शाख से पत्तियाँ पूछने क्यों लगीं,
गुल खिलायें या यों ही मचलते रहें।
अब हवाओं के झोंके भी चुभने लगे,
तुम कहो साथ उनके भी चलते रहें।
आँधियों का अँदेशा बहुत बढ़ गया,
नीड़ को छोड़कर हम कहाँ जायेंगे।
चोट हमसे तो पहले लगेगी तुम्हें,
तुम जहाँ जाओगे हम वहाँ आयेंगे।
लोग आने लगे हैं तुम्हें देखने,
पक्षियों का बसेरा बिखर जायेगा।
कोई तूफान उनको उठा ले अगर,
हर किसी का सवेरा निखर जायेगा।
हम वही सोचते जो सुहाना लगे।
हम हकीकत से अब तो बहुत दूर हैं।
आज जो भी हैं बैठे सिपाही बने,
बर्दियों में कसे काफी मजबूर हैं।
रंग बदला हुआ है सभी का यहाँ,
ढंग से कोई भी बात करता नहीं।
मुँह बँधे हैं सभी के बिना शौक के,
है हकीकत कोई भी सँवरता नहीं।
हम यही सोचते इनको देखा कहीं,
बन्द चेहरे में सूरत सयानी लगे।
कर दिया है भिखारी किसी ने मगर,
कोई राजा लगे कोई रानी लगे।
हम हवाओं की कितनी खुशामद करें,
उनको आना है आकर चली जायेंगी।
उनके पाले में अनजान कितने खड़े,
जिन्दगी तो बहुत हैं छलीं जायेंगी।
एक अहसास अब भी समाया हुआ,
देखते ठीक से, मौत आती नहीं।
क्यों कदरदान भी बे खबर सो गये,
क्या उन्हें जिन्दगी ये सताती नहीं।
हर जगह रंग में भंग फैला हुआ,
हर तरह से समय लगता लाचार है।
है शिकंजे में जकड़ा हुआ आदमी,
हर तरफ आदमी ही तो बीमार है।
जो समझते नहीं वे नहीं जानते,
रास्ते दूर जाने के किस अोर हैं।
लोग कुछ भी कहें पर हमें है पता,
इस फिजां में भरे चोर ही चोर हैं।
अटकलों का तो बाजार काफी गरम,
वे नहीं आयेंगे वे नहीं आयेंगे।
उनका जीना यहाँ उनका मरना यहाँ,
छोड़ श्मशान वे अब कहाँ जायेंगे।
मंजिलों का ठिकाना बहुत दूर है।
लोग जिन्नात उनको समझने लगे।
ऐसी बाजीगरी से किसे क्या मिला,
लोग शह मात उनको समझने लगे।
बादलों की भी गर्जन अनोखी लगे,
घाटियों में छिपा दर्द भी बोलता।
कारगिल से चला था मुसाफिर कोई,
पहुँचा गलवान वो डोलता डोलता।
न ही पत्ती रहीं न ही शाखें रहीं,
सारा ढाँचा यहाँ चरमराने लगा।
किस तरह से सँभालेंगे अहले वतन,
राजदां तो बहुत दूर जाने लगा।
हम कमाई का जरिया नहीं जानते,
हम लड़े हैं नहीं तीर तलवार से।
कुछ करेंगे मगर हम डरेंगे नहीं,
हम करेंगे खतम एक ही वार से।
हो गये खण्डहर जो पुराने भवन,
वे कभी फूलते अौर फलते रहे।
मरघटों से कोई आज डरता नहीं,
लौटने पर वहाँ दीप जलते रहे।
शाख से पत्तियाँ पूछने क्यों लगीं,
गुल खिलायें या यों ही मचलते रहें।
-मदन लाल अनंग,फर्रुखाबाद, उप्र, सम्पर्क- 9450155040
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र,सम्पर्क-9910629632




