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कर्ज़ ( शिक्षक दिवस पर विशेष )

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महाविद्यालय के नए बने भवन का उद्घाटन शिक्षा मंत्री को करना था। प्राचार्य गोपालकृष्ण प्रबंधों का निरीक्षण कर रहे थे कि अचानक एक पुलिस वाले ने उनके पाँव छूते हुए पूछा, “मुझे पहचाना सर ?” प्राचार्य अचकचाए से उसे देख रहे थे।
“मैं महेंद्र हूँ सर !”
“नाम तो तुम्हारा मुझे वर्दी पर दिखाई दे रहा है, पर…”
“याद कीजिए सर, एक लड़का ठिठुरती ठंड में बिना स्वेटर के आता था और आपने उससे पूछा था- तुमने स्वेटर क्यों नहीं पहना है ?”
“उसने कहा था मुझे ठंड नहीं लगती। ” प्राचार्य की आँखें बेसाख़्ता नम हो आईं।
“आपने न केवल महेंद्र को स्वेटर दी, उसकी किताबों और फ़ीस के ख़र्चे की ज़िम्मेदारी भी ख़ुद पर ले ली। मैं ही क्यों, कितने विद्यार्थी आपकी वजह से ही पढ़ पाए। हम सब को आपने एक बात कही थी सर कि मैं तुम पर दया नहीं कर रहा हूँ क्योंकि दया स्वाभिमान को कुचल देती है। ये कर्ज़ है तुम पर। जब कमाने लगो तो मेरे पैसे मुझे लौटा देना। मैं न रहूँ या न मिलूँ तो किसी ग़रीब बच्चे को पढ़ा देना। “
प्राचार्य याद कर रहे थे उस महाविद्यालय को, जहाँ उनकी पहली नियुक्ति बतौर प्राध्यापक हुई थी। तीस साल से वे इसी तरह ग़रीब बच्चों को कर्ज़ देते आ रहे हैं। उन्होंने कभी नहीं चाहा कि कोई बच्चा उनका अहसानमंद हो, इतना ज़रूर चाहा कि उनका हर शिष्य संवेदनशील इन्सान बने।
“कहाँ खो गए सर ?
प्राचार्य चौंककर वर्तमान में लौट आए। महेंद्र कह रहा था, “मैं बतौर इंस्पेक्टर पुलिस में भर्ती हुआ था, आज डीएसपी हूँ। अभी कुछ ही दिन पहले यहाँ ज्वाइन किया है। उस समय मोबाइल तो होते नहीं थे। आप हमारे कॉलेज से जिस शहर में ट्रांसफ़र होकर गए थे,वहाँ मैंने पता किया था। आप कहीं और चले गए थे। बेशक पुलिस की नौकरी में समय नहीं मिल पाता, पर मुझे किसी भी तरह आपसे मिलना चाहिए था। किसी को ढूँढ़ना हो तो दुनिया बड़ी नहीं है। इस गुस्ताख़ी के लिए माफ़ी चाहता हूँ सर ! “
“अरे नहीं महेंद्र, जगह दिलों में होती है, रूबरू न भी मिले तो क्या ?” उन्होंने महेंद्र को गले से लगा लिया।
“मैंने लगातार आपके रास्ते पर चलने की कोशिश की है सर। जहाँ भी जाता हूँ, ग़रीब बच्चों के लिए वह सब करता हूं जो आपने हमारे लिए किया, फिर भी आपका कर्ज़ तो मुझपर ज्यों का त्यों ही है। आज आप मिले हैं तो सोचता हूँ मुझे कर्ज़ चुका देना चाहिए, पर कर्ज़ इतना बड़ा है कि चुकाने में स्वयं को असमर्थ पा रहा हूँ। ऐसे कर्ज़ भी कभी चुक सकते हैं सर ? “
“ऐसे कर्ज़ कभी चुकने भी नहीं चाहिएँ। इन कर्जों को तो पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत की तरह पहुँचना चाहिए।” प्राचार्य ने महेंद्र का हाथ थाम लिया। महेंद्र ने महसूस किया कि उनका ठंडा हाथ हौले-हौले काँप रहा था जैसे ओस की कोई बूँद किसी पत्ती पर शाइस्तगी से फिसल रही हो।

  • हरभगवान चावला,सिरसा,हरियाणा

Ramswaroop Mantri

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