्टरपंथी हिंदू भी परेशान नजर आ रहा है । उन्हें ऐसा लगता है कि यदि धार्मिक कट्टरता का माहौल नहीं रहेगा उनकी दुकानदारी खतरे में पड़ जाएगी । अभी तक ऐसे लोग जनता के बीच यह गलत धारणा बनाते रहे हैं कि कोई मुसलमान कट्टरपंथ का विरोध नहीं करता है लेकिन नसीरुद्दीन शाह के बयान के चलते उनका बना बनाया खेल बिगड़ता नजर आ रहा है । नसीरुद्दीन शाह ने भले ही तालिबान का समर्थन करने वाले कुछ हिंदुस्तानी मुसलमानों पर कटाक्ष किया हो लेकिन परोक्ष रूप से उनका यह कटाक्ष उन सभी लोगों के ऊपर है जो तालिबानी मानसिकता में जी रहे हैं । ऐसी स्थिति में भाजपा के उन तमाम नेताओं को भी बुरा लग रहा है जो हिंदुत्व की आड़ में उसी मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं जो तालिबान के रूप में सामने आई है । दूसरे धर्म के खिलाफ नफरत फैलाना सबसे बड़ी कट्टरता है । धर्म जिस उद्देश्य के लिए बना है यदि लोग उस पर चलें तो दुनिया में अमन चैन बना रहेगा । कोई मजहब नफरत नहीं सिखाता लेकिन बढ़ती आपसी नफरत के चलते मजहब बदनाम हो रहे हैं ।




