बादल सरोज जी की वाल से
2022-23 की रबी फसलों के लिए की गयी न्यूनतम समर्थन मूल्यों (एमएसपी) की घोषणा करते समय मोदी सरकार ने लागत के ड्यौढ़े दाम C2+50% के स्वामीनाथन फॉर्मूला तो दूर रहा इसने इस बीच लागत की बढ़ती कीमतों को भी हिसाब में नहीं लिया।
🔴 जिसे गोयबल्सी प्रचारतंत्र सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी बता रहा है वह असल में पिछली 12 वर्षों में सबसे कम बढ़ोत्तरी है। गैंहू की कीमतों को 1975 रूपये प्रति क्विण्टल से 2015 रु. करना मात्र 2.03 % प्रतिशत की वृध्दि है । बाकी फसलों की कीमतों में भी 2.14 से 8.60 प्रतिशत की वृध्दि की गयी है ;
🔴 असलियत में तो वास्तविक अर्थो में तो सभी उपजों के दाम घटे हैं और किसानो को भारी नुक्सान होने वाला है।
🔴 वर्ष 2021-22 के लिए एमएसपी की गणना यदि के फॉर्मूले से तय की जाती तो उसे ;
🔻 #गेंहू के लिए 2195.5 रूपये प्रति क्विण्टल होना चाहिए था। पूरी साल गुजर जाने और इस साल भर में खेती की लागत में भारी वृद्धि होने के बावजूद 2022-23 के लिए तय की गयी कीमतें भी उससे 180 रु. प्रति क्विण्टल कम हैं।
🔻 इसी तरह #जौ के लिए C2+50% के हिसाब से कीमते पिछली साल ही 2106 रु. प्रति क्विण्टल होनी चाहिए थी – जबकि इस वर्ष घोषित हुईं सिर्फ 1635 रु. प्रति क्विंटल ; यानी हर क्विंटल पर किसानो को 471 रुपये की हानि।
🔻 2022-23 के लिए #चने की एमएसपी 5230/रु. प्रति क्विंटल है जबकि C2+50% से पिछले वर्ष ही इसे 6018 रुपये होना था। मतलब एक क्विंटल पर 788 रूपये का घाटा
🔻 #मसूर के लिए 2022-23 के दाम 5,500 रूपये प्रति क्विंटल घोषित हुए जबकि C2+50% के हिसाब से 2021-22 में ही इन्हे 6306 प्रति क्विंटल होना था। यानि प्रति क्विंटल 806 रूपये कम।
🔻 #सरसों और #रेपसीड के लिए घोषित 5050 रु. की कीमत 2021-22 की 5205 रूपये से भी 155 रूपये कम है
🔻 #सूरजमुखी के लिए घोषित दरें 5441 रूपये हैं जबकि C2+50% के हिसाब से पिछली बार ही इसे 7362 क्विण्टल होना था। मतलब साल भर के बाद भी 1921 रूपये कम।
🔵 आज की कृषि लागत के हिसाब से किसानो का नुक्सान और भी ज्यादा है। केंद्र सरकार की CACP ने Price Policy Report for Rabi Marketing Season, वर्ष 2022-23 के रबी के मार्केटिंग के लिए मूल्य निर्धारण की नीति आज घोषणा के वक़्त तक भी अपनी वेब साइट पर लगाई है। यह झांसे की पर्दादारी की पूर्व तैयारी नहीं तो क्या है।
🔵 चूंकि एमएसपी पर खरीदी की कोई गारंटी ही नहीं है इसलिए किसानो का एक छोटा सा ही हिस्सा है जो अपनी फसल इस एमएसपी पर बेच पायेगा। पिछले साल की सरकारी रिपोर्ट बताती है कि 2020-21 में इस अलाभकारी एमएसपी का लाभ पाने वालों की इस संख्या में और ज्यादा कमी आयी है।
🔵 खासकर दाल और तिलहन वाले किसानो की हालत और बुरी रही है। खरीदी की व्यवस्था न होने से किसानो का घाटा अकल्पनीय है। ठीक यही वजह है कि किसान C2+50% के आधार पर एमएसपी तय करने और खरीदी का कानूनी प्रावधान करने की मांग कर रहे हैं।
#अखिलभारतीयकिसानसभा
🔴 माँग करती है कि सरकार इस घाटे वाली घोषणा को वापस ले, किसानो की मांग के हिसाब से C2+50% के फॉर्मूले के आधार पर नयी संशोधित दरों की घोषणा करे। किसान सभा की सभी इकाइयां अभियान चलाकर भाजपा सरकार की धोखाधड़ी को बेनकाब करें।





