शशिकांत गुप्ते
हमारे पूर्वजों ने विभिन्न प्रजातियों के पशुओं,पक्षियों,फलों,फूलों सब्जी और वनस्पति इत्यादि का प्रतीक के रूप में प्रयोग कर कहावतें बनाई है।
इनदिनों सियासी रजतपट पर जो दृश्य दिखाई दे रहें हैं,उसे देखकबर “बंदर बूढ़ा हो जाए तो भी गुलाटी खाना नहीं भूलता” इस कहावत का चरितार्थ करते हुए,अभिनय प्रत्यक्ष देखने को मिल रहा है।आश्चर्य तो इस बात का है कि उक्त कहावत को चरितार्थ करने के लिए बूढ़े बंदरो का अभिनय करने वाले अभिनेताओं की कोई कमी नहीं है।
बहुत से ऐसे भी हैं कि,जिनकों औकात से ज्यादा उपलब्धि मिल गई है,तो उनका हाजमा खराब हो जाता है।।ऐसे लोगों के लिए यह कहावत सटीक है,”कौवा चला हंस की चाल और अपनी चाल को भुला”
कौवे हमेशा झुंड में ही रहतें हैं।कौवों के झुंड में कौवों का कोई नेता नहीं होता है।कभी भी कौवे भिन्न भिन्न गुटों में विभाजित होते दिखाई नहीं दिएं हैं।
एक ओर कौवे को अपावन पक्षी कहा गया है।दूसरी ओर मरणोपरांत व्यक्ति के लिए मोक्ष दाता भी कौवे को ही कहा गया है।
कौवे को अपावन कहने का कारण,सम्भवतः यह हो सकता है कि, कौवा प्राणी के मृत शरीर का भक्षण करता है।
सियासत में भेड़िया चाल वाली कहावत भी चरितार्थ होते हुए दिखाई देती है।
भेड़चाल वाली कहावत पर व्यंग्य करते हुए एक शायर ने कहा है।
कुछ अलग करना है तो भीड़ से हट के चलिए
भीड़ साहस तो देती है मगर पहचान छीन लेती है
सियासत में इनदिनों पहचान का प्रतीक गले का दुपट्टा हो गया है।
सियासी प्रवक्ता तोता रटन्त वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।
तोते मानव की भाषा तो बोल लेतें हैं।पालतू तोते मानव द्वारा बोले गए शब्दों को दोहराते हैं।
मसलन मानव बोलता है, बोल मिठ्ठू गंगाराम, तो तोता भी यही दोहराता है,बोल मिठ्ठू …….।कारण तोता इतना नहीं समझता है कि, मिठ्ठू उसे संबोधित किया गया है।
इस तरह अनेक कहावतों पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है।
इनदिनों बहुत सोच समझकर कहन, बोलना और लिखना पड़ता है।
कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते
दुनिया की इनायत है कि, हम कुछ नहीं कहते
कुछ कहने पे तूफ़ान उठा लेती है दुनिया
अब इस पे क़यामत है कि, हम कुछ नहीं कहते
इन्ही भावों को प्रकट करतें हुए प्रसिद्ध शायर इक़बाल अशर का यह शेर प्रासंगिक है।
जो ख्वाब थे मेरे जेहन में न मैं कह सका न लिख सका
जो जुबां मिली तो कटी हुई जो कलम मिला तो बिका हुआ
शशिकांत गुप्ते इंदौर





