सुसंस्कृति परिहार
अब तक बिखरे बिखरे किसानों की एकता का शंखनाद मुजफ्फरनगर महापंचायत में देखने मिला जहां देश के सभी कृषि प्रधान क्षेत्रों के किसानों की उपस्थिति रही। वह इस बात की ताकीद करता है कि किसान ही अब इस देश में नई क्रांति लाने वाले हैं। महापंचायत में गत रात्रि में किसान जिस बड़ी तादाद में पहुंच रहे थे उससे यह संकेत पहले ही मिल चुके थे कि यह महपंचायत ऐतिहासिक होगी।नया कुछ करेगी।इस एेतिहासिक जमावड़े में बुजुर्ग किसान , महिलाओं और बच्चों के बुलंद हौसले जिस तरह महापंचायत में देखने मिले , उनके तेवरों से साफ है कि वे मोदी सरकार और उसके रिमोट संघ से कितने ख़फ़ा हैं।वार्ताओं के चेहरों पर आक्रोश बराबर नज़र आ रहा था ।
यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि किसानों ने सरकार के षड्यंत्रों को भली-भांति समझा है तभी तीन कृषि बिलों के खिलाफ ,कोई बीच का रास्ता मानने तैयार नहीं हैं।ये किसान ना केवल अपनी ज़मीन और उत्पादन छीनने वाले कारपोरेट के खिलाफ है बल्कि आम उपभोक्ताओं को आगे आने वाले संकटों से बचाने की लड़ाई शांति पूर्ण अहिंसक आंदोलन के ज़रिए लड़ रहे रहे हैं।उनकी सहनशीलता कृषि कार्य में भी दिखाई देती है जब सूखा,बाढ़ आदि में वे सब कुछ खोकर भी फिर उसी मेहनत और जोश से जुट जाते हैं।यही सहनशीलता उनके आंदोलन को इतने लंबे अर्से तक बनाए हुए है। कारपोरेट और पूंजीवादी ताकतें सम्पूर्ण बाजार पर तकरीबन कब्ज़ा किए हुए हैं अब भारत के किसान को जर्जर बनाने उनकी ज़मीन और तमाम प्रोडक्ट छीनना चाहती है। कश्मीर में 370 हटाने और कारपोरेट को छूट देने के दुष्परिणाम सामने आ गए हैं पहले सेब बीस से पच्चीस रुपए किलो वहां के किसान बेचते थे जो हमारे यहां आते आते 40और पचास का बिकता था।पहले कारपोरेट ने यहां 35₹के रेट पर सेब खरीद कर किसानों को खुश किया अब वे 15-16₹में खरीद कर 100-120₹में यहां बेच रहे हैं।यही हाल बादाम ,अखरोट का हुआ है।यही वे कृषि उत्पादन पर करना चाहते हैं किसान के साथ आम उपभोक्ता उससे इसी तरह प्रभावित होगा ।जिसकी तैयारी भारत सरकार अपने दो प्रमुख उद्यमियों को फायदा पहुंचाने तीन काले कृषि कानूनों में कर चुकी है और किसान हम सबके हित में इतने दिनों से संघर्षरत हैं। किसान का साथ देना हमारी अपनी भी ज़रूरत है।इस बात को हमें समझना होगा।
इस बीच उन्होंने अपने तकरीबन 600साथियों को खोया है। पिछले दिनों करनाल में किसानों के जिस तरह सिर फोड़े गए जिसमें एक किसान शहीद भी हो गया यह किसी अफ़सर का निर्णय नहीं हो सकता है इसके पीछे हरियाणा की खट्टर सरकार की मानसिकता ही काम कर रही है जिसने अधिकारियों को विवेक शून्य बना दिया है। उत्तर प्रदेश में तो सुको भी जंगल राज मान चुका है मुजफ्फरनगर महापंचायत की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है ये वक्त बताएगा।योगी राज में किसानों की महापंचायतों से अंदर खौल तो है इसलिए वहां नेट बंद कर दिए गए।इतनी बड़ी भीड़ पर यदि कोई दमनात्मक कार्रवाई होती तो उसका परिणाम खतरनाक हो सकता था।आजतक की रिपोर्टिंग करने गई चित्रा त्रिपाठी को ग़लत रिपोर्टिंग पर किसानों ने जिस से तरह खदेड़ा है वह गोदी मीडिया के लिए सबक है। उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए भी।
आज किसान अनपढ़ नहीं वह अपना भला बुरा सब समझ रहे हैं इसलिए जहां गलत होता है वहां विरोध दर्ज कराने में देर नहीं करते।उनकी इसी समझ की वजह है कि यह आंदोलन अब राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है। उत्तर प्रदेश की ज़मीं पर हर हर महादेव,अल्लाहू अकबर, वाहेगुरु का खालसा नारों के बीच गोदी मीडिया मुर्दाबाद, मोदी सरकार मुर्दाबाद,किसान एकता ज़िंदाबाद और लड़ेंगे जीतेंगे जैसे नारों की अनुगूंज पूरे देश तक पहुंची है।अब ये अभियान जिला स्तर पर भी चलेगा।रैली को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मौल्ला ने कहा मिशन उत्तरप्रदेश-उत्तराखण्ड शुरू हो चुका है और कानून वापसी की लड़ाई अब सरकार वापसी तक जाएगी ।आगामी 10 और 11 सितंबर को लखनऊ में तमाम किसान संगठन के पदाधिकारियों की एक अहम बैठक होगी, जिसमें प्रदेश स्तर और जिला स्तर पर संयुक्त मोर्चा बनाए जाने पर मुहर लगाई जाएगी। इसके अलावा संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से ऐलान कर दिया गया है कि तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के तहत 27 सितंबर को भारत बंद किया जाएगा।
यह सच है देश के तकरीबन 60फीसदी मेहनतकश किसानों के महासैलाब की मुजफ्फरनगर के उठी यह बुलंद आवाज़ अब थमेगी नहीं और एक ऐतिहासिक क्रांति के रूप में दर्ज होगी। इससे यकीनन देश में पूंजीवादी ताकतों का विनाश होगा। होगी। इससे यकीनन देश में पूंजीवादी ताकतों का विनाश होगा। भारत सरकार चाहे तो किसानों की मांगों को तवज्जो देकर इसे समाप्त कर सकती है। कहीं ऐसा ना हो बहुत देर हो जाए।
सचमुच, किसान ही देश में नई क्रांति लाएंगे




