निर्मल कुमार शर्मा,
‘भारत में भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते बाघ ! ‘ उक्त शीर्षक आम पर्यावरणहितैषी और वन्य जीवों के जीवन पर बढ़ते खतरे और उनकी इस धरती से आसन्न विलुप्ति के खतरे के प्रति सजग,चिंतित व संवेदनशील पाठकों के लिए कुछ अटपटा और अप्रासंगिक लग सकता है,परन्तु यह बिल्कुल सच्चाई है कि केवल मध्यप्रदेश में बाघ संरक्षण के तहत वहाँ बनाए गए टाइगर रिजर्व्स में बाघों को अवैध शिकारियों वन्य जीवों के खालों,दांतों,हड्डियों,माँस और खाल से करोड़ों कमाने वाले तस्करों तथा अवैध शिकारियों से बचाने के लिए पिछले 7 सालों में 9 अरब रूपये सरकारी खाते से खर्च हुए हैं ! इसके अतिरिक्त टाइगर रिजर्व क्षेत्र के आसपास आनेवाले गाँवों से वहाँ के ग्रामीणों को अन्यत्र स्थानांतरित करने व उन्हें बसाने के लिए पिछले 15 वर्षों में पूरे 5 अरब 60 करोड़ रूपये खर्च हुए हैं ! आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि पूरे देश में फैले 53 टाइगर रिजर्व्स में कुल मिलाकर कितनी बड़ी राशि खर्च होती होगी ! इतनी भारी-भरकम राशि खर्च होने के बावजूद भी भारतीय वन विभाग बाघों को अवैध शिकारियों व तस्करों से उनकी सुरक्षाहेतु वन्य सुरक्षाकर्मियों की बेहद कमी का रोना रहता है ! यक्षप्रश्न है कि भारतीय वन विभाग में इतने अरब रूपये आखिर किस मद पर खर्च होते हैं ? जब बाघों को ही ये नाकारा वन विभाग नहीं बचा पा रहा है,तो इस सफेद हाथी बने वन विभाग पर अरबों रूपये खर्च करने का क्या उद्देश्य है ?
अरबों रूपये खर्च करने के बावजूद कथित टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश में बाघों का तेजी से कत्लेआम जारी है ! नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी यानी एनटीसीए द्वारा जारी किए गये एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल जनवरी से लेकर अब तक पूरे देश भर में विभिन्न बाघ अभ्यारण्यों में 107 बाघ मरे हैं या मारे गए हैं ! जिसमें से अकेले मध्यप्रदेश के अभ्यारण्यों में पिछले 11 महीनों में 35 बाघ मरे हैं ! वहाँ भी सबसे ज्यादे 10 बाघों की निर्मम तरीके से हत्या केवल बाँधवगढ़ नेशनल पार्क में हुई है। मतलब अवैध शिकारियों व तस्करों द्वारा प्रति 10 दिन में एक बाघ की नृशंस हत्या केवल कथित टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश में कर दी जाती है !
अरबों रूपये अपने पर खर्च करनेवाले भारतीय वन विभाग के मध्यप्रदेश विंग अपने राज्य में कितनी मुस्तैदी से बाघों की सुरक्षा कर रहा है इसका एक नमूना देखिए। पन्ना बाघ अभयारण्य नेशनल पार्क के दर्शकों के लिए सबसे सुन्दर,प्यारा और दिखनेवाला बाघ,जिसको हीरा के नाम से जाना जाता था,उसकी ही वन विभाग के नाकारा,सुस्त,आलसी और विलासी कर्मचारियों और अफसरों की वजह से तस्करों ने दिन दहाड़े हत्या कर दिए ! यह हीरा नामक सुन्दर और स्वस्थ्य बाघ सेटेलाइट कॉलर आईडी से लैश था,पन्ना नेशनल पार्क की तरफ से पन्ना के जंगल स्थित वन विभाग के महकमे को लगातार खतरे की सूचना देने के बावजूद भी वन विभाग के नाकारा कर्मचारियों व अफसरों को हीरा को बचाने के लिए उस निर्दिष्ट स्थल तक पहुंचने में पूरे 18 दिन तक भी पहुँचने में नाकामयाब रहे,जिसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अवैध शिकारी दरिंदे हीरा जैसे लोकप्रिय और स्वस्थ्य बाघ की नृशंस हत्या करने में सफल रहे,वे उसका सिर काटकर ले गये और उसके गले में बँधी आईडी कॉलर को खुले में फेंक गये ! उस आईडी कॉलर तक पहुँचने में भी मध्यप्रदेश के वन विभाग के कथित अति चुस्तदुरुस्त और मुस्तैद कर्मचारियों व अफसरों को पूरे 15 दिन और लग गये,तब तक उस खूबसूरत बाघ हीरा का शव भी सड़-गल चुका था !
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए के अनुसार पिछले 8 सालों में देशभर में कुल 750 बाघों की मौत हुई,जिसमें सर्वाधिक 173 बाघों की मौत अकेले मध्यप्रदेश में हुई ! राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए के अनुसार ही 369 बाघों की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई, जबकि 168 बाघों की निर्मम तरीकों से अवैध शिकारियों या तस्करों द्वारा हत्या की गई,70 बाघों की मौत के कारणों की जाँच चल रही है,42 बाघों की मौत दुर्घटना या अपने क्षेत्र के स्वामित्व के लेकर हुए झगड़े में हुए आपसी संघर्ष के कारण हुई।
बाघ संरक्षण अभ्यारण्यों में बाघों के लिए एक और भयंकर खतरा भारतीय जंगली कुत्तों से पैदा हो गई है। इन कुत्तों को सोन कुत्ते या ढोल भी कहा जाता है,कई अंतर्राष्ट्रीय संगठन भारतीय जंगलों से इन्हें विलुप्त मान चुके थे,परन्तु कुछ बाघ संरक्षण अभ्यारण्यों में इन कुत्तों के झुंड फिर से देखे गये हैं । एशिया के दक्षिण-पूर्व व दक्षिणी देशों के जंगलों में रहनेवाली इस इकलौती कुत्ते की प्रजाति अपनी दंतावली व स्तनाग्रों के मामले में अन्य कुत्तों की प्रजातियों से बिल्कुल अलग यह एक ऐसी प्रजाति है,जो बड़ी-बड़ी झुँडों में रहती है। इनकी मादा एक बार में ही 6से 8 तक बच्चों का जन्म देकर बहुत तेजी से अपने कुटुम्ब को बढ़ा देती है। ये अपने शिकार को बड़े ही संगठित ढंग से,मिलजुल कर व योजनाबद्ध तरीके से मारने के लिए करते हैं। इनके शिकार में हिरन,खरगोश आदि छोटे जानवरों के अलावे जंगली सूअर,बड़े भैंसे और बाघ भी हो जाते हैं। ये जंगली कुत्ते भारतीय बाघों के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किए गए हैं। इन भयानक कुत्तों से सबसे अधिक खतरा गर्भवती या शावकों वाली बाघिन को है,क्योंकि बहुत दूर से ये गर्भवती या शावकों वाली बाघिन को सूँघकर पता लगा लेते हैं और वहाँ पर झुँडों में पहुंच कर बाघिन को घेर लेते हैं और उसको शावकों को बड़ी आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। जिन क्षेत्रों में इनकी आबादी रहती है इनके भय से वहाँ से बाघ अक्सर अपना ठिकाना बदल लेते हैं।
विडंबना देखिए कि देश के बाघों की अवैध शिकारियों व तस्करों से बचाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स की स्थापना के लिए केन्द्र सरकार से मदद मिलती है,लेकिन मध्यप्रदेश राज्य के राजनैतिक व प्रशासनिक अमले की लापरवाही का यह आलम है कि इतनी सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार के सत्तारूढ़ कर्णधार अभी तक स्पेशल टास्क फोर्स की वहाँ स्थापना ही नहीं कर पाए हैं ! जबकि मध्यप्रदेश के न्यायालय वहाँ की राज्य सरकार के कर्णधारों से स्पष्ट तौर पर कह चुका है कि जब तक राज्य में स्पेशल टास्क फोर्स की स्थापना नहीं कर ली जाती, तब तक विकल्प के तौर पर बाघों की सुरक्षाहेतु मध्यप्रदेश पुलिस की सहायता लिया जा सकता है,लेकिन इतने दुर्लभतम् और इस धरती से विलुप्ति के कगार पर खड़े बाघों की इतनी ज्यादे संख्या में हत्या होने के बावजूद भी उन्हें बचाने हेतु अभी तक मध्यप्रदेश पुलिस की सहायता लेने की जरूरत वहाँ के प्रशासनिक व राजनैतिक जमात द्वयी द्वारा नहीं ली गई है ! यह पूरे देश के पर्यावरण संरक्षण करनेवाले और वन्य जीवों की विलुप्ति न होने देने के प्रति चिंतित व प्रतिबद्ध करोड़ों लोगों के लिए अत्यंत स्तब्ध, हतप्रभ व दुःखी कर देने वाली बात है ! इसके अलावे वन्य प्राणियों की गैरकानूनी तौर पर तस्करों और दुर्दांत अपराधियों के खिलाफ जाँच करने और उन्हें दण्डित करने में भी मध्यप्रदेश के न्यायालय बहुत ही फिसड्डी साबित हुए हैं,इसीलिए बाघों को मारने तथा उनकी खाल,हड्डियों,दाँत,माँस आदि को चीन जैसे देशों में करोड़ों रूपयों में बेचने के स्वार्थ के चलते तस्करों व अवैध शिकारियों को बाघों को धड़ा-धड़ मारने के लिए साहस व मनोबल बहुत ही अधिक बढ़ा हुआ है !
प्रश्न उठता है कि अरबों रूपये खर्च करने के बाद भी दिनदहाड़े बाघ रिजर्व्स में ही बाघों की इतनी ज्यादे संख्या में हत्या होने से वन विभाग नहीं रोक पा रहा है,तो वन विभाग के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा होना स्वाभाविक है ! आखिर टाइगर रिजर्व्स में बाघ सुरक्षित नहीं हैं,तो और वे कहाँ सुरक्षित रहेंगे ? बाघों की जिस वनक्षेत्र में अवैध शिकारियों व तस्करों द्वारा हत्या की जा रही है,उस वनक्षेत्र के वन अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर दंणात्मक कार्यवाही क्यों नहीं की जाती है ? वास्तविकता यह है कि ये वनों में बाघों के रखवाले ही तस्करों और अवैध शिकारियों से लाखों रूपये के रिश्वत लेकर उनसे साँठगाँठ करके बाघों को सुनियोजित ढंग से हत्या करवाने में संलिप्त हैं ! भारतीय बाघों को,जो इस धरती से विलुप्ति के कगार पर खड़े हैं,हरहाल में बचाये जाने चाहिए । इसके लिए भारतीय वन विभाग के रिश्वतखोर व भ्रष्ट कर्मचारियों व अधिकारियों को कठोरतम् दंड देने सहित भारतीय बाघों के जान के खतरे बने हुए सोन कुत्तों या ढोल के खतरे को भी कम करने के उपायों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए ।
–निर्मल कुमार शर्मा,’गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा पत्र -पत्रिकाओं में निष्पक्ष, सशक्त व स्वतंत्र लेखन ‘ ,गाजियाबाद ,उप्र





