बचपन में वे दोनों गहरे दोस्त थे और सभी धर्मों के उपासना-स्थलों में एक साथ अक्सर जाया करते थे। जवान होते ही एक दिन ‘अ ‘ ने धर्मरक्षक दल की सदस्यता ले ली और जल्दी ही पवित्र तथा कुशल धर्म रक्षक हत्यारे के रूप में उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। अब ‘ब ‘ से उसका मिलना संयोग से ही होता। जब कभी ऐसा संयोग बनता,अभिवादन के बाद संक्षिप्त सी औपचारिक बातचीत ही दोनों के बीच हो पाती।
एक दिन बस में सफ़र करते हुए उन दोनों का एक ही सीट पर बैठना हुआ। दोनों ने एक दूसरे का अभिवादन किया। ‘ब ‘ शीशे से बाहर झाँक रहा था कि ‘अ ‘ ने उसके कंधे पर हल्का सा धौल जमाते हुए पूछा, “कैसे हो दोस्त ?”
“अच्छा हूँ। “
“अब भी सब तरफ़ जाते हो,मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा वगैरह… या अपने धर्म की सर्वश्रेष्ठता को समझ गए हो ?”
“अब मैं कहीं नहीं जाता। “
“क्यों ?”
“क्योंकि मैंने सभी धर्मों में श्रेष्ठता का अहंकार और पाखण्ड देख लिया है। “
“वाह ! अपनी कायरता को छुपाने के लिए अच्छी शब्दावली गढ़ी है तुमने ! “
“कायरता ही सही, यह कायरता तुम्हारी बहादुरी से तो बेहतर है। “
‘अ ‘ इस तंज़ से तिलमिला गया, किंचित आवेश में बोला, “मुझे गर्व है कि मैं धर्म की रक्षा कर रहा हूँ। “
“हत्याओं से धर्म रक्षा ? किसी की हत्या करते हुए तुम्हारे हाथ नहीं काँपते ? “
“नहीं, बल्कि ख़ुशी होती है कि धर्म का एक दुश्मन तो कम हुआ। मुझे तो यह सोचकर अफ़सोस हो रहा है कि मेरा बचपन का दोस्त धर्म को खो चुका है। “
“और मुझे यह सोचकर अफ़सोस हो रहा है कि मेरा बचपन का दोस्त इन्सानियत को ही खो चुका है ! “
हरभगवान चावला,सिरसा, हरियाणा
संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, 



