बिहार की कहानी पंजाब में दोहराएँ जहां केवल एक मुख्यमंत्री अपना पांच साल का term पूरा कर सका था, क्योंकि वहां पार्टी में हमेशा अंदरूनी कलह रहती थी कि “मैं मुख्यमंत्री बनूंगा” और उसके बाद यानी 1990 के बाद कांग्रेस बिहार में कभी भी सत्ता मे नहीं आई।
अगर कांग्रेस की भीतरी लड़ाई ऐसी ही रही तो पंजाब में भी हाल यही होगा। यूपी में भी 1990 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई। यानी सिद्धू को बीजेपी की तरफ से जो काम सौंपा गया है वह अभूतपूर्व है। प्रश्न है कि क्या काँग्रेस उसी दिशा में जा रही है तो मेरा उत्तर है हां।
सुरेन्द कुमाऱ
क्या सिद्धू जी को BJP ने इसलिए plant किया है कि मुख्यमंत्री के पद के लालच में बिहार की कहानी पंजाब में दोहराएँ जहां केवल एक मुख्यमंत्री अपना पांच साल का term पूरा कर सका था, क्योंकि वहां पार्टी में हमेशा अंदरूनी कलह रहती थी कि “मैं मुख्यमंत्री बनूंगा” और उसके बाद यानी 1990 के बाद कांग्रेस बिहार में कभी भी सत्ता मे नहीं आई।
अगर कांग्रेस की भीतरी लड़ाई ऐसी ही रही तो पंजाब में भी हाल यही होगा। यूपी में भी 1990 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई। यानी सिद्धू को बीजेपी की तरफ से जो काम सौंपा गया है वह अभूतपूर्व है। प्रश्न है कि क्या काँग्रेस उसी दिशा में जा रही है तो मेरा उत्तर है हां।
सिद्धू ने अपना परम् कर्तव्य बड़ी श्रद्धा के साथ पूरा किया है यानी कांग्रेस की खीर में नमक डाल दिया है। अब यह हाईकमान को ही सोचना और करना है कि अगर सिद्धू जी वाकई कांग्रेस की विचारधारा में यकीन करते हैं तो उन्हें चुनाव के नज़दीक यह नाटक करने की ज़रूरत ही क्या थी। बिहार की कहानी पंजाब में दोहराएँ जहां केवल एक मुख्यमंत्री अपना पांच साल का term पूरा कर सका था, क्योंकि वहां पार्टी में हमेशा अंदरूनी कलह रहती थी कि “मैं मुख्यमंत्री बनूंगा” और उसके बाद यानी 1990 के बाद कांग्रेस बिहार में कभी भी सत्ता मे नहीं आई।
अगर कांग्रेस की भीतरी लड़ाई ऐसी ही रही तो पंजाब में भी हाल यही होगा। यूपी में भी 1990 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई। यानी सिद्धू को बीजेपी की तरफ से जो काम सौंपा गया है वह अभूतपूर्व है। प्रश्न है कि क्या काँग्रेस उसी दिशा में जा रही है तो मेरा उत्तर है हां।
सिद्धू को कप्तान अमरिन्दर जैसे दृढ़ व्यक्तित्व और कर्मठ व्यक्ति को एन चुनाव के समय सत्ता से हटाने में सफल हो जाने देना हाईकमान की अदूरदर्शिता को दर्शाता है। राहुल गांधी को अब भी सोच लेना चाहिए कि जिस व्यक्ति में “मै और सिर्फ मैं हूँ” यानी जिसकी A to Z व्यक्तिवादी सोच है उसे एक जनआधृत संस्था का मुखिया नहीं बनाना चाहिए था। और उसे इतनी छूट भी नहीं देंनी थी।
जब पंजाब में कांग्रेस दीन हीन दशा में थी तब कप्तान कांग्रेस को जिता कर लाए थे और स्थायित्व दिया था। लगातार एक दशक तक कांग्रेस को सत्ता में रखा। सिद्धू किसी भी हाल में कभी भी कप्तान अमरिन्दर सिंह का पासंग भी नहीं हो सकते।
कांग्रेस को जवान करने के लिए अपने सभ्य, कर्मठ और योग्य मुख्यमंत्री से त्याग पत्र लेना भयानक भूल थी। जो व्यक्ति पिछले पांच दशक तक कांग्रेस की सेवा करता रहा उसको कल के आए ज़िद्दी और व्यक्तिवादी सोच के नेता के लिए किनारे कर देना ठीक नहीं था। इस समय का झगड़ा चुनाव में हरवा भी सकता है।
सिद्धू जी के और चन्नी जी के बीच कल जो दो घण्टे से ऊपर बात हुई है उसका भी मुझे नकारात्मक परिणाम ही दिखाई दे रहा है। सिद्धू पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहेंगे। इसका अर्थ निकलता है कि वे पहली लड़ाई में तो कप्तान साहब को रास्ते से हटाने में सफल हुए और चन्नी का अभी कद इतना नहीं हुआ है कि वे सिद्धू को CM की रेस में पछाड़ सकेंगे। क्योकिं कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष होने के नाते सिद्धू अपने मन और विश्वास के प्रत्याशी खड़े करेंगे। जो भविश्य में उनकी बात मानेंगे।
सिद्धू ने तो 14 विधायको के साथ ही कप्तान के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिया था अब तो ये मनमानी करेंगे। और चन्नी को मुख्यमंत्री भी नहीं बनने देंगे। इससे दलित जातियों के बीच कांग्रेस की बिश्वस्नीयता को पलीता लग जाएगा। चन्नी के व्यक्त्वि को आघात लगेगा। कांग्रेस की अखिल भारतीय स्तर पर विश्वसनीयता घटेगी। पूरे देश मे दलित वोट नहीं मिलेगा।
अब सिद्धू चन्नी पर अपने मनपसन्द प्प्रत्याशियों के लिए दबाव डालेंगे। वैसे भी चन्नी उनके प्रभाव के नीचे दबे रहेंगे। क्योंकि कप्तान को हटा सकने वाले से पंगा कौन ले। इसलिए चुनाव के बाद चन्नी को हटा कर खुद मुख्य मंत्री बनना चाहेंगे।
मानलो चुनाव में कांग्रेस जीत भी जाती है और चन्नी मुख्यमंत्री भी बन जाते हैं तो भी प्रशासन में सिद्धू का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। जो चन्नी जी के रास्ते एक बड़ा रोड़ा होगा। यह प्रशासन के लिए ठीक नहीं होगा। किसी भी सूरत में अगर चुनाव के बाद चन्नी को मुख्य मंत्री पद से हटाया जाता है तो फिर कांग्रेस को दलितों के वोट का कभी सपना भी नहीं देखना चाहिए।
अगर सिद्धू को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो सम्भावित परिणाम कांग्रेस में अंतरकलह अस्थिरता, बंटवारा और जगहंसाई फिर राष्ट्रपति शासन भी हो सकता है। इसका सीधा मतलब शासन बीजेपी के हाथ और सिद्धू का हाथ बीजेपी के साथ। और सिद्धू जी का जोर का ठहाका ” ओए छा गए गुरु” असी ते फेर चल्लेआँ कपिल शर्मा दे शो विच हा हा हा”





