
मोनिका शर्मा
कोलकाता की एक महिला पर हुए एसिड अटैक के मामले में हाल ही कोर्ट ने दोषी को सिर्फ 1 महीने की जेल और 200 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। 2003 में हुई इस घटना को लेकर आए फैसले से एसिड अटैक की शिकार पीड़िताएं काफी निराश हैं। नाउम्मीदी हैरान भी नहीं करती क्योंकि एसिड हमला महिलाओं के साथ होने वाले बुरे बर्ताव और हिंसा का एक भयावह रूप है।
तेजाबी हमले का दंश झेल चुकी महिलाओं ने इस फैसले को लेकर कहा है कि इससे बेहतर तो यह होता कि दोषी को कोई सजा ही नहीं दी जाती। कानून के जानकारों ने इस मामले में अदालत में सबूत पेश करने में कुछ खामियां रह जाने के कारण दोषी को मामूली सजा दिए जाने की बात कही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि एसिड अटैक के मामलों में साल 2014 में 203 मामलों में सिर्फ 11 और 2015 में 222 मामलों में महज 14 को सजा हुई है।
गौरतलब है कि जिस पश्चिम बंगाल में हुए तेजाब हमले में 18 साल बाद मामूली सजा का फैसला आया है, वहां एसिड अटैक की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं। एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में एसिड हमलों के 53 मामले अकेले पश्चिम बंगाल में हुए। यह आंकड़ा देश भर में सबसे ज्यादा रहा। उत्तर प्रदेश ऐसी घटनाओं के मामले में दूसरे नंबर पर है। साल 2014-15 में बंगाल में तेजाब हमलों के 78 मामलों में से सिर्फ 1 में ही सजा हुई। अफसोस कि अन्य राज्यों में भी शरीर ही नहीं मन तक को झुलसाने वाले ऐसे पीड़ादायी मामलों में अपराधियों को सजा मिलने की स्थितियां निराशाजनक ही हैं।

असल में बरसों चले इस मामले का निर्णय उन कानूनी दांव पेंचों और उलझनों से रूबरू करवाता है जिनकी शुरुआत रिपोर्ट दर्ज होने के समय ही हो जाती है। एसिड अटैक, घरेलू हिंसा, दुष्कर्म या वर्कप्लेस पर हुआ दुर्व्यवहार- महिलाओं के विरुद्ध होने वाले इन आपराधिक मामलों में तंत्र का लचर, उदासीन और संवेदनहीन रुख पहले कदम से ही दिखने लगता है। एफआईआर दर्ज करने में भी आनाकानी होती है। एफआईआर हो भी गई तो समय पर साक्ष्य नहीं जुटाने के कारण पीड़िताओं का पक्ष बेहद कमजोर हो जाता है। नतीजतन, एसिड अटैक और दुष्कर्म जैसे बर्बर मामलों के अपराधी बच निकलने का रास्ता बना लेते हैं।
इतना ही नहीं व्यवस्था का लचर रवैया अपराध का शिकार हुई महिलाओं को मुआवजा मिलने की मुश्किलों तक में देखने को मिलता है। गुजरे सालों में देश भर में हुए तेजाब से हमले के 1273 मामलों में से कुल 799 मामलों में पीड़िताओं को मुआवजा नहीं मिला। तेजाबी हमले की शिकार महिलाओं के लिए सबसे बड़ी समस्या काम न मिल पाने की होती है। अपने चेहरे की पहचान खो चुकी पीड़िताओं के व्यक्तित्व को ही नकार दिया जाता है।
नतीजा होता है कि व्यवस्था से आमजन का भरोसा उठ जाता है। पीड़िता और उसका परिवार कानूनी पेंच नहीं समझता। सरकारी तंत्र का ढुलमुल रवैया भविष्य में खुलकर विरोध करने का उसका साहस भी छीनता है। ऐसे में आपराधिक सोच वाले लोगों की दुस्साहसी और कुत्सित प्रवृत्ति पूरे समाज को मुंह चिढ़ाती नजर आती है। इस हताशा को और बढ़ाने वाले ऐसे मामले भी सामने आ चुके हैं कि शिकायत करने के बाद सजा ना मिलने के चलते बेखौफ घूमते आरोपियों ने पीड़िता पर दोबारा एसिड अटैक करने की हिमाकत भी है।
दरअसल, महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों पर लगाम लगाने के लिए सामाजिक मोर्चे पर संवेदनशीलता, प्रशासनिक फ्रंट पर सधी कार्रवाई और कानूनी पक्ष पर त्वरित निर्णय जरूरी है। अफसोस कि रेयरेस्ट ऑफ दि रेयर कहे जाने वाले मामले भी बरसों तक खिंचते चले जाते हैं। अदालती प्रक्रिया में लगा लंबा समय परिवार और पीड़िता के लिए सामाजिक, मानसिक और आर्थिक पक्ष पर कई मुश्किलें पैदा करता है। भावनात्मक रूप से कमजोर करता है। समाज में भी अलग-थलग पड़ जाने की स्थितियां बनाता है। नतीजतन, कई परिवार केस लड़ने की इच्छा ही खो देते हैं। अफसोस कि वर्षों की जद्दोजहद के बाद आए ऐसे निर्णय पूरे समाज का ही मनोबल तोड़ते हैं।




