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जगदेव बाबू के गांव में बिखर रहे जगदेव बाबू के सपने और संकल्प

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जगदेव प्रसाद जन्मशताब्दी वर्ष (2 फरवरी, 1922 – 5 सितंबर, 1974)

बिहार लेनिन जगदेव बाबू का गांव, वहां के लोग, उनके इर्द-गिर्द की दुनिया, वहां की माटी-पानी, उनके कुर्था विधान सभा क्षेत्र, जहां से उन्होंने ‘शोषित समाज दल’ की पूरी लड़ाई खड़ी की और जन संघर्ष को अंजाम दिया, वहीं सुनियोजित साजिश के तहत मारे गए– यही कुछ सवाल थे, जो कौतूहल पैदा करते थे। इन्हीं सवालों की तलाश में हम 30 अगस्त, 2021 की सुबह उनके गांव ‘कुरहारी’ के लिए रवाना हुए। राजनीतिक सामाजिक एक्टिविस्ट संतोष यादव भी हमारे साथ रहे। पटना से नौबतपुर नहर मार्ग से दुल्हिन बाजार, भरतपुरा, चंढोस, किंजर और कुर्था होते हुए 91 किलोमीटर की यह दूरी तय करते हमें ढाई घंटे लग गये। कुर्था से 11 किलोमीटर और वर्तमान रतनी-फरीदपुर प्रखंड से इस गांव की दूरी 4 किलोमीटर है।

कुर्था-जहानाबाद को जानेवाली मुख्य सड़क पर शकुराबाद घेजन मोड़ से पहले बाईं ओर जगदेव प्रसाद की एक आदमकद प्रतिमा लगी है। वहीं से एक पतली गली का मार्ग उत्तर की ओर अग्रसर होता है जो दो मोड़ की संकरी गलियों से गुजरने के बाद जगदेव बाबू के गांव में शामिल हो जाता है। मोड़ के आजू-बाजू फुटपाथी सब्जी, फल की दुकानें हैं, मिष्टान भंडार है और अंदर की ओर ब्यूटी पार्लर, आंटा-चक्की, फोटो स्टेट, मोबाइल और कुछ स्टेशनरी की दुकानें हैं। वहां दर्जनों मोटर साइकिल मुख्य मार्ग पर ही लगा दिये गए हैं। कोई चार पहिया वाहन अगर इस बीच आ गया तो समझिये डाइवर को शामत आ गई। अवैध अतिक्रमण और बगैर नक्शा पास किये मकानों-दुकानों के निर्माण के कारण यह स्थिति पैदा हुई है। जगह बल दीजिए तो बिहार के लगभग हर शहर, गांव और कस्बे के लोग इसी कशमकश से जूझने को अभिशप्त हैं।

जगदेव बाबू के गांव में अब भी मजदूरी की दर साल में आध मन

हजार-बारह सौ की आबादी वाले पिछड़े, अति पिछडे़, दलित और मुस्लिम जाति समुदाय के लोग यहां रहते हैं। दो तिहाई से ज्यादा आबादी कुशवाहा जातियों की है। हालांकि ये खुद को दांगी कहलाने में फख्र अनुभव करते हैं। भारत की वर्णवादी ब्राहणवादी व्यवस्था ने जातियों के अंदर जाति की जो श्रेणियां बनाई हैं, यह उसी परम्परा की विस्तारित बानगी है, जिससे यहां की कोई भी जाति मुक्त नहीं है। गांव में लगभग दो सौ यादव, डेढ सौ पासवान, पच्चास कहार, बीस पासी और इतनी ही संख्या नाई समाज के लोगों की है। लगभग दो घर पिछड़े मुसलमान भी हैं। दांगी, यादव को छोड़कर यहां की शेष जातियां लगभग भूमिहीन हैं। इनमें से कुछ पारंपरिक काम पीढ़ी दर पीढ़ी करने को मजबूर हैं। उनकी मजदूरी की दर आज भी साल में आध मन अनाज (20 किलोग्राम) तक सीमित है।

कुर्था प्रखंड परिसर में जगदेव प्रसाद और लक्ष्मण चौधरी की स्मृति में बनाया गया स्मारक

खेती किसानी की कठिन और जीतोड़ परिश्रम से यहां के नई पीढ़ी विमुख हुई है वह इससे बेहतर पंजाब और गुजरात में काम करना पसंद करती है। उसी से उनका परिवार चलता है। गांव में सबसे अधिक तरक्की पासवान समूह ने की है। यद्यपि उनका अधिसंख्य भूमिहीन है, लेकिन नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व अच्छा-खासा है। इस बिरादरी में तीन घर को छोड़कर सभी नौकरी में हैं। गांव में यादव और दांगी समूह की निर्भरता का आधार कृषि है। यहां ज्यादातर एक दो बीघा जोत वालेे किसान हैं। बहुत कम ऐसे हैं जिनके पास दस बीघे की जोत है। गांव में कृषि का हाल बुरा है। पिछले कई वर्षों से किसान हाड़तोड़ मिहनत करके धान रोपते हैं और गांव से सटे पश्चिम की बलदैया और पूरब में बहनेवाली मोरहर नदी की बाढ़ उनकी फसलों को गला देती है। ले देकर मसूर, चना, खेसारी, तीसी आदि दलहन, गेहूं और मटर की फसल हो पाती है। एक समय था जब गांव में सब्जी की खेती खूब होती थी, लेकिन हाल के वर्षों में नीलगायों के द्वारा बड़े पैमाने पर फसलों की बर्बादी के कारण लोगों ने सब्जी की खेती बंद कर दी है। पारंपरिक खेती की जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परम्परा चली आ रही है उससे अलग खेती करने का उनमें न साहस है न उत्साह। न सरकार द्वारा कोई वैसा कारगर हस्तक्षेप किया गया जिससे उनकी अपनी वर्तमान स्थिति बेहतर हो पाये।

पिछले पंद्रह वर्षों में बढ़ा है गांव से पलायन

कुरहारी में यद्यपि ग्रुप ‘ए’ की नौकरी में कोई नहीं है। लेकिन बीआईटी माइन्स, शिक्षक, नर्स, पोस्ट आफिस और रेलवे के ग्रुप डी में कई नौकरियां हैं। बीडीओ, डाॅक्टर, इंजीनियर और दारोगा की नौकरी में भी गांव के लोग हैं। 4 पीएचडी धारक भी हैं। दो स्विटजरलैंड और जर्मनी में कार्यरत हैं। इस प्रकार गांव के लगभग 25 लोग नौकरियों में हैं। इनमें 5-7 महिलाएं भी हैं। पिछले 15 सालों में गांव से लोगों का पलायन बढ़ा है। नौकरी और तकनीकी शिक्षा के लिए जितने लोग बाहर हैं, गांव की उससे चौगुनी आबादी का मजदूर के रूप में पलायन है। उनमें से ज्यादातर पंजाब, दिल्ली, गुजरात, दमन और रायपुर (छत्तीसगढ़) में मजदूरी करते हैं। पिछले 15 सालों में उनका पलायन और बढ़ा है। 

पहली मुलाकात अमरेंद्र कुमार वर्मा से होती है। वे हमें गांव के उत्तर की ओर ले चलते हैं। मुख्य सड़क की बाईं ओर एक मकान के पास रूक जाते हैं। वहां दर्जन भर लोग ताश खेलने में मशगूल हैं। अमरेंद्र कृशाम्बुज जी का नाम लेकर पुकारते हैं तो वे खट से बाहर आ जाते हैं। फिर वे ही हमें जगदेव बाबू की मकान के पास लाते हैं। जगदेव बाबू के घर का दरवाजा नीलेरंग से रंगा है। उनके घर के सामने की किवाड़ भी बंद है। गांव में पहली बार लोगों की उपस्थिति में दिन में किवाड़ बंद होना हमें विस्मय में डालता है। दरवाजा खटखटाते ही एक किशोर चाभी लिए प्रकट होता है और जगदेव बाबू के बंद पड़े घर का तोला खोलकर हमें अंदरखाने में दाखिल करवाता है। 

‘क्या यह अभी का बनाया गया घर है?’– पूछने पर वह बतलाते हैं –

‘कुछ हिस्सा जगदेव बाबू के समय ही बनाई गई थी। फिर उनकी पत्नी ने बनाया।’

यह पच्चीस वर्षीय युवक इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते हैं। लाॅकडाउन में पिछले दो वर्षों से गांव में ही हैं। उन्होंने जगदेव बाबू को नहीं देखा, लेकिन उनकी ख्याति और प्रभामंडल की मकबूलियत का अहसास उन्हें है। वर्तमान राजनीति के बारे में पूछता हूं तो गोलमटोल जवाब देते हैं। बहुत अस्पष्ट और अनिच्छुक अंदाज में।

जगदेव प्रसाद के पुश्तैनी मकान व उसका मुख्य दरवाजा

उपेक्षित दिखा जगदेव बाबू का पुश्तैनी घर

मकान में प्रवेश करते ही बीस फीट के गलियारे सेे अंदर की ओर बढ़ता हूं। सामने बाईं ओर सीढ़ी है। उस तरफ की दीवार प्लास्टर रहित है जो पड़ोसी ने उठा रखी है। सीढ़ी के ठीक नीचे एक कमरा है। वहींे बायीं ओर जगदेव बाबू की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित है। उसके बाजू में दाहिनी ओर एक और गलियारा है, जो 9 कमरों वाले घर की ओर जाती है। उसके चारों ओर बरामदा है। सभी पक्के हैं। दीवारें चुने से रंगे हैं और चुने का रंग भी उड़ गया है। लगता है कई वर्षों से उसकी रंगाई-पुताई नहीं की गई। उपर छत पर चढ़ता हूं तो वहां कोई कमरा नहीं बना है। बाईं ओर लगभग 10 फीट की दीवार खड़ी है। कुछ गिट्टी बालू पड़े हैं और पोई की लतरें उन दीवारों पर पसरी हुई हैं। घर को देखकर लगता है वहां कोई आता-जाता नहीं। हम जैसे आगंतुकों के लिए ही लिए ही शायद खुलती रही हों। हमें बताया जाता है कि जगदेव बाबू दो बीघा जोत के किसान थे। उनके पिता प्रयाग नारायण दो भाई थे। वे प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे लेकिन नौकरी अवधि में ही उनका निधन हो गया। फलस्वरूप परिवार की नैया उनके सगे रामकिशुन चाचा ने संभाली।

कुरहारी में एक प्राइमरी स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और सामुदायिक भवन भी है। ज्यादातर बच्चे जहानाबाद के पल्लवन, डीएवी और मानस स्कूल में जाते हैं। बाकी बचे छात्र ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल शकुराबाद में जाते हैं। गांव के स्कूल में वहां के भूमिहीन और अभिवंचित बच्चे ही पढ़ते हैं। शिक्षा व्यवस्था का यह हाल पंद्रह वर्षोे में और अधिक डंवाडोल हुआ है। रही-सही कसर दो सालों की कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। गांव के आंगनबाड़ी केंद्र की सेविका मंजु कुमारी हैं। इसमें 40 बच्चे हैं। बगल के शकुराबाद टाउन में गांव के लोगों की 15-20 दुकानें हैं। एक दौर में इस बाजार पर पिछड़े, मुसलमान और बनियों का वर्चस्व था, लेकिन बहुत तेजी से इसके एक बड़े हिस्से पर भूमिहार जाति का वर्चस्व बढ़ा है।

घटने लगा है अर्जक संघ का प्रभाव, बढ़ने लगा है ब्राह्मणवादी कर्मकांड

अर्जक संघ का एक जमाने में गांव में गहरा प्रभाव था। इसकी पहल जगदेव प्रसाद ने अपने घर से की थी। अपनी दादी के निधन में उन्होंने हर तरह के ब्रहाणवादी कर्मकांड का निषेध किया। उनके इस कदम ने लोगों को गहरे रूप में प्रभावित किया। गांव में अर्जक रीति से ही शादियां रचाईं जाने लगीं। उसका प्रभाव अब भी गांव में है, लेकिन शादी के मौके पर एकबार फिर से लोग ब्राह्मणवादी कर्मकांडों में फंसने लगे हैं, लेकिन मृत्यृभोज के आज भी वहां 90 प्रतिशत मामले कर्मकांड रहित हैं।

कुर्था प्रखंड परिसर में स्थापित जगदेव प्रसाद की आदमकद प्रतिमा

जगदेव बाबू का यह गांव पंचायत शेसम्बहा में है। जहां की मुखिया यास्मीन परवीन हैं। यह पंचायत अति पिछड़ी महिला के नाम आरक्षित है। पहले यह गांव शकुराबाद पंचायत के अंतर्गत कुर्था प्रखंड का हिस्सा था। बाद में रतनी-फरीदपुर प्रखंड की सीमा में आ गया। यहां के जिला पार्षद वैद्यनाथ यादव है। संप्रति यह गांव जहानाबाद विधानसभा के अंतर्गत है जिसके विधायक सुदय यादव और सांसद चंदेश्वर चंद्रवंशी हैं। सत्ता की प्राथमिक इकाई मुखिया से लेकर सर्वोच्च इकाई सांसद तक में अल्पसंख्यक महिलाएं, पिछड़े-अति पिछड़े हैं। अभिवंचित समाज की सत्ता में इसी तरह की हिस्सेदारी का सपना जगदेव बाबू ने देखा था।

गांव के लोगों में दिखा आक्रोश

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गांव से सटे शकुराबाद में स्थित है जो बमुश्किल आधा किलोमीटर से भी कम दूरी पर है। इसकी स्थापना 1987 में अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र के रूप में की गई थी। संप्रति यह रामाश्रय प्रसाद सिंह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में मौजूद है। गांव के ही शेखर बतलाते हैं कि ‘जिस लालू प्रसाद ने 90 के दौर में कुर्था, जहानाबाद और पटना तक में जगदेव प्रसाद की स्मृति में हाॅस्पिटल और उनकी मूर्तियां लगवाईं। नीतीश ठीक उसके उलट उनके ही पड़ोस में जगदेव प्रसाद के कथित हत्यारे रामाश्रय प्रसाद सिंह की मूर्तियां लगवा रहे हैं। हाॅस्पिटल का नामकरण उनके नाम कर रहे हैं। लालू प्रसाद ने वर्षों की अराजकता में डूबी जिस विरासत को आगे बढ़ाया था, नीतीश अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा में उसे ही नेस्तनाबूद करने पर आमादा हैं। बिहार के राजनीतिक इतिहास की यह वीभत्स कहानी है। आनेवाली पीढ़ियां शायद ही उन्हें माफ कर पाएं।’

जब जगदेव बाबू ने सहजानंद सरस्वती का किया था विरोध

चंद्रशेखर प्रसाद इसी गांव के निवासी हैं। जहानाबाद से दैनिक भास्कर के संवाददाता हैं। इनके पिता जगदेव प्रसाद के साथ जहानाबाद के भीटी स्कूल में साथ पढ़ते थे। उन दिनों उसी स्कूल कैम्पस में किसान नेता सहजानंद सरस्वती का प्रोग्राम था। अपने भाषण में उन्होंने 1942 आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि आंदोलन गलत समय पर किया गया है, इससे अंग्रेज रूष्ट हो जाएंगे और हमें आजादी भी नहीं मिलेगी। जगदेव बाबू इतना सुनते ही मंच पर चढ़ गया और माइक थामकर स्वामी सहजानंद का पुरजोर विरोध करने लगे। वहां उपस्थित स्वयंसेवकों ने जगदेव बाबू पर हमला कर दिया। इसके परिणामस्वरूप उनका सिर फुट गया, लेकिन वह कार्यक्रम बीच में ही स्थगित कर देना पड़ा। चंद्रशेखर कहते हैं उनको मारने के लिए पूरा सरकारी तंत्र लगा दिया गया। दो-दो बार बिहार में कांग्रेस सरकार गिराने के बाद सामंतों को अपना वर्चस्व समाप्त होते दिखा। फलतः जानबूझकर उनकी हत्या करवाई गई।’

गांव में ही हमारी मुलाकात महेंद्र प्रसाद जी से होती है। पूछने पर कहते हैं उन्हें 1952 में रामचरण बाबू ने राजनीति में लाये। पहले हैदराबाद में संपादक हुए। 1962 में लोहिया जी से जुड़े। सबसे मिलते-जुलते थे। कभी भी कोई गुरुर नहीं। शोषकों का पुरजोर विरोध करते थे लेकिन जब अवसर आता तो उंची जाति वालों का भी काम कर दिया करते थे। वे आडंबर के सख्त विरोधी थे। जब उनकी दादी मरीं तो कोई ब्राहणवादी कर्मकांड उन्होंने नहीं किया। वह कहा करते थे कि सवर्णों ने हमारे बाप दादा से हलवाही करवाई है। हम उनकी राजनीतिक हलवाही के लिए पैदा नहीं हुए हैं। पढ़ो, लिखो कुश्ती करो, अखाड़ा खोदो और राजनीति करो यह उनकी सोच थी।

गांव के बुजुर्ग ने सुनाई जगदेव बाबू की हत्या की आंखोंदेखी कहानी

गांव में हमारी आखिरी भेंट अमरेंद्र कुमार वर्मा के पिता गजानन प्रसाद वर्मा से होती है। जगदेव बाबू की हत्या के दिन वह कुर्था प्रखंड कार्यालय में उनके साथ थे। जगदेव बाबू को गोली लगने के बाद इन्हें गिरफ्तार कर जहानाबाद और बाद में गया जेल भेज दिया गया। संप्रति राज्य सरकार द्वारा दिया जानेवाला जेपी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन तंत्र की बेरुखी के कारण अभी तक उन्हें यह सुविधा नहीं मिल पाई है। उनकी पत्नी प्यारी देवी गांव के ही विद्यालय से सेवानिव‍ृत्त हैं। जगदेव बाबू को लेकर इनकी भी ढेर सारी स्मृतियां हैं। इन्होंने अपने परिवार में बेटे और बेटियों की शादी अर्जक पद्वति से ही की। वह बतलाती हैं ‘जिस दिन वह गांव से कुर्था में धरना पर जा रहे थे, लोगों को आशंका थी कि कुछ अनहोनी होनेवाली है। जब स्कूल गई तो वहां आम चर्चा हो रही थी कि आज शेरे-बिहार उठ जाएगा। हमने उनसे बहुत मनुहार की कि वहां मत जाइये हत्या हो जाएगी। लेकिन वे एक न माने। कहा कुछ नहीं होगा।’ गजानन प्रसाद वर्मा कहते हैं, ‘उस बलदइया नदी तक पैदल गए फिर जीप से कुर्था के लिए चल दिये। वहां प्रदर्शन चल रहा था। खास समुदाय के लोगों ने उनकी हत्या का कुचक्र रच रखा था। पहले उन्हें गोली मारी गई। फिर लाठी चार्ज कर भीड़ छिन्न-भिन्न किया गया। एक गोली बीडीओ के चैम्बर से चली, लेकिन उनको नहीं लगी। दूसरी गोली उनके गर्दन को छुती हुई निकल गई। भीड़ के कुछ लोग इलाज के लिए वहां से उन्हें ले जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस उन्हें घसीटते हुए थाने में ले गई और बूटों से कुचलकर उनकी हत्या कर दी गई। उन्होंने पुलिस वालों से पानी के लिए गुहार की लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई। उनकी लाश गायब करने की कोशिश की गई, लेकिन बीपी मंडल, कर्पूरी ठाकुर और रामलखन सिंह यादव के दवाब के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया। उनकी मृत्यु के बाद कुर्था में कर्फ्यू था। वातावरण में दशहत व्याप्त थी। इसमें उनके साथ छात्र लक्ष्मण चौधरी भी शहीद हुए थे।’

जगदेव प्रसाद की जहां हत्या की गई थी, वह कुर्था का प्रखंड कार्यालय और थाना का परिसर था। उस परिसर की दाहिनी ओर के हिस्से में उनकी स्मृति को जीवंत ढंग से संरक्षित किया गया है। उनकी मृत्यु के पांच साल बाद बिहार के मुख्यमंत्री रामसुंदर दास ने यह जमीन आवंटित करवाई थी। उन्होंने 5 सितम्बर, 1979 को शहीद जगदेव प्रसाद एवं छात्र लक्ष्मण चौधरी शहीद स्थल का शिलान्यास किया था। 1993 में बनकर यह समाधि स्थल तैयार हुआ, जिसका उद्घाटन 31 जनवरी, 1993 को शोषित समाज दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उतर प्रदेश के पूर्व वित मंत्री रामस्वरूप वर्मा ने किया। यह बहुत ही सलीके से गंभीरतापूर्वक तैयार की गई स्मृति है, जिसमें एक लंबी सूची दानदाताओं की है। साथ ही जगदेव प्रसाद की जीवनी, अर्जक संघ और शोषित समाज दल का इतिहास, झंडा गीत, पार्टी का झंडा उसकी दीवारों पर उकेरी गई हैं। स्मारक के मध्य में एक कब्र के आकार का ढांचा बना है और उसके चारों ओर जगदेव बाबू के विचारों की गवाही देती उक्तियां उद्धृत की गई हैं। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने 5 सितंबर, 1995 को उसी के पास जगदेव प्रसाद की एक आकर्षक मूर्ति का अनावरण किया।  

जयंती पर आयोजित होता है जगदेव मेला

जगदेव बाबू के जन्म दिन के मौके पर पिछले लगभग 40 वर्षों से अनवरत इसी परिसर में हर साल फरवरी महीने में जगदेव मेला का आयोजन अनवरत आयोजित होता रहा है। ग्रामीण परिवेश के मेले के स्वरूप में आयोजित इस कार्यक्रम में भाषण होते हैं, जाति विरोधी लोगों का जमावड़ा होता है, पाखंड विरोधी मूर्तियां लगती हैं। हालांकि कोरोना की मार से दो साल से यह सब नहीं हो पा रहा है। और रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। एक दिन शोषित समाज दल की मीटिंग और दो दिन सार्वजनिक सभा होती है। शोषित समाज दल और अर्जक संघ इस तरह के आयोजनों को निरंतरता में करवाती रही है। जब दल में जयराम प्रसाद सिंह और रघुनीराम शास्त्री जीवित रहे इसमें और धार रही। पता नहीं इन दोनों के निधन के बाद यह निरंतरता आगे भी बढ़ती है या यूं ही सब कुछ नष्ट हो जाएगा एक दिन। 

जन्मशताब्दी वर्ष को लेकर उदासीनता

हम जगदेव बाबू के गांव से लौट आये हैं। यात्रा पूर्व उनके बारे में जो कौतूहल और जिज्ञासाएं थीं उनमें से कुछ का आंशिक उत्तर तो मुझे मिल गया, लेकिन यह महसूस किया कि जिन मूल्यों के लिए जगदेव बाबू ने आजीवन संघर्ष किया, वह सवर्ण वर्चस्व, पुरोहितवाद वहां फिर से सर उठाने लगा है। खेती किसानी के लिए जगदेव बाबू ने नहर पईन के माध्यम से सिंचाई का जो सपना देखा था, वह आज भी अपने मूल रूप में कार्यान्वित नहीं हो पाया।

यह जगदेव बाबू की शहादत का 47वां साल है और उनके जन्म का सौवां साल। लेकिन उनकी जन्मशताब्दी को लेकर न कोई उत्साह है न कोई गहमागहमी। आश्चर्यजनक पहलू यह कि जिस शोषित समाज की हिस्सेदारी की गर्जना करते उनका पूरा जीवन गुजरा – वह जमात भी इन सब से पूरी तरह उदासीन है। अपने नायक की यह उपेक्षा बहुजन समाज के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है।

Ramswaroop Mantri

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