न तो अचानक से प्रकृति में कोयला इतना कम हो गया है, न कोई खान अचानक बंद हुई, न हाल फिलहाल कोई प्राकृतिक आपदा आई। न कोयला निकालने वाले मजदूर कम पड गये हैं, न उन्होंने कोई हडताल ही की है। न कोयला लाने ले जाने वाले जहाज-रेल ही नष्ट हो गए हैं, न ही उन्हें चलाने वाले श्रमिकों ने मजदूरी के लिए काम बंद किया है। फिर अचानक ये ‘सप्लाई चेन डिसरप्शन’ क्यों? वो भी कहीं एक दो जगह नहीं, पूरी दुनिया में।
कोई तार्किक, समझ में आ सकने वाली वजह
? पूंजीवाद-साम्राज्यवाद के आपसी टकराव और मुनाफे की लडाई के अलावा क्या हो सकता है? इजारेदार पूंजीपति पूरी दुनिया को ब्लैकमेल कर कीमतों को आसमान पर पहुंचा रहे हैं, सुपर मुनाफा लूट रहे हैं, और क्या? या फिर उत्पादक शक्तियों और तकनीक विकसित हो जहां पहुंच गई है उसे चलाने में दिवालिया पूंजीवादी उत्पादन संबंध सक्षम नहीं। पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की अराजकता विकसित उत्पादक शक्तियों को संचालित नहीं कर सकती, उसके लिए सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नियोजित उत्पादन व्यवस्था अर्थात समाजवादी व्यवस्था चाहिए।एक ओर पूंजीवाद पूरी दुनिया को हर तरह के विनाश के मुहाने पर ला खडा कर रहा है तो यहां बहुत से लाल बुझक्कड़ वही तोतारटंत बोलते जा रहे हैं कि मजदूर काम नहीं करते इसलिए समस्या है, निजी क्षेत्र में दे दो, सब सही हो जायेगा। शासक वर्ग के ‘विद्वान’ तो बता रहे हैं कि पूरी कृषि इजारेदार पूंजीपतियों को सौंप दो मानवता का कल्याण ही हो जायेगा, खाद्य पदार्थ सस्ते हो जायेंगे।अरे, ये अंतरराष्ट्रीय कोयला खनन, व्यापार और ढुलाई तो सारा निजी क्षेत्र में ही है न?





