ये…आज का हिंदुस्तान है!
यहाॅं झूठ के ताने-बाने बुनना
वतन परस्ती है…इल्म है,
सही ग़लत में सही को चुनना
अंतरात्मा की आवाज सुनना
देश द्रोह है…जुर्म है,
गरीबों मजलूमों के हक के लिए
उठाए जो आवाज यहाॅं…
काट दी जाती हर वो ‘जुबान’ है..!
ये…आज का हिंदुस्तान है!
सच ना बोलने वाले
सच ना सुनने वाले
सच ना देखने वाले
तीन चमचमाते नए बन्दर
आदर्श रूप में लाए गए हैं,
आसमान में मची है अफरा तफरी
गिद्ध ‘जमीर’ दबोच ले गए
कौए उड़ रहे लेकर ‘कान’ हैं..!
ये…आज का हिंदुस्तान है!
अपने ‘आज’ को भुलाकर
‘बेहतर कल’ का सपना
जिन्होंने पलकों में सजा रखा है
उनकी नींद गहराती जा रही है,
नशे में धुत्त परवाने बनकर
उड़ रहे हैं शमा के इर्द गिर्द
अफ़सोस…
उन्हें ‘शाहीन’ होने का गुमान है..!
ये…आज का हिंदुस्तान है!
सरिता सिंह





