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*कश्मीर में 370 हटाने के निहितार्थ

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जनीश भारती

(यह लेख अगस्त 2019 का है परन्तु आज बदली हुई परिस्थिति में जब काश्मीर में फिर हिंदु कश्मीरियों का मुद्दा गरमाया जा रहा है। और अमेरिकी इशारे पर लद्दाख में मध्यम दूरी की मिसाइलें स्थापित करने और कोरोना काल से लेकर गलवान घाटी तक वैश्विक पैमाने पर चीन की घेरेबंदी समेत कई अन्य घटनायें घटी हैं और शासक वर्ग जिस तरह जनता से सफेद झूठ बोलता रहा है उससे जनता में जो भ्रम की स्थिति बनी हुई है, उसे समझने के लिए यह लेख आज भी प्रासंगिक है।)

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हमारे देश की मौजूदा सरकार ने कश्मीर से अनु. 370 एवं 35(ए) हटाकर अब तक के विश्व इतिहास का सबसे बड़ा देशभक्त होने का दावा ठोक दिया है। जिस अनु. 370 के तहत स्वायत्तता देकर कश्मीर की जनता को जोड़ा गया था उसी 370 को खत्म करके तथाकथित देश भक्त लोग कह रहे हैं कि ‘‘अब कश्मीर हमारा हो गया।’’ तथाकथित देश भक्त लोग यह भी दावा कर रहे हैं कि ‘‘अब आतंकवाद वंशवाद, भाई भतीजावाद का कश्मीर से खात्मा हो जायेगा।’’ और यह भी दावा है कि ‘‘अब वहाँ कारखाने लगेंगे, लोगों को रोजगार मिलेंगे, गरीबी खत्म होगी।’’
इन तथाकथित देशभक्तों से पूछिये कि क्या जिन राज्यों में 370 नहीं है उन राज्यों में तुमने बेरोजगारी दूर कर दिया है, वहाँ आतंकवाद, वंशवाद भाई भतीजावाद नहीं है, क्या वहाँ गरीबी खत्म हो गयी है?’’ अगर किसी राज्य की जनता से स्वायत्तता छीन लेने से सारी समस्यायें खत्म हो जाती हैं तो जून 2019 में नागालैण्ड को अलग झण्डा, अलग पासपोर्ट जारी करने की स्वायत्तता तुमने क्यों दिया?’’ आसाम, मिजोरम, अरुणाचल, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम आदि प्रदेशों में अनु. 370 जैसे कानून (अनु. 371) आज तक क्यों बने हुए हैं? क्या इन राज्यों में 370 जैसे कानूनों के रहते एक झण्डा एक संविधान का तुम्हारा नारा चरितार्थ हो पायेगा?’’
इन तथाकथित देशभक्तों के कुतर्कों के जवाब में कुछ तर्क रख देने मात्र से सच सामने आना बाकी ही रह गया। अतः कुछ और तथ्यों पर ध्यान देना होगा।
370 पर उनके तर्क कुछ भी हों सच्चाई तो कुछ और ही है:-
सच्चाई यह है कि विश्व पूँजीवाद भयानक महामंदी में फँसा हुआ है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था भी तबाही के दौर से गुजर रही है। बढ़ती बेरोजगारी के कारण लोगों के पास पैसे नहीं है कि अपनी जरूरतों के सामान खरीद सकें। तब कर्ज, अनुदान, वजीफा, बेरोजगारी भत्ता आदि देकर इन्हें पूँजीपतियों का माल खरीदने के लिये प्रेरित किया गया मगर कर्ज, अनुदान, भत्ता, पेंशन, वजीफा आदि देने की क्षमता भी अब खत्म होती जा रही है। कर्ज की रकम वापस न आने के कारण बैंक डूबने लगे हैं। इस मंदी से उबरने के लिये भारत सरकार ने मुख्य रूप से निम्नलिखित कदम उठाये- कर्जमाफी, वेलआउट पैकेज, विनिवेशीकरण (सरकारी संस्थानों को निजी हाथों में बेचना), किसानों-मजदूरों-गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती, परीक्षा फीस के नाम पर बेरोजगारों का शोषण, मिनिमम गवर्नमेन्ट मैक्सिमम गवर्नेंस की नीति के तहत सरकारी खर्च में कटौती, स्टार्टअप योजना के नाम पर पूंजीपतियों को भारी कर्ज और अनुदान, एफ.डी.आई., पेट्रोलियम की महँगाई, इलाज या पेंशन के नाम पर जीवन बीमा, जनधन योजना, नोटबंदी, जी.एस.टी., विदेशी कर्ज।
उपरोक्त सारे टोने टोटके इस भयानक पूँजीवादी मंदी के आगे फेल होते गये। 1991 से अब तक हमारे देश के साढे़ 6लाख कारखाने बन्द हो चुके हैं। लाखों कारखाने बन्द होने के कगार पर हैं। पिछले तीन महीने में 3 लाख से ज्यादा नौकरियां खत्म हो गयी हैं। सरकार की स्थिति यह है कि उसे रिजर्व बैंक से या कहीं से 3 लाख करोड़ रूपये तत्काल नहीं मिले तो कर्मचारियों अधिकारियों को तनख्वाह देना मुश्किल हो जायेगा। इन्हीं परिस्थितियों में मोदी सरकार को कर्ज के लिये अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे नाक रगड़ना पड़ रहा है। अब अगर भारत को 5 ट्रिलियन की अर्थ व्यवस्था का लक्ष्य पाना है तो उसे कम से कम 20 करोड़ रोजगार देने होंगे। परन्तु पूँजीवादी अर्थव्यवस्था विकास की उस मंजिल पर पहुँच चुकी है जहाँ रोजगार देेने की उसकी क्षमता खत्म हो चुकी है। विदेशी कर्ज के अलावा सरकार के पास कोई विकल्प नहीं।
जाहिर है अमेरिका भारत को बिना शर्त कर्ज नहीं दे सकता। इन परिस्थितियों में वह लेमोआ और कामकासा समझौते के आधार पर भारत में अमेरिकी मिसाइलें तैनात कराने की शर्त पर ही कर्ज देगा ताकि वह अपने मुख्य प्रतिद्वण्द्वी चीन की घेराबन्दी कर सके साथ ही साथ अफगानिस्तान में फँसी अमेरिकी सेना को सुरक्षित रास्तों से बाहर निकाल सके। यह भी जाहिर है कि अफगानिस्तान में फँसी अमेरिकी सेना को ईरान अपनी जमीन पर आसमान से होकर नहीं जाने देगा। पाकिस्तान भी नहीं जाने देगा चीन तो किसी भी कीमत पर अमेरिकी सेना को अपनी जमीन पर कदम नहीं रखने देगा। सिर्फ भारत ही अमेरिका का मददगार हो सकता है। इस काम के लिये अमेरिका ने बहुत पहले ही भारत के साथ निम्न चार असमान समझौते किया है-
A.) लेमोआ समझौता-2016:- इसके तहत भारत की जमीन आसमान सैनिक साजो सामान का इस्तेमाल अमेरिका कर सकेगा।
B.) बेका समझौता (बेसिक इक्सचेंज कोआपरेशन एग्रीमेन्ट):-इसके तहत अमेरिका भारत से भू-स्थानिक जानकारी प्राप्त कर सकेगा।
C.) कामकासा समझौता 2018-इस संधि के तहत भारत को अपनी सारी खूफिया सूचनायें अमेरिका तक पहुँचाना होगा।
D.) सिस्मोआ समझौता-यह भी सुरक्षा से सम्बन्धित सूचना अमेरिका को देने के लिये किया गया है।
अब आप पिछले जून महीने तक के अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें और तेजी से बदलते ताजे घटना क्रमों पर एक नजर दौड़ायें और उपरोक्त तथ्यों से इन घटना क्रमों को जोड़ कर देखें तो सच्चाई साफ दिखने लगेगी। ये घटनाक्रम निम्न प्रकार है-

  1. जून 2019 से पहले जो डोनाल्ड ट्रंप अफगानिस्तान में और अधिक सेना भेजने की बात कर रहे थे, जून के बाद अचानक अफगानिस्तान से सेना हटाने के लिये तालिबानियों से बातचीत की पेशकश करने लगे।
  2. जुलाई 2019 में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन ने कहा कि ‘‘एशिया प्रशान्त क्षेत्र में चीन का दबदबा कम करने के लिये अमेरिका को मिसाइलों की तैनाती के लिये भारत से अच्छी कोई दूसरी भौगोलिक स्थिति नहीं हो सकती।
  3. 15 जुलाई 2019 में अमेरिकी सीनेट में भारत को ‘नाटो’ के सहयोगी देश का दर्जा दिये जाने वाला विधेयक पारित हो गया। ताकि एशिया में ‘नाटो’ सेना की मिसाइलें तैनात कराने में भारत का सहयोग लिया जा सके।
  4. जहाँ 28 जून को ‘जी-20’ की बैठक के दौरान मोदी ने ट्रम्प से एकान्त में गुफ्तगू किया था वहीं 23 जुलाई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान अमेरिका जाकर ट्रम्प से मिलते हैं।
  5. 31 जुलाई को ट्रम्प ने खुलाशा किया कि-‘मोदी ने मुझसे (ट्रम्प से) कश्मीर मामले में मध्यस्थता करने की पेशकश की थी, और 17 अगस्त को संयुक्तराष्ट्र संघ में बन्द कमरों में कश्मीर समस्या पर अमेरिका की मध्यस्थता में मीटिंग हुई।
  6. 2 अगस्त 2019 को अमेरिका ने ‘‘ इन्टरमीडियेटरी न्यूक्लियर फोर्सेज ट्रीटी (आई.एन.एफ. समझौता)’’ तोड़ दिया। ताकि एशिया में मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात कर सके। (जाहिर है यह समझौता 1987 में रूस और अमेरिका के बीच इस लिए हुआ था कि रूस और अमेरिका अपनी मध्यम दूरी की परमाणु मिसाइलें एशिया में तैनात नहीं करेंगे)।
  7. उधर इमरान की ट्रम्प से क्या बातचीत हुई कि अमेरिका से उनकी वापसी होते होते इधर जम्मू कश्मीर में भारतीय सेना का जमावड़ा बढ़ने लगा।
  8. 5 अगस्त 2019 को पूरे जम्मू कश्मीर में कर्फ्यू लगाकर कश्मीरी जनता को नजरबन्द करके वहाँ से अनु0 370 और 35(ए) हटाने की भारत सरकार ने घोषणा कर दिया। इसके साथ-साथ जम्मू कश्मीर को विभाजित करके लद्दाख को एक नया केन्द्रशासित राज्य बना दिया।
  9. 13 अगस्त को अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में बैठक हुई जिसमें अमेरिकी साम्राज्यवाद ने तालिबानियों के आगे झुककर समझौता किया ताकि अमेरिकी सेनाओं को तालिबानी लड़ाके बाइज्जत सुरक्षित अफगानिस्तान से निकल जाने दें।
    अब उपरोक्त तथ्यों को कार्यकारण के सिद्धान्त के तहत एक दूसरे से जोड़कर देखिये तो यह बात साफ हो जाती है कि चप्पे -चप्पे पर सेना पुलिस तैनात करके 370 इसलिये हटाया गया ताकि-
    (अ) अफगानिस्तान में फँसी अमेरिकी सेना को कश्मीर के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाला जा सके।
    (ब) कश्मीर में ‘नाटो’ सेना की मिसाइलें तैनात करके अमेरिका अपने प्रतिद्वण्द्वी चीन पर स्थायी दबाव बना सके।
    (स) चीन की ‘‘वन बेल्ट वन रोड’’ परियोजना में टाँग अड़ाया जा सके।
    (द) चीन की समाजवादी व्यवस्था को हथियार के बल पर कुचला जा सके।
    (य) इसके बदले में भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डालर बनाने के नाम पर ‘नाटो’ देशों से कर्ज दिलाकर भारत की बची खुची सम्प्रभुता अमेरिका के हाथ में गिरवी रखी जा सके।
    उपरोक्त पाँच मुख्य कारण हैं। कश्मीर की खनिज सम्पदाओं को लूटना भी एक कारण बनेगा, मगर यह खूनी खेल आसान नहीं है। कुछ भी हो अनु. 370 और 35(ए) खत्म करने से कश्मीर में शेष भारत के प्रति नफरत और बढ़ती जा रही है। कहीं कश्मीर विश्वयुद्ध का अखाड़ा तो नहीं बनने जा रहा है? जो भी हो यह कश्मीर पर ही नहीं पूरे देश की मेहनतकश अवाम के खिलाफ एक हमला है। इस घिनौनी करतूत को छिपाने के लिये पूँजीवादी मीडिया द्वारा जो ‘‘एक देश एक झण्डा एक संविधान’’ का नारा उछाला जा रहा है यह सरासर झूठ और धूर्ततापूर्ण है। जिस तरह ‘‘नोटबन्दी’’ की पोल धीरे-धीरे खुलती गयी उसी तरह 370 हटाये जाने का रहस्य भी खुलेगा। आने वाली पीढि़याँ इन गद्दारों को कभी माफ नहीं करेंगी। और वे भी नहीं माफ किये जायेंगे जो मौन हैं। रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों में –
    समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
    जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।।

अन्त में नौजवानों के लिये जफर का एक शेर –

  *तूले सबे फरात से घबरा न ऐ जफर।*
  *ऐसी भी कोई शाम है जिसका सहर न हो।।*

कश्मीरी जनता के जनवादी अधिकार वापस करो!
ब्रिटिश अमेरिकी साम्राज्यवाद के दलालों को बेनकाब करो!

                                            *इन्कबाल-जिन्दाबाद*

रजनीश भारती
राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा उ.प्र.

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