सुसंस्कृति परिहार
आज , सत्य को लकवा मार गया है
गले से ऊपरवाली मशीनरी पूरी तरह बेकार हो गई है
सोचना बंद
समझना बंद
याद करना बंद
याद रखना बंद
दिमाग की रगों में ज़रा भी हरकत नहीं होती
सत्य को लकवा मार गया ।
बाबा नागार्जुन की ये पंक्तियां हकीकत बन गई हैं
गांधीजी की 151वीं जयंती वर्ष में रह रहकर ये पंक्तियां ज़हन में घूमने लगती हैं । अफसोसनाक माहौल है । गांधी की प्रासंगिकता अब मज़ाक बनती जा रही है ।जबकि सत्याग्रही महात्मा गांधी दुनिया की बड़ी अवाम का एक चहेता नाम आज भी है ।जबकि हवा बदरंग है । झूूठ सरताज बना सत्ता पर हमारे देश में काबिज है ।घर का जोगी जोगना आंन गांव का सिद्ध है आज सत्य ।

एक सीधा सरल इंसान सत्य साधक बालक था मोहनदास। उसका बचपन आध्यात्मिक प्रणामी दादी के साथ गुजरा स्वाभाविक था वह इस रंग में रंग गया ।उसकी ख़ासियत यह रही कि बड़े होकर भी उसने इन संस्कारों से मुंह नहीं मोड़ा ।इसकी दो वजहें रहीं वे धर्म के अधिकारी स्वरूप से डरते रहे ।सोचते रहे गलत किया और पाप लगा ।वे साधारण इंसान थे इसलिए सब कुछ सहज स्वीकार कर लिया और इसके विरोध में कभी आवाज नहीं निकाली ।डर कहें या धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा ।ये उनके जीवन राग में शामिल हों गया ।
एक घटना हम सब भली-भांति जानते हैं कि मोहनदास जब पोरबंदर से राजकोट पिता करमचंद जी के दीवान बनने पर आए तो यही पढ़ने लगे पढ़ाई में कमज़ोर थे ही ।परीक्षा के दौरान अंग्रेज अधिकारी निरीक्षण पर आए तो शिक्षक द्वारा कैटिल की स्पेलिंग सुधारने कहा गया ताकि निरीक्षक पर अच्छा प्रभाव पड़ सके । लेकिन मोहनदास के अंदर ईश्वर के अज्ञात भय ने उन्हें रोक दिया ।एक तरफ गुरू का आदेश और दूसरी तरफ ईश्वर । उन्होंने आध्यात्मिक आस्था का मार्ग चुना ।तब मोहनदास की क्या स्थिति रही होगी ?हम समझ सकते हैं ।वे डिगे नहीं , निर्भीकता से सत्य का दामन थामे रहे । इसी ज़िद और गुस्से के प्रतिफलन ने उन्हें सत्याग्रह और अहिंसा जैसे दो बड़े हथियार दिए । जो बिना अस्त्र और शस्त्र के एक ताकत बने ।
उनके सत्याग्रह हथियार की कोई काट आज तक मौजूद नहीं है ।इस हथियार का वार करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति, पूरा भरोसा होना चाहिए । कामयाबी देर से सही पर मिलेगी अवश्य । ये राह आसान नहीं पर हिंसा के विरुद्ध खड़ा एक मजबूत एक ऐसा हथियार है जिसको परास्त करना अंग्रेजों के लिए एक चुनौती बना ।ये सच है कि इंसान के अंदर सिर्फ और सिर्फ सच ही सहजता से रह सकता झूठ लोगों को असहज बनाता है । गांधी ने इसी का आसरा लिया ।इसे डटकर पकड़े रहे ।आम इंसान की इस प्रवृत्ति को गांधी ने एक नया पथ दिखाया । उनके तमाम आंदोलनों में सत्य का यह आग्रह सफल भी रहा । आज़ादी के लक्ष्य को हासिल करने में सत्याग्रह की बड़ी भूमिका रही ।यह बात पूरी दुनिया जानती और स्वीकारती है ।
लेकिन आजादी के बाद भारत-पाक विभाजन के वक्त जब दुखी बापू नोआखोली में अनशन करते हैं और सार्थक परिणाम नहीं आते तो वे एक साधारण इंसान की तरह टूट जाते हैं और मुझे लगता है उनका सत्य यहीं से पराभव की ओर अग्रसर होने लगता है । गांधी के जीते जी यह हथियार अपनी धार खोने लगता है । हालांकि आज़ादी के बाद तत्कालीन सरकार ने विभिन्न आंदोलनों को नज़र अंदाज़ नहीं किया । आंदोलनों में सत्याग्रह ,अनशन,धरना , प्रदर्शन बराबर स्थान बनाते रहे ।इस स्वस्थ्य परम्परा ने जनता को कई अधिकार दिए । टेड यूनियनों के कारण लोकतंत्र मजबूत हुआ । जिससे देश ने दुनिया में भारत का माथा गर्व से ऊंचा किया ।
अफसोसनाक यह कि मंद गति से हमारे देश ने गांधी को बिसराना शुरू कर दिया ।वे जयंती और पुण्यतिथि पर याद किए जिनमें लगे । उनके राष्ट्र पिता पर सवाल उठने लगे इतना ही नहीं मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी हो गये । इक्कीसवीं शताब्दी के बाद गांधी के इन हथियारों का इस्तेमाल देश में कम और विदेशों में पूरी ताकत से किया जाने लगा । सत्याग्रही मणिपुर की चानू शर्मिला का विशेष सुरक्षा बल के खिलाफ चला दो दशकों का सत्याग्रह भी दम तोड़ गया ।दस माह से शांति पूर्वक चलाए जा रहे आंदोलन की कमोवेश वहीं स्थिति बनाई जा रही है। ये स्थिति गांधी के अपने देश में है ।जो दुनिया में हमारा सर शर्म से झुकाने मजबूर करती है ।
गांधी की सत्य के प्रति निष्ठा के विपरीत आज असत्य का साम्राज्य दुनिया में पैर फैला है ।सारे मानदंड तिरोहित होने को है ।भारत की हालत तो बदतर है । गांधी ने जिसे धर्म भीरुता के साथ स्वीकार किया उसी देश में धर्म के साये में झूठ जिस तरह पनपा है यह इस बात की ताकीद करता है कि धर्म अब धारण करने की नहीं बल्कि समयानुकूल बदल बदल कर ओढ़ने की जरूरत में शामिल हैं । हकीकत यह है धर्म ने विस्तार किया है अपने अपने स्वार्थों के लिए । वह अलग-अलग अपनी पहचान बनाने में ताकत लगा रहा है ।जो इंसानियत के खिलाफ है ।
गांधी के देश में जो सत्य के विरुद्ध झूठ को स्थापित किया जा रहा है यह चिंताजनक है । अहिंसा के विरुद्ध हिंसा पर ज़ोर है ।ईमान के खिलाफ बेईमान बुलंद हैं ।बुरा मत बोल ,बुरा मत सुन और बुरा मत देख का माहौल है । बताईए हम जब इस हद की ज़िद में पूरी तरह आ जायेंगे ।तो इन बुराईयों से निजात कैसे पायेंगे ? दहशतज़दा हालात जो बन रहे हैं उसमें गांधी जन्म की151वीं वर्षगांठ ऊपरी तौर पर आग को कम करती नज़र आती हो पर ऐसा बिल्कुल नहीं है ।यह तो छल की चादर है इसे समझना होगा ।झांसे में ना आएं ।
गांधी के गुम होते हथियारों को सामने लाकर एक बार देश दुनिया को दिखाने की ज़रूरत है कि झूठी सरकार की उम्र लंबी नहीं होती ।सत्य कभी परास्त नहीं होता ।परेशान हो सकता है ।जिस सत्य के दामन ने गांधी को आज तक जीवंत रखा है वह ख़त्म नहीं होगा और ना ही ख़त्म होंगे गांधी के अनुयायीयों ।ज़रूरत है सत्य के निष्ठा और एकजुटता की ।आज हमें अपने ही देश में झूठ से लड़ना है । गांधी की सीख पर यकीन रखें ।एक साधारण इंसान की आवाज हमारी आवाज़ बन सकती है । गांधी की सादगी ,सरलता , सहजता और आंतरिक ज़िद के साथ हमें बढ़ना होगा ।तब झूठ पर फ़तह आसान होगी ।





