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गांधी जीने से समझ आते हैं

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मंजुल भारद्वाज

गांधी जीने से समझ आते हैं. गांधी आत्म बोध से समझ आते हैं. गांधी सत्य के स्वयं पर किए प्रयोग से समझ आते हैं. गांधी सतत स्वयं को राजनैतिक चिंतन में तपा देने वाले को समझ आते हैं. गांधी पढ़े लिखे लोगों को कितना समझ आते हैं यह विकट सवाल है. जब गांधी ने भारत की सोई हुई राजनैतिक चेतना को जगाया तब कितने पढ़े लिखे थे भारतीय? निरक्षर देश वासियों को गांधी ने राजनीति सिखाई, उन्हें देश का हिस्सेदार बनाया और अंतत देश का मालिक! We the People ! 
जैसे जैसे देश साक्षर हुआ निजी स्वार्थ हावी हुआ और गांधी गायब …अंतत सत्ता ने गांधी को मुद्रा और कार्यक्रमों तक समेट दिया. दरअसल दुनिया के सभी विचारकों के साथ पढ़े लिखे अनपढ़ों का षड्यंत्र है चाहे वो कार्ल मार्क्स हो, अम्बेडकर हो ,भगत सिंह हो या गाँधी ..पढ़ी लिखी कौम ने उसे जीने में उतारने की बजाए बहस तक समेट दिया! उसी का संकट है भूमंडलीकरण. जिसने विचार करने की प्रक्रिया को पेटेंट कर लिया है.बीज से उपजी फ़सल में बीज पैदा करने की ताक़त भूमंडलीकरण ने खत्म कर दी है। 
भोग चरम पर है. जरूरत की बजाय लालच पूरी करने पर ज़ोर है. यह लालच मनुष्य के साथ साथ पृथ्वी को भी लील रहा है. विचार करने की प्रक्रिया को कुंद कर भीड़ को पैदा किया है भूमंडलीकरण ने. 
भीड़ हमेशा भक्ति और भोग के आसपास मंडराती है जबकि विचार और विवेक आत्म खोज और साधना की प्रक्रिया है. गांधी हमेशा अकेले रहे..क्योंकि विवेक एकाकी होता है पर उनकी चिंतन दृष्टि समग्र थी. समग्र दृष्टि और विवेक का आत्म प्रयोग ही गांधी है. 
आज सिर्फ़ प्रचार,प्रवचन और पाखंड का दौर है जनता से सत्ताधीश तक. गांधी सरल थे? ये आपकी सरल होने की समझ पर निर्भर है गांधी इतने सरल थे की सूट बूट,भोग और निजी स्वार्थों के महामना उनको माल्यार्पण करते हैं? 
गाँधी सरल थे तो आप गांधी की जीवन शैली क्यों नहीं अपनाते? इसलिए गांधी जीवन जीने वालों को समझ आता है जीवन भोगने वालों को नहीं. गाँधी को पता था सत्ता के शिखर और सत्ता के भोगियों के लिए मेरा होना मायने नहीं रखता इसलिए उन्होंने कहा हाशिये के अंतिम व्यक्ति को देखो. क्योकि वो प्रताड़ित है, शोषित है इसलिए गांधी शोषितों पीड़ितों की आवाज़ है.
गांधी ने हमेशा समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की दृष्टि से सत्ता को देखा और स्वयं अंतिम छोर के व्यक्ति का जीवन जीया! यह कार्य सरल है? राजनैतिक प्रक्रिया सरल है? विविधता को स्वीकारना सरल है? अगर विविधता को स्वीकारना सरल है तो बहुमत का सताधीश एक ..एक की तोता रट क्यों लगा रहा है?
 दरअसल गांधी राजनीति और विविधता को स्वीकारने की जटिल प्रक्रिया को जीवन भर साधते रहे पर राजनैतिक चेतना जगाने के बावजूद सत्ता के बटवारे को नहीं रोक पाए. देश का विभाजन सत्ता का विभाजन था जो आज भी युद्ध के रूप में मौजूद है. गांधी जीवित रहते तो सत्ता विभाजन के दंश से भारत को मुक्ति दिलाते पर विकारी संघ ने उनकी हत्या कर दी और आज सत्ता में बैठकर फिर से देश को सत्ता विभाजन के कगार पर पहुंचा दिया है. क्या गांधी सबकी सुनते थे?  गांधी ने कभी किसी की नहीं सुनी गांधी ने हमेशा अपने राजनैतिक विवेक की सुनी. 
किसी भी तरह के भीड़ समर्थन को उन्होंने हमेशा नकारा. अपार समर्थन मिलने पर भी आन्दोलन वापस ले लिए, कांग्रेस के अंदर उनके मन के विरुद्ध जब चर्चा होती वो बकरी को घास चराने चले जाते… दरअसल गांधी हमेशा विवेक सम्मत जन समूह के समर्थक रहे. गांधी जानते थे की सिर्फ़ संख्या बल कभी लोकतांत्रिक नहीं होता. विवेक से संचालित संख्या ही लोकतांत्रिक शक्ति होती है. इसलिए सत्ताधीशों ने पार्टी व्हिप के हथियार से संसद में विवेक का गला घोटकर सांसदों को संख्या तक सीमित कर दिया. इसलिए आज संसद में सिर्फ़ संख्या बल है. विवेक और लोकतंत्र संसद के बाहर!

Ramswaroop Mantri

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