अग्नि आलोक
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भेड़िया

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भेड़िया आया, भेड़िया आया ‘
चरवाहा जब भी चिल्लाता था
भेड़िया सचमुच आता था
तुम जब पहुँचते चरवाहे के पास
भेड़िया किसी पेड़ या
झाड़ी की आड़़ में छुप जाता
तुम सोचते चरवाहे ने ठिठोली की है
तुममें से कइयों ने देखा था
सर झुका कर भक्ति में लीन लग रहे भेड़िये को
तुम्हें उस पर अनायास ही यूँ प्यार आया
जैसे कि वह भेड़िया नहीं, भेड़ ही हो
सच यह है कि भेड़िया तब मनुष्य से डरता था
शायद मनुष्यता का थोड़ा सम्मान भी करता था
समय बीतने के साथ भेड़िया
तुम्हारे भीतर के भय की थाह लेता रहा
और आख़िर वो जान गया
कि व्यर्थ है मनुष्य से उसका डर
डरता तो उससे मनुष्य है दरअसल
आज भी भेड़िया आया है
ठिठोली नहीं कर रहा है चरवाहा
तुम तक पहुँच रही हैं उसकी चीखें भी
तुम एक दूसरे को आश्वस्त करने में जुटे हो
कि है यह ठिठोली ही
बेशक़ पहले से ज़्यादा ख़तरनाक
तुम चीख़ें सुनते रहोगे और
चरवाहे को चबा जाएगा भेड़िया
और फिर…
जंगल से तुम्हारी बस्ती दूर ही कितनी है?

       साभार- हरभगवान चावला,सिरसा हरियाणा 

        संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, 

Ramswaroop Mantri

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